नारायणपुर

नक्सलमुक्त अबूझमाड़ में हरियाली पर संकट: विकास की राह के साथ हजारों एकड़ जंगलों पर चल रही कुल्हाड़ी

सड़क निर्माण के साथ बढ़ी अंधाधुंध कटाई, सीमांकन नहीं होने से वन विभाग के हाथ बंधे; रोकथाम के लिए ‘वन मित्र’ गठन की तैयारी

कैलाश सोनी
नारायणपुर। पांच दशक तक नक्सलवाद की छाया में रहने वाला अबूझमाड़ 31 मार्च 2026 को नक्सलमुक्त हुआ तो उम्मीद जगी कि अब यह इलाका विकास, शिक्षा और आधुनिक सुविधाओं की नई पहचान बनेगा। लेकिन नक्सलवाद के अंत के बाद जिस तेजी से विकास की किरण यहां पहुंची है, उसी गति से जंगलों पर संकट भी गहराता दिखाई दे रहा है। सड़क निर्माण और नई बसाहटों के विस्तार के साथ अबूझमाड़ के कई हिस्सों में हजारों एकड़ वन क्षेत्र में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई जारी है और यह स्थिति पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है।

जो अबूझमाड़ अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों और जैव विविधता के लिए जाना जाता था, वहां अब बड़ी संख्या में पेड़ों के ठूंठ और खाली होती पहाड़ियां नजर आने लगी हैं। तस्वीरें और स्थानीय स्तर पर सामने आ रहे दृश्य इस बात की गवाही दे रहे हैं कि विकास की रफ्तार के साथ जंगलों का दायरा लगातार सिकुड़ रहा है।

नारायणपुर वन मंडल से कई गुना बड़ा क्षेत्र, लेकिन प्रभावी नियंत्रण नहीं

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नारायणपुर वन मंडल के नियंत्रण वाले क्षेत्र से कई गुना बड़े अबूझमाड़ के विशाल भूभाग पर वन विभाग का प्रभावी नियंत्रण नहीं है। दशकों तक नक्सलवाद की वजह से प्रशासनिक पहुंच सीमित रही और क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आज भी अनसर्वे तथा सीमांकन विहीन श्रेणी में आता है। परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में वन विभाग का नियमित अमला मौजूद नहीं है और न ही निगरानी की सुदृढ़ व्यवस्था बन पाई है।

ऐसे में अब जब सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई है और गांवों तक सड़कें पहुंच रही हैं, तब ग्रामीण अपने उपयोग और खेती योग्य जमीन तैयार करने के लिए जंगलों की सफाई करने में जुट गए हैं। कई स्थानों पर सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों पेड़ों की कटाई किए जाने की बात सामने आ रही है।

जहां सड़क पहुंच रही, वहां तेजी से बदल रहा जंगल का स्वरूप

अबूझमाड़ में जिन क्षेत्रों में सड़क निर्माण कार्य तेज हुआ है, वहां आसपास के जंगलों में भी कटाई की घटनाएं बढ़ी हैं। स्थानीय स्तर पर इरकभट्टी-कच्चापाल मार्ग, तोके से कोड़ेनार, जटवर और बाड़ापेंदा मार्ग, बालेबेड़ा-परियादी-काकुर क्षेत्र, मसपुर से गारपा, होरादी, कांदुलपार और पांगुड़ मार्ग, कोड़कोरसा से आदनार मार्ग, कुतुल से कोड़नार, धुरबेड़ा, आदिमपार, माटवाड़ा और धोबे क्षेत्र के साथ-साथ ओरछा से लंका मार्ग तक बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी रहने की जानकारी सामने आ रही है।

जहां कभी घने जंगलों की हरियाली दिखाई देती थी, वहां अब खुले मैदान, कटे हुए वृक्षों के अवशेष और नई खेती के लिए तैयार की जा रही जमीन दिखाई देने लगी है।

विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती

अबूझमाड़ में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाओं का विस्तार आवश्यक माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विकास कार्यों के साथ पर्यावरण संरक्षण को समान महत्व नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र की जैव विविधता, जल स्रोत और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध अबूझमाड़ केवल नारायणपुर जिले ही नहीं, बल्कि पूरे बस्तर संभाग की पर्यावरणीय धरोहर माना जाता है। ऐसे में अनियंत्रित कटाई भविष्य के लिए गंभीर खतरे का संकेत मानी जा रही है।

वन विभाग ने बताई कार्रवाई में बाधा

वन कटाई के मामले में नारायणपुर वन मंडलाधिकारी डॉ. वेकंटेशा एम.जे. का कहना है कि अबूझमाड़ का बड़ा हिस्सा अनसर्वे क्षेत्र में आता है। सीमांकन नहीं होने और विभागीय अभिलेखों में दर्ज नहीं होने के कारण वहां नियमित वन अमला उपलब्ध नहीं है, जिसकी वजह से प्रभावी कार्रवाई करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने बताया कि प्रदेश के वन मंत्री के मार्गदर्शन में स्थानीय स्तर पर ‘वन मित्र’ समूहों का गठन किया जा रहा है, जिसके माध्यम से वन संरक्षण और अवैध कटाई रोकने के प्रयास किए जाएंगे।

नक्सलवाद खत्म हुआ, लेकिन सामने खड़ी हुई नई चुनौती

पांच दशक तक बंदूक और बारूदी सुरंगों के कारण चर्चा में रहा अबूझमाड़ अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। नक्सलमुक्ति के बाद विकास की रफ्तार तेज हुई है, लेकिन इसके साथ जंगलों के अस्तित्व को बचाने की चुनौती भी सामने खड़ी हो गई है।

यदि समय रहते ठोस रणनीति बनाकर वन संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में अबूझमाड़ अपनी सबसे बड़ी पहचान—घने जंगल और प्राकृतिक वैभव—धीरे-धीरे खो सकता है।

इन क्षेत्रों में बढ़ी वन कटाई

  • इरकभट्टी – कच्चापाल मार्ग
  • तोके – कोड़ेनार – जटवर – बाड़ापेंदा
  • बालेबेड़ा – परियादी – काकुर
  • मसपुर – गारपा – होरादी – कांदुलपार – पांगुड़
  • कोड़कोरसा – आदनार मार्ग
  • कुतुल – कोड़नार – धुरबेड़ा – आदिमपार – माटवाड़ा – धोबे
  • ओरछा – लंका मार्ग

बड़ा सवाल

क्या नक्सलमुक्त अबूझमाड़ विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाकर अपनी हरियाली बचा पाएगा, या फिर हजारों एकड़ जंगल केवल इतिहास बनकर रह जाएंगे?

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