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53 साल बाद तस्वीरों में लौटा बचपन… ब्रिटेन से अबूझमाड़ पहुंचीं सोफी, अपनों को देख छलक पड़े ग्रामीणों के आंसू

1973-74 में कैमरे में कैद किए थे नारायणपुर-अबूझमाड़ के ग्रामीण जीवन के अनमोल पल, आधी सदी बाद उन्हीं तस्वीरों को लेकर लौटीं विदेशी पर्यटक; 3000 से अधिक दुर्लभ तस्वीरों की फरवरी में नारायणपुर मेले में लगेगी ऐतिहासिक प्रदर्शनी

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। वक्त की रफ्तार भले ही पांच दशक से अधिक आगे निकल गई हो, लेकिन कुछ यादें ऐसी होती हैं, जिन्हें समय भी धुंधला नहीं कर पाता। कभी बचपन की गलियों में दौड़ते चेहरे, कभी पारंपरिक वेशभूषा में सजे ग्रामीण, तो कभी मिट्टी के घरों में अपनों के साथ बिताए अनमोल पल… ये सभी यादें एक दिन अचानक तस्वीरों के रूप में सामने आ जाएं तो भावनाओं का उमड़ना स्वाभाविक है। नारायणपुर और अबूझमाड़ के ग्रामीणों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब ब्रिटेन से सोफी हार्टमैन करीब 53 साल पुरानी यादों का खजाना लेकर यहां पहुंचीं। उनके हाथों में वे तस्वीरें थीं, जिनमें आज के बुजुर्गों का बचपन, युवावस्था, शादी-ब्याह और गांव की जिंदगी कैद थी। तस्वीरों में खुद को और अपने बिछड़े परिजनों को देखकर कई ग्रामीण भावुक हो उठे। किसी की आंखें खुशी से नम थीं, तो किसी को उन अपनों की याद आ गई, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं।

1973-74 का अबूझमाड़… जब कैमरे में कैद हो रही थी एक पूरी दुनिया

सोफी हार्टमैन का नारायणपुर और अबूझमाड़ से रिश्ता आज का नहीं, बल्कि वर्ष 1973, 1974 और 1976 के दौर का है। उस समय वह विदेशी पर्यटक के रूप में इन इलाकों में आया करती थीं। यहां के जंगल, पहाड़, गांव, आदिवासी जीवनशैली, पारंपरिक रीति-रिवाज और लोगों का सहज अपनापन उन्हें इतना आकर्षित करता था कि उन्होंने अपने कैमरे में यहां के जनजीवन के हजारों दृश्य सहेज लिए।

उस दौर में खींची गई तस्वीरें महज फोटोग्राफ नहीं थीं, बल्कि बस्तर और अबूझमाड़ के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास का जीवंत दस्तावेज बन गईं। तस्वीरों में कहीं गांव की चौपाल है, कहीं पारंपरिक परिवेश में बैठे ग्रामीण, कहीं बचपन की मासूमियत है तो कहीं उस समय के पारिवारिक और सामाजिक जीवन की झलक।

आधी सदी बाद तस्वीरें सामने आईं तो पहचानना भी हो गया मुश्किल

समय के साथ परिस्थितियां बदलीं। अस्सी के दशक के बाद क्षेत्र में नक्सलवाद के प्रभाव और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के चलते विदेशी पर्यटकों का इन इलाकों में आना लगभग बंद हो गया। सोफी भी लंबे समय तक नारायणपुर और अबूझमाड़ से दूर रहीं, लेकिन यहां बिताए दिनों और कैमरे में कैद किए गए चेहरों की यादें उनके साथ बनी रहीं।

दशकों बाद जब वह दोबारा नारायणपुर पहुंचीं तो उनके पास तस्वीरों का ऐसा संग्रह था, जिसे देखकर ग्रामीणों के लिए अपने अतीत पर विश्वास करना भी मुश्किल हो रहा था। कोई अपनी बचपन की तस्वीर देखकर मुस्कुराया, तो किसी ने अपने पुराने साथी को पहचान लिया। किसी को अपनी शादी के दिन की याद आ गई, तो किसी की आंखें तस्वीर में नजर आ रहे दिवंगत माता-पिता और परिजनों को देखकर भर आईं।

इन तस्वीरों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरा दौर जीवित है। आज जिन चेहरों पर उम्र की लकीरें दिखाई देती हैं, वे कभी इन्हीं तस्वीरों में बचपन की मासूमियत के साथ नजर आते थे।

3000 से अधिक तस्वीरों में सहेजा है अबूझमाड़ का इतिहास

सोफी हार्टमैन ने अब तक लगभग 3000 से अधिक ग्रामीणों की तस्वीरों का संग्रह तैयार किया है। उनका प्रयास है कि ये तस्वीरें केवल उनके निजी संग्रह तक सीमित न रहें, बल्कि जिन लोगों और परिवारों से जुड़ी हैं, उन तक वापस पहुंचें।

इसी पहल के तहत नारायणपुर के गढ़बेंगाल सहित क्षेत्र के कई ग्रामीणों को उनकी पुरानी तस्वीरें दिखाई और भेंट की गई हैं। पद्मश्री पंडित राम मंडावी सहित कई लोगों तक भी दशकों पुरानी यादें पहुंची हैं।

यह पहल इसलिए भी खास है, क्योंकि इन तस्वीरों में दर्ज कई लोग अब जीवित नहीं हैं। ऐसे में उनके परिवारों के लिए ये तस्वीरें पूर्वजों की स्मृतियों को सहेजने वाली अनमोल धरोहर बन गई हैं।

अबूझमाड़ की पहचान अब दुनिया के सामने आएगी

सोफी की वापसी केवल पुरानी तस्वीरें लौटाने तक सीमित नहीं है। यह यात्रा अबूझमाड़ की उस सांस्कृतिक विरासत की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है, जिसे दुनिया के सामने लाने की जरूरत है। यहां की पारंपरिक जीवनशैली, लोकसंस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और ग्रामीणों का आत्मीय व्यवहार लंबे समय से बाहरी दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है।

नक्सलवाद के प्रभाव के कारण वर्षों तक सीमित संपर्क में रहे इस क्षेत्र में अब शांति, विश्वास और विकास की नई संभावनाओं के साथ पर्यटन को लेकर भी उम्मीदें बढ़ रही हैं। ऐसे में सोफी जैसी विदेशी पर्यटक का पांच दशक बाद लौटना नारायणपुर और अबूझमाड़ की सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।

फरवरी में नारायणपुर मेले में सजेगी 3000 तस्वीरों की यादों की दुनिया

सोफी हार्टमैन ने फरवरी में नारायणपुर मेले के दौरान दोबारा आने और अपनी दशकों पुरानी तस्वीरों की विशेष प्रदर्शनी लगाने की योजना बनाई है। इस प्रदर्शनी में 3000 से अधिक तस्वीरों को लोगों के सामने लाने की तैयारी है।

यह प्रदर्शनी केवल तस्वीरों का संग्रह नहीं होगी, बल्कि नारायणपुर और अबूझमाड़ के बीते समय की ऐसी झलक होगी, जिसमें नई पीढ़ी अपने गांव, अपने पुरखों और अपनी सांस्कृतिक विरासत को करीब से देख सकेगी। ग्रामीणों को भी अपनी पुरानी तस्वीरों की पहचान करने और उनसे जुड़ी यादें साझा करने का अवसर मिलेगा।

एक मुलाकात, जिसने इतिहास को फिर से जीवित कर दिया

सोचिए, जिस बच्चे की तस्वीर 1973 या 1974 में किसी विदेशी पर्यटक के कैमरे में कैद हुई थी, आज वही व्यक्ति उम्र के उस पड़ाव पर है, जहां उसके पोते-पोतियां उसकी जवानी की तस्वीर देखकर हैरान हो सकते हैं। जिस मां, पिता या साथी के साथ कभी तस्वीर खिंचवाई गई थी, वह भले ही अब साथ न हो, लेकिन उसकी स्मृति कागज पर आज भी सुरक्षित है।

सोफी हार्टमैन की यह पहल बताती है कि तस्वीरें केवल बीते पलों का चित्रण नहीं करतीं, बल्कि वे पीढ़ियों को जोड़ने और इतिहास को जीवित रखने का माध्यम भी बनती हैं। ब्रिटेन से नारायणपुर तक का उनका यह सफर इसलिए ऐतिहासिक है, क्योंकि वह अपने साथ यहां के लोगों का खोया हुआ बचपन, पुरानी पहचान और आधी सदी पुरानी यादें लेकर लौटी हैं।

इस ऐतिहासिक पहल और सोफी हार्टमैन की नारायणपुर वापसी से जुड़ी जानकारी को सामने लाने में स्थानीय पत्रकार अशफाक अहमद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके प्रयासों से अबूझमाड़ के अतीत से जुड़ी यह अनमोल कहानी व्यापक स्तर पर सामने आ रही है।

53 साल पहले कैमरे में कैद हुए चेहरे आज फिर अपनों के सामने हैं। वक्त बदल गया, लोग बदल गए, पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन तस्वीरों में कैद अबूझमाड़ आज भी वैसा ही जीवंत है।

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