टूटी पुलिया ने छीना रास्ता तो ग्रामीणों ने खुद संभाली कमान
झारावाही-हतलानार-दुम्मा के ग्रामीणों ने श्रमदान कर शुरू किया सड़क-पुलिया निर्माण, कंधों पर उठाए ह्यूम पाइप; जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

नारायणपुर। बारिश के बीच सड़क और पुलिया बह जाने से जिला मुख्यालय से संपर्क टूटने के बाद आखिरकार ग्रामीणों ने ही रास्ता बहाल करने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। नारायणपुर जिले की ग्राम पंचायत झारावाही में झारावाही से हतलानार होते हुए नारायणपुर जाने वाला मुख्य मार्ग बारिश में पुलिया बह जाने के कारण बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इससे झारावाही, हतलानार और दुम्मा के ग्रामीणों के आवागमन में बड़ी परेशानी खड़ी हो गई।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार शासन-प्रशासन और जनपद स्तर पर मार्ग की स्थिति की जानकारी देकर सड़क एवं पुलिया की मरम्मत की मांग की, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। लगातार परेशानी झेलने के बाद ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से श्रमदान करने का निर्णय लिया और खुद ही क्षतिग्रस्त रास्ते को दुरुस्त करने में जुट गए।
कंधों पर उठाया ह्यूम पाइप, खुद बनाने लगे रास्ता
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे घटनाक्रम के वीडियो में ग्रामीणों की एकजुटता साफ दिखाई दे रही है। बिना किसी बड़ी मशीनरी के ग्रामीण पानी और कीचड़ के बीच उतरकर पुलिया के लिए ह्यूम पाइप लगाने का प्रयास करते नजर आ रहे हैं। कई ग्रामीण मिलकर भारी पाइप को कंधों पर उठाकर मौके तक पहुंचाते और उसे रास्ते में व्यवस्थित करते दिखाई दे रहे हैं।
यह दृश्य केवल ग्रामीणों की मजबूरी को ही नहीं, बल्कि आपसी एकजुटता और श्रमदान की भावना को भी सामने लाता है। जिस काम की उम्मीद ग्रामीण सरकारी तंत्र से कर रहे थे, उसके लिए उन्हें स्वयं आगे आना पड़ा।
सवाल यह नहीं कि ग्रामीणों ने सड़क क्यों बनाई, सवाल यह कि जरूरत क्यों पड़ी?
ग्रामीणों का यह प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं। आखिर बारिश में पुलिया बहने के बाद ग्रामीणों को खुद रास्ता बनाने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ा? यदि ग्रामीणों की ओर से समस्या की सूचना समय पर दी गई थी तो संबंधित विभागों ने मौके का निरीक्षण कर तत्काल अस्थायी अथवा स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं की?
ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क महज आवागमन का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, राशन, रोजगार और प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंच की जीवनरेखा होती है। ऐसे में किसी मार्ग का लंबे समय तक बाधित रहना ग्रामीणों के लिए गंभीर समस्या बन सकता है।
अब प्रशासन को खुद आगे बढ़कर लेनी होगी जिम्मेदारी
ग्रामीणों ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए रास्ता बनाने की पहल कर दी है। अब जरूरत है कि जिम्मेदार विभाग और प्रशासन मौके की वास्तविक स्थिति का तत्काल संज्ञान लें, तकनीकी निरीक्षण कर सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था सुनिश्चित करें और स्थायी समाधान की दिशा में कार्रवाई करें।
ग्रामीणों का श्रमदान किसी सरकारी व्यवस्था का विकल्प नहीं बनना चाहिए। यह घटनाक्रम प्रशासन के लिए एक चेतावनी और सीख भी है कि भविष्य में बारिश से सड़क, पुलिया या संपर्क मार्ग प्रभावित होने की सूचना मिलते ही संबंधित विभाग स्वयं मौके पर पहुंचे और समय रहते आवश्यक कार्रवाई करे, ताकि किसी गांव को जिला मुख्यालय से संपर्क टूटने जैसी स्थिति का सामना न करना पड़े।
वायरल वीडियो में ग्रामीणों की मेहनत साफ दिखाई दे रही है—जहां व्यवस्था का इंतजार खत्म कर ग्रामीणों ने खुद ही रास्ता बनाने की ठानी। अब देखना होगा कि प्रशासन इस सामूहिक प्रयास को केवल ग्रामीणों की मजबूरी मानता है या इसे व्यवस्था में सुधार के लिए एक गंभीर संकेत के रूप में लेता है।