नारायणपुर में मां दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा की तर्ज पर सजा गणपति पंडाल
बंगला पारा पावर क्लब की अनूठी पहल, 1990 से चली आ रही गणेश स्थापना की परंपरा में इस बार बस्तर की आराध्य देवी को समर्पित की गई थीम

स्थानीय संसाधनों और समिति सदस्यों के सहयोग से तैयार हुआ पंडाल, गणेशोत्सव के साथ धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का संदेश
(कैलाश सोनी) नारायणपुर। गणेशोत्सव के अवसर पर शहर के बंगला पारा स्थित पावर क्लब गणेश उत्सव समिति ने इस वर्ष श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का एक अलग केंद्र तैयार किया है। समिति ने बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए गणेश पंडाल को मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा की तर्ज पर तैयार किया है। स्थानीय संसाधनों और समिति के सदस्यों के सामूहिक प्रयास से तैयार किया गया यह पंडाल धार्मिक आस्था के साथ बस्तर की सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत कर रहा है।

1990 से चली आ रही गणेश स्थापना की परंपरा
बंगला पारा पावर क्लब समिति द्वारा वर्ष 1990 से लगातार गणेश प्रतिमा की स्थापना की जा रही है। हर वर्ष गणेशोत्सव को अलग स्वरूप देने का प्रयास करने वाली समिति ने इस बार बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को थीम के रूप में चुना।
समिति के सदस्यों ने मां दंतेश्वरी को बस्तर की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हुए मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा का स्वरूप पंडाल को देने पर सहमति जताई। इसके बाद सभी सदस्यों ने मिलकर स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए पंडाल तैयार किया।
पंडाल में दिखी मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा की झलक
पंडाल की बाहरी संरचना को मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा की वास्तुशैली से प्रेरित स्वरूप दिया गया है। लाल रंग की प्रमुख सजावट, प्रवेश द्वार और मंदिरनुमा संरचना के साथ भीतर भगवान गणेश की आकर्षक प्रतिमा स्थापित की गई है। पंडाल को सजाने में समिति के सदस्यों ने स्वयं श्रम किया है।
शाम होते ही पंडाल में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ रही है। पावर क्लब समिति की यह पहल गणेशोत्सव को धार्मिक आस्था के साथ बस्तर की परंपरा और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ रही है।
मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा क्यों है विशेष
जिस मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा की तर्ज पर पावर क्लब ने पंडाल तैयार किया है, वह बस्तर अंचल के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। मंदिर शंखिनी और डंकिनी नदियों के पवित्र संगम क्षेत्र में स्थित है। दंतेवाड़ा नगर का नाम भी मां दंतेश्वरी से जुड़ा हुआ है।
शक्तिपीठ से जुड़ी धार्मिक मान्यता
मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा को लेकर धार्मिक मान्यता है कि यह शक्तिपीठों में शामिल है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे। भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों को अलग किया। मान्यता है कि जिस स्थान पर माता का दांत गिरा, वहां मां दंतेश्वरी की आराधना शुरू हुई।
सदियों पुराना इतिहास
मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा के इतिहास को लेकर उपलब्ध परंपरागत विवरणों में इसके प्राचीन स्वरूप का संबंध लगभग 11वीं-12वीं शताब्दी से बताया जाता है। बाद में 14वीं शताब्दी में वारंगल से आए राजा अन्नमदेव के बस्तर आगमन और काकतीय शासन की स्थापना के साथ मंदिर के जीर्णोद्धार का उल्लेख मिलता है। वर्ष 1932-33 में बस्तर की महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी द्वारा भी मंदिर के जीर्णोद्धार की जानकारी मिलती है।
छह भुजाओं वाली प्रतिमा की विशेष पहचान
मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा में विराजित देवी की प्रतिमा को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। परंपरागत विवरणों के अनुसार काले ग्रेनाइट पत्थर से बनी छह भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी स्वरूप की प्रतिमा यहां विराजमान है। प्रतिमा के साथ शंख, खड्ग, त्रिशूल, घंटी और पद्म सहित विभिन्न आयुधों का उल्लेख मिलता है। चांदी का छत्र और चरण चिह्न भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं।
बस्तर की आराध्य देवी
मां दंतेश्वरी को बस्तर अंचल की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। काकतीय राजवंश की कुलदेवी के रूप में भी उनकी विशेष मान्यता है। बस्तर का प्रसिद्ध दशहरा पर्व मां दंतेश्वरी की आराधना से गहराई से जुड़ा हुआ है।
आस्था के साथ संस्कृति का संदेश
पावर क्लब गणेश उत्सव समिति की पहल गणेशोत्सव में धार्मिक आस्था के साथ बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को जोड़ने का प्रयास है। समिति का उद्देश्य मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान को गणेशोत्सव के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना और नई पीढ़ी को क्षेत्र की विरासत से परिचित कराना है।
1990 से चली आ रही गणेश स्थापना की परंपरा में इस बार मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा की तर्ज पर तैयार पंडाल ने बंगला पारा के गणेशोत्सव को आस्था, परंपरा और संस्कृति के अनूठे संगम का स्वरूप दिया है।




