नारायणपुर

पूरे देश में दशहरे पर जलेगा रावण, लेकिन नारायणपुर के इस गांव में एक दिन बाद क्यों होगा दहन? बिंजली की परंपरा के पीछे छिपी है दिलचस्प कहानी!

21 अक्टूबर को रावणभाठा मैदान में सजेगा दशहरा महोत्सव, रामलीला से लेकर लोक संस्कृति की झांकियों तक दिखेगा अनूठा संगम; सामाजिक बुराइयों पर प्रहार करने की भी है खास परंपरा

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। देशभर में विजयादशमी के दिन रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाएगा। मैदानों में रावण के पुतले जलेंगे, आतिशबाजी होगी और भगवान श्रीराम के जयकारे गूंजेंगे। लेकिन छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में एक ऐसा गांव भी है, जहां दशहरे का रोमांच एक दिन बाद चरम पर पहुंचता है। यहां रावण दहन के लिए विजयादशमी के दिन नहीं, बल्कि अगले दिन का इंतजार किया जाता है। आखिर बिंजली गांव में यह परंपरा क्यों निभाई जाती है? इसके पीछे क्या है स्थानीय इतिहास और लोक संस्कृति का संबंध? यही सवाल इस गांव के दशहरे को दूसरे आयोजनों से अलग पहचान देता है।

नारायणपुर जिला मुख्यालय के समीप स्थित ग्राम बिंजली, जिसे बिजली गांव के नाम से भी जाना जाता है, अपने अनूठे दशहरा आयोजन के लिए जाना जाता है। इस बार गांव में 21 अक्टूबर 2026, बुधवार को बिंजली दशहरा महोत्सव आयोजित किया जाएगा। आयोजन को लेकर जारी आमंत्रण पत्र में रामलीला, सांस्कृतिक कार्यक्रम और दशहरा महोत्सव की रूपरेखा दी गई है।

एक दिन का अंतर, लेकिन परंपरा की कहानी दिलचस्प

स्थानीय जानकारी के अनुसार, बिंजली में दशहरे के अगले दिन रावण दहन करने की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है। बताया जाता है कि पहले गांव के लोगों के लिए जिला मुख्यालय और अपने गांव के दशहरा आयोजन में एक साथ शामिल होना मुश्किल होता था। दोनों स्थानों पर उत्सव का आनंद लेने का अवसर मिले, इसी उद्देश्य से गांव में अगले दिन आयोजन करने की परंपरा शुरू हुई।

धीरे-धीरे यह व्यवस्था केवल तारीख बदलने तक सीमित नहीं रही, बल्कि गांव की सांस्कृतिक पहचान बन गई। आज बिंजली का दशहरा अपनी अलग समय-सारिणी, स्थानीय सहभागिता और उत्सव के माहौल के कारण चर्चा में रहता है।

16 अक्टूबर से शुरू हुई रामलीला, 21 को मुख्य आयोजन

इस वर्ष के आमंत्रण पत्र के मुताबिक, ग्राम बिंजली में रामलीला कार्यक्रम की शुरुआत 16 अक्टूबर से निर्धारित की गई है। कार्यक्रम में भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों के मंचन के माध्यम से धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा को सामने लाने की तैयारी है।

इसके बाद बुधवार, 21 अक्टूबर को मुख्य दशहरा महोत्सव आयोजित होगा। आमंत्रण पत्र के अनुसार, कार्यक्रम दोपहर 2 बजे से शुरू होगा। रावणभाठा मैदान, बिंजली में होने वाले आयोजन में रात्रिकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम भी शामिल है। बस्तर लोक सांस्कृतिक समूह की प्रस्तुति रात 8 बजे से निर्धारित की गई है।

इस तरह आयोजन में धार्मिक मंचन, स्थानीय लोक संस्कृति और सामूहिक उत्सव का संगम देखने को मिलेगा।

स्वांग और झांकियां बढ़ाती हैं उत्सव की रौनक

बिंजली दशहरा केवल रावण के पुतले के दहन तक सीमित नहीं है। इस आयोजन की खास पहचान स्थानीय युवाओं के स्वांग, आकर्षक वेशभूषा और झांकियों से भी जुड़ी है। कलाकार विभिन्न रूप धारण कर लोक परंपराओं को जीवंत करते हैं। रामलीला के मंचन के साथ ये प्रस्तुतियां आयोजन को धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव का रूप देती हैं।

दशहरा महोत्सव के दौरान गांव में मेले जैसा माहौल बनने की परंपरा रही है। आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए भी यह आयोजन आपसी मेल-मिलाप और सामूहिक सहभागिता का अवसर बनता है।

यहां रावण सिर्फ एक पुतला नहीं, सामाजिक बुराइयों का प्रतीक भी

बिंजली के दशहरे की एक और विशेषता सामाजिक संदेश से जुड़ी है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, कुछ आयोजनों में रावण के पुतले को नशाखोरी जैसी सामाजिक बुराइयों का प्रतीक बनाकर जागरूकता का संदेश देने की पहल की गई है।

इसका उद्देश्य यह बताना है कि बुराई का अंत केवल प्रतीकात्मक रूप से पुतला जलाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। समाज में व्याप्त नशाखोरी और दूसरी कुरीतियों को दूर करने के लिए भी लोगों को आगे आना होगा। इस दृष्टि से रावण दहन धार्मिक परंपरा के साथ सामाजिक जागरूकता का माध्यम भी बन सकता है।

क्या इस बार भी मिलेगा कोई खास संदेश?

हर साल दशहरे के साथ अच्छाई की जीत का संदेश जुड़ा होता है, लेकिन बिंजली का आयोजन एक अलग सवाल भी खड़ा करता है—क्या रावण दहन केवल एक धार्मिक रस्म है, या समाज की बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लेने का अवसर भी?

इसी सवाल के साथ इस बार का दशहरा महोत्सव भी खास महत्व रखता है। हालांकि, इस वर्ष की किसी विशेष सामाजिक थीम की आधिकारिक पुष्टि आमंत्रण पत्र में नहीं की गई है।

21 अक्टूबर को बिंजली पर रहेंगी निगाहें

ग्राम बिंजली में आयोजित होने वाला यह महोत्सव नारायणपुर की स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रामलीला, लोक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और रावण दहन के जरिए यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ सामुदायिक एकता को भी सामने लाता है।

अब उत्सुकता इस बात को लेकर है कि इस वर्ष महोत्सव में कौन-सी प्रस्तुतियां दर्शकों को आकर्षित करेंगी और रावण दहन के जरिए सामाजिक जागरूकता का क्या संदेश सामने आएगा।

21 अक्टूबर को बिंजली के रावणभाठा मैदान में सजेगा महोत्सव। लेकिन इस आयोजन की असली पहचान सिर्फ एक दिन बाद होने वाला रावण दहन नहीं, बल्कि उसके पीछे चली आ रही परंपरा और उससे जुड़ा सामाजिक संदेश है।

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