नारायणपुर

बस्तर की तरक्की हो, लेकिन संस्कृति की कीमत पर नहीं

छत्तीसगढ़ विकास संवाद में साहित्यकारों और कलाकारों ने रखी बेबाक राय, बोले—अबूझमाड़ तक पहुंचे विकास, पर बची रहे जनजातीय पहचान

सड़क, स्कूल और अस्पताल के साथ स्थानीय भाषा, लोककला और परंपराओं के संरक्षण पर जोर; कलाकारों को बाजार और उनकी कला का उचित मूल्य दिलाने की उठी बात

नारायणपुर। बस्तर में विकास की राह अब नए अवसरों की ओर बढ़ रही है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार जरूरी है, लेकिन इस विकास की कीमत क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान नहीं होनी चाहिए। जनजातीय परंपराएं, स्थानीय भाषाएं, लोककलाएं और पीढ़ियों से चली आ रही जीवन-पद्धति ही बस्तर की असली ताकत हैं। इन्हें साथ लेकर चलने पर ही विकास की तस्वीर पूरी होगी। नारायणपुर में आयोजित ‘छत्तीसगढ़ विकास संवाद’ में साहित्यकारों और कलाकारों ने इसी सोच के साथ बस्तर के भविष्य पर विचार साझा किए।

‘आज की जनधारा’ की ओर से आयोजित संवाद में प्रधान संपादक सुभाष मिश्र ने साहित्यकारों और कलाकारों से बस्तर-नारायणपुर के विकास, बदलते शहर और वर्ष 2047 के विजन को लेकर चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि अबूझमाड़ जैसे क्षेत्रों में विकास की योजनाएं पहुंचनी चाहिए, लेकिन उनकी दिशा तय करते समय स्थानीय समाज की जरूरतों, संस्कृति और परंपराओं को प्राथमिकता देना जरूरी है।

घोटुल की परंपरा में छिपी है बस्तर की सामाजिक समझ

साहित्यकार शिव कुमार पांडे ने बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का उल्लेख करते हुए घोटुल परंपरा को सामाजिक जीवन की महत्वपूर्ण कड़ी बताया। उन्होंने कहा कि बस्तर की संस्कृति को केवल नृत्य और लोकगीतों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसकी जड़ों में सामाजिक अनुशासन, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक विश्वास जैसी जीवन-मूल्य आधारित परंपराएं हैं।

उन्होंने कहा कि स्थानीय सांस्कृतिक संस्थाओं और परंपराओं को बाहरी नजरिए से देखने के बजाय उनके सामाजिक संदर्भों को समझना चाहिए। विकास की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जो लोगों को उनकी जड़ों से काटने के बजाय सांस्कृतिक विरासत के प्रति गौरव का भाव मजबूत करे।

नक्सलवाद के लंबे दौर के बाद अब विकास के साथ विश्वास की जरूरत

अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सलवाद और हिंसा के प्रभाव के कारण बाहरी दुनिया से अलग-थलग रहा। अब बदलती परिस्थितियों के बीच इस क्षेत्र में विकास की संभावनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में चुनौती केवल बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने की नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों का भरोसा मजबूत करने की भी है।

वक्ताओं ने कहा कि सड़क, स्कूल, अस्पताल और संचार सुविधाओं का विस्तार जरूरी है, लेकिन योजनाओं का लाभ वास्तविक रूप से स्थानीय लोगों तक पहुंचना चाहिए। उनकी भागीदारी के बिना विकास की योजनाएं अधूरी रहेंगी। अबूझमाड़ में बदलाव की प्रक्रिया स्थानीय समाज की सहमति, जरूरतों और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाई जानी चाहिए।

कलाकारों को मंच और उचित मूल्य मिले, तभी बचेगी विरासत

संवाद में पारंपरिक कला और कलाकारों की आजीविका का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। वक्ताओं ने कहा कि बस्तर की लोककला किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव, अभ्यास और साधना से तैयार हुई विरासत है। इसे बचाने के लिए केवल सम्मान समारोह पर्याप्त नहीं हैं। कलाकारों को नियमित अवसर, प्रशिक्षण, बाजार और उनकी कला का उचित मूल्य मिलना भी जरूरी है।

स्थानीय शिल्प और कलाओं को व्यापक बाजार से जोड़ने, उनकी पहचान मजबूत करने तथा कलाकारों को बेहतर मंच उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया। वक्ताओं के मुताबिक, जब पारंपरिक कला से सम्मानजनक आजीविका मिलेगी, तभी नई पीढ़ी भी इसे अपनाने और आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित होगी।

पिता से सीखा काष्ठ शिल्प, अब अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश

चर्चा में काष्ठ शिल्प से जुड़े कलाकार ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने करीब 14 वर्ष की उम्र में इस कला से जुड़ना शुरू किया था। पिता से मिली सीख के सहारे उन्होंने पारंपरिक हुनर को आगे बढ़ाया। उनका अनुभव इस बात को रेखांकित करता है कि बस्तर की कई कलाएं परिवारों और पीढ़ियों के माध्यम से जीवित रही हैं।

ऐसी कलाओं को संरक्षित रखने के लिए कलाकारों के अनुभव का दस्तावेजीकरण, प्रशिक्षण के अवसर और नई पीढ़ी को जोड़ने के प्रयास जरूरी हैं। साथ ही, कला को बाजार उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है, ताकि पारंपरिक हुनर केवल स्मृतियों तक सीमित न रह जाए।

जमीन, जंगल और संस्कृति का संरक्षण भी विकास का हिस्सा

अबूझमाड़ प्राकृतिक संसाधनों और सांस्कृतिक विविधता से समृद्ध क्षेत्र है। संवाद में कहा गया कि विकास के नाम पर जमीन, जंगल और स्थानीय संस्कृति का शोषण नहीं होना चाहिए। योजनाएं बनाते समय क्षेत्र की सामाजिक परिस्थितियों, पारंपरिक जीवन-पद्धति और स्थानीय समुदायों की जरूरतों को समझना जरूरी है।

वक्ताओं ने जोर दिया कि स्थानीय लोगों को केवल योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाया जाए। उनकी राय और सहभागिता से तैयार योजनाएं अधिक प्रभावी और टिकाऊ साबित हो सकती हैं।

आधुनिकता के साथ सांस्कृतिक जड़ों को बचाने की चुनौती

बदलते समय में नई पीढ़ी को आधुनिक शिक्षा, तकनीक और रोजगार के अवसरों से जोड़ना जरूरी है। इसके साथ स्थानीय भाषाओं, लोक स्मृतियों, जनजातीय कला, पारंपरिक मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

वक्ताओं ने कहा कि विकास को केवल सड़कों, भवनों और संस्थानों की संख्या से नहीं आंका जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि विकास से लोगों के जीवन में कितना सकारात्मक बदलाव आया और उनकी सांस्कृतिक पहचान कितनी सुरक्षित रही।

विकास और विरासत के बीच संतुलन ही बस्तर का भविष्य

‘छत्तीसगढ़ विकास संवाद’ में सामने आए विचारों का सार यही रहा कि बस्तर को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना जरूरी है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करके नहीं। नारायणपुर और अबूझमाड़ के लिए ऐसी विकास दृष्टि की जरूरत है, जिसमें आधुनिक सुविधाओं के विस्तार के साथ स्थानीय समाज की भागीदारी, पारंपरिक कला का संरक्षण और सांस्कृतिक अस्मिता को समान महत्व मिले।

बस्तर की असली तरक्की वही होगी, जिसमें सड़क और स्कूल भी बनें, रोजगार के अवसर भी बढ़ें और आने वाली पीढ़ियां अपनी भाषा, परंपरा और विरासत पर गर्व भी कर सकें।

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