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बस्तर दशहरा: 75 दिनों तक आस्था, परंपरा और जनजातीय संस्कृति का अनूठा संगम

मुख्यमंत्री साय को मिला बस्तर दशहरा में शामिल होने का न्योता, बस्तर सांसद महेश कश्यप के नेतृत्व में समिति के प्रतिनिधिमंडल ने की मुलाकात

रायपुर/जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा 2026 में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को शामिल होने का आमंत्रण दिया गया है। बस्तर सांसद महेश कश्यप के नेतृत्व में बस्तर दशहरा समिति, जगदलपुर के प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में मुख्यमंत्री से सौजन्य मुलाकात की। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने बस्तर की पारंपरिक जनजातीय संस्कृति के अनुरूप मुख्यमंत्री को पारंपरिक पागा पहनाकर सम्मानित किया और दशहरा पर्व में शामिल होने का न्योता दिया।

मुख्यमंत्री साय ने आत्मीय आमंत्रण के लिए प्रतिनिधिमंडल का आभार जताते हुए आयोजन की सफलता के लिए शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा केवल पर्व नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, जनजातीय संस्कृति, परंपरा और सामूहिक सहभागिता की अनुपम विरासत है। इस आयोजन में बस्तर की सांस्कृतिक आत्मा और सामाजिक समरसता की जीवंत झलक दिखाई देती है।

संस्कृति के संरक्षण के लिए सरकार प्रतिबद्ध

मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत छत्तीसगढ़ की अमूल्य धरोहर है। बस्तर दशहरा जैसी परंपराएं नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का काम करती हैं। राज्य सरकार जनजातीय परंपराओं और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध है।

प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, धार्मिक अनुष्ठानों, परंपराओं और इस वर्ष आयोजन की तैयारियों की जानकारी दी।

75 दिनों तक चलती है आस्था की यात्रा

बस्तर दशहरा की सबसे खास पहचान इसका लगभग 75 दिनों तक चलने वाला आयोजन है। हरेली अमावस्या से शुरू होकर विभिन्न पूजा-विधानों और अनुष्ठानों के साथ यह पर्व आश्विन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तक चलता है।

इस वर्ष 12 अगस्त को पाटजात्रा पूजा विधान के साथ दशहरा पर्व का शुभारंभ हुआ। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 10 अक्टूबर को काछनगादी पूजा, 18 अक्टूबर को बेल पूजा और 23 अक्टूबर को मुरिया दरबार का आयोजन किया जाएगा। पर्व के विभिन्न अनुष्ठानों में बस्तर अंचल के अलग-अलग समुदायों की परंपरागत और महत्वपूर्ण भागीदारी रहती है।

राम की विजय नहीं, मां दंतेश्वरी की आराधना का पर्व

बस्तर दशहरा की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि इसे भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना और आस्था के महापर्व के रूप में मनाया जाता है।

ऐतिहासिक मान्यताओं में बस्तर दशहरा की परंपरा को चालुक्य नरेश पुरुषोत्तम देव से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि पुरुषोत्तम देव की पुरी यात्रा और उन्हें मिली ‘रथपति’ उपाधि के बाद बस्तर दशहरा की परंपरा में रथ का विशेष महत्व स्थापित हुआ।

मांझी-चालकी से लेकर मेम्बर-मेम्बरीन तक निभाते हैं जिम्मेदारी

बस्तर दशहरा में मांझी, चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन सहित विभिन्न समुदायों और समाज के वर्गों की जिम्मेदारियां पारंपरिक रूप से निर्धारित हैं। धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर रथ निर्माण और आयोजन की व्यवस्थाओं तक स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी रहती है।

पीढ़ियों से चली आ रही यह सामूहिक सहभागिता बस्तर दशहरा को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समन्वय का अनूठा उदाहरण बनाती है।

रथयात्रा और जनजातीय परंपराएं खींचती हैं पर्यटकों को

भव्य रथयात्रा, विशिष्ट पूजा-विधान, जनजातीय परंपराओं और लोक संस्कृति के कारण बस्तर दशहरा देश-दुनिया के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इस ऐतिहासिक आयोजन और बस्तर की जीवंत संस्कृति को करीब से देखने पहुंचते हैं।

बस्तर दशहरा जहां सदियों पुरानी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम है, वहीं यह बस्तर की लोक कला, संस्कृति और पर्यटन को व्यापक पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रतिनिधिमंडल में मांझी-चालकी सहित समिति के पदाधिकारी

मुख्यमंत्री को आमंत्रण देने पहुंचे प्रतिनिधिमंडल में बस्तर सांसद महेश कश्यप, परगनाकरेकोट के मंगलु मांझी, बलराम मांझी, पदम् चालकी, समारू चालकी, डमरू चालकी, लक्ष्मण मांझी सहित अनेक मांझी, चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन और बस्तर दशहरा समिति के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

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