अबूझमाड़ के जंगल में आखिर क्या छिपा है? कलंगोट जलप्रपात और धोबे गुंडा पहाड़ की कहानी आई सामने
नारायणपुर जिला मुख्यालय से करीब 75 किलोमीटर दूर प्रकृति का अनदेखा संसार; आदिमपार गांव से दो घंटे का पैदल सफर तय करने पर दिखता है चट्टानों के बीच बहता मनमोहक झरना, पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावनाएं

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। अबूझमाड़ के घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों के बीच प्रकृति ने कितने ऐसे नजारे छिपा रखे हैं, जिनकी खूबसूरती अब तक व्यापक पहचान से दूर रही है? नारायणपुर जिला मुख्यालय से करीब 75 किलोमीटर दूर स्थित आदिमपार गांव के बिहड़ जंगल में कलंगोट जलप्रपात और धोबे गुंडा घाट/पहाड़ इसी अनदेखी प्राकृतिक विरासत की झलक पेश करते हैं। ऊंची चट्टानों के बीच से गिरता दूधिया सफेद पानी, आसपास फैली हरियाली और पहाड़ी भू-भाग इस स्थान को आकर्षक बनाते हैं। अब सवाल यह है कि क्या यह प्राकृतिक खजाना आने वाले समय में अबूझमाड़ की नई पर्यटन पहचान बन सकेगा?

घने जंगल के बीच कलंगोट जलप्रपात, रास्ता भी किसी रोमांच से कम नहीं
कलंगोट जलप्रपात तक पहुंचने के लिए आदिमपार गांव से करीब दो घंटे का सफर पैदल तय करना पड़ता है। जंगल और पहाड़ी रास्तों से होकर पहुंचने वाला यह स्थल प्रकृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है। ऊंची, गहरी रंगत वाली चट्टानों के बीच से बहती जलधारा और आसपास का प्राकृतिक वातावरण यहां की खूबसूरती को खास बनाते हैं।
बरसात के मौसम में जलप्रपात का प्रवाह बढ़ने के साथ इसका नजारा और भी मनमोहक हो जाता है। चट्टानों से टकराकर नीचे की ओर बहता पानी और जंगल की हरियाली इस क्षेत्र की प्राकृतिक विविधता को सामने लाते हैं। हालांकि, पैदल मार्ग की स्थिति, मौसम के दौरान सुरक्षा और पर्यटकों की आवाजाही के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं का आकलन किया जाना जरूरी है।

जिला मुख्यालय से 75 किलोमीटर दूर, फिर भी पहचान का इंतजार
कलंगोट जलप्रपात और धोबे गुंडा घाट/पहाड़ नारायणपुर जिले में प्राकृतिक पर्यटन की संभावनाओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। जिला मुख्यालय से करीब 75 किलोमीटर की दूरी और आदिमपार से आगे पैदल पहुंचने की जरूरत इस स्थल को सामान्य पर्यटन स्थलों से अलग बनाती है।
यही दुर्गमता लंबे समय तक ऐसे प्राकृतिक स्थानों की व्यापक पहचान में बाधा रही हो सकती है। अब बदलते हालात के बीच इनके व्यवस्थित सर्वेक्षण, पहचान और संरक्षण की दिशा में पहल की जा सकती है। क्या अबूझमाड़ के जंगलों में ऐसे और भी जलप्रपात, पहाड़ियां और प्राकृतिक स्थल मौजूद हैं, जिनकी जानकारी अभी सीमित है? इसका पता सरकारी सर्वेक्षण और स्थानीय लोगों के सहयोग से लगाया जा सकता है।
नक्सलवाद का प्रभाव घटने के बाद प्राकृतिक विरासत को पहचानने का अवसर
अबूझमाड़ के कई हिस्से लंबे समय तक दुर्गमता और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के कारण सीमित पहुंच वाले रहे हैं। इसके चलते यहां की प्राकृतिक संपदा के बारे में व्यापक जानकारी सामने लाने के अवसर भी सीमित रहे। बदलते हालात में इन क्षेत्रों की प्राकृतिक विरासत की पहचान और संरक्षण पर ध्यान देना महत्वपूर्ण हो गया है।
कलंगोट जलप्रपात और धोबे गुंडा घाट/पहाड़ जैसे स्थलों का सर्वेक्षण कर उनकी भौगोलिक स्थिति, पहुंच मार्ग, सुरक्षा और पर्यावरणीय संवेदनशीलता का आकलन किया जा सकता है। इसके बाद ही यह तय हो सकेगा कि इन्हें किस प्रकार पर्यटन गतिविधियों के लिए विकसित किया जा सकता है।

सरकारी पहल हुई तो जंगल की खूबसूरती बन सकती है पर्यटन की नई पहचान
यदि शासन-प्रशासन इन स्थलों को पर्यटन के लिहाज से उपयुक्त पाता है, तो चरणबद्ध तरीके से विकास की योजना बनाई जा सकती है। इसके तहत सुरक्षित पैदल मार्ग, दिशा-सूचक बोर्ड, आपातकालीन सहायता, स्वच्छता और आवश्यक बुनियादी सुविधाओं पर विचार किया जा सकता है।
साथ ही, स्थानीय समुदायों की सहमति और भागीदारी से पर्यटन की योजना तैयार करना जरूरी होगा। वन क्षेत्र की जैव विविधता, प्राकृतिक जलस्रोतों और स्थानीय संस्कृति को नुकसान पहुंचाए बिना ही विकास के विकल्प तलाशने होंगे।
स्थानीय युवाओं को रोजगार, गांवों की अर्थव्यवस्था को मिल सकता है सहारा
प्राकृतिक पर्यटन को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ावा मिलने पर स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। पर्यटकों को मार्गदर्शन देने, स्थानीय परिवहन, खानपान और क्षेत्रीय उत्पादों से जुड़ी गतिविधियों के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लाभ मिल सकता है।
हालांकि, इसके लिए केवल प्राकृतिक सुंदरता पर्याप्त नहीं होगी। सुरक्षित पहुंच, प्रशासनिक निगरानी, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों को लाभ पहुंचाने वाली स्पष्ट योजना जरूरी होगी।
अबूझमाड़ के कितने प्राकृतिक रहस्य अभी बाकी?
कलंगोट जलप्रपात और धोबे गुंडा घाट/पहाड़ केवल प्राकृतिक आकर्षण नहीं, बल्कि नारायणपुर जिले में पर्यटन की नई संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं। आदिमपार गांव से करीब दो घंटे की पैदल दूरी पर स्थित इस जलप्रपात की पहचान और वहां तक पहुंचने की जानकारी को व्यवस्थित रूप से सामने लाने की जरूरत है।
यदि संबंधित विभाग इन स्थलों का सर्वेक्षण कर पर्यटन की संभावनाओं को परखें, तो अबूझमाड़ की प्राकृतिक विरासत को नई पहचान मिल सकती है।
अब बड़ा सवाल यही है—क्या कलंगोट जलप्रपात और धोबे गुंडा पहाड़ आने वाले समय में अबूझमाड़ के नए पर्यटन केंद्र बनेंगे, या घने जंगलों में छिपी यह प्राकृतिक खूबसूरती अभी और लंबे समय तक पहचान का इंतजार करती रहेगी?



