अबूझमाड़ में बाढ़ का कहर: कुकुर नदी के उफान में डूबा बालेबेड़ा बीएसएफ कैंप, जान बचाने पेड़ों और बैरकों की छत पर चढ़े जवान
लगातार मूसलाधार बारिश से चारों ओर फैला पानी, रेस्क्यू कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाए गए जवान; ग्रामीण बोले— पहले ही दी थी नदी किनारे कैंप नहीं बनाने की चेतावनी

नारायणपुर। अबूझमाड़ में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश ने सुरक्षा व्यवस्था को भी चुनौती दे दी। जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित बालेबेड़ा बीएसएफ कैंप कुकुर नदी में आई भीषण बाढ़ की चपेट में आ गया। देखते ही देखते पूरा कैंप चारों ओर से पानी में घिर गया और बैरकों तक बाढ़ का पानी पहुंच गया। हालात इतने गंभीर हो गए कि कैंप में तैनात जवानों को अपनी जान बचाने के लिए बैरकों की छतों और आसपास के पेड़ों पर चढ़कर शरण लेनी पड़ी।
घटना की तस्वीरें सामने आने के बाद पूरे जिले में हड़कंप मच गया। तस्वीरों में जवान पेड़ों की ऊंची शाखाओं और बैरकों की छतों पर बैठे नजर आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि बाद में जोखिम उठाकर राहत एवं बचाव दल ने सभी जवानों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचा दिया।
पहली ही तेज बारिश में पानी-पानी हुआ कैंप
पिछले कई दिनों से हो रही झमाझम बारिश के कारण अबूझमाड़ क्षेत्र के अधिकांश नदी-नाले उफान पर हैं। कुकुर नदी का जलस्तर अचानक बढ़ने से बालेबेड़ा स्थित सुरक्षा एवं जनसुविधा केंद्र पूरी तरह जलमग्न हो गया। कुछ ही समय में कैंप के चारों ओर तेज बहाव का पानी भर गया और बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया। अचानक आई इस स्थिति ने जवानों को संभलने का मौका तक नहीं दिया।
स्थिति इतनी विकट हो गई कि जवानों को तत्काल बैरकों की छतों और आसपास के बड़े पेड़ों पर चढ़कर अपनी जान बचानी पड़ी। घंटों तक वे वहीं फंसे रहे, जिसके बाद सुरक्षित निकासी की कार्रवाई की गई।
ग्रामीणों ने पहले ही किया था आगाह
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जब बालेबेड़ा में सुरक्षा कैंप स्थापित किया जा रहा था, तब उन्होंने सुरक्षा बलों को स्पष्ट रूप से चेताया था कि कुकुर नदी के किनारे का क्षेत्र बरसात में हर वर्ष जलमग्न हो जाता है। ग्रामीणों ने सलाह दी थी कि कैंप को कुछ दूरी पर ऊंचे स्थान पर बनाया जाए, ताकि बारिश के मौसम में बाढ़ जैसी स्थिति से बचा जा सके।
ग्रामीणों के अनुसार उनकी इस सलाह पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया और नदी किनारे ही कैंप का निर्माण एवं संचालन शुरू कर दिया गया। इसका परिणाम पहली ही बड़ी बारिश में सामने आ गया, जब पूरा कैंप बाढ़ में डूब गया और जवानों को अपनी जान बचाने के लिए पेड़ों और छतों का सहारा लेना पड़ा।
अब सुरक्षा व्यवस्था और कैंप चयन पर उठे सवाल
इस घटना ने सुरक्षा कैंपों के चयन, भू-स्थिति के आकलन और मानसून पूर्व तैयारी को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सल प्रभावित और दुर्गम क्षेत्रों में कैंप स्थापित करने से पहले भूगर्भीय एवं जल प्रवाह का वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है, ताकि इस प्रकार की आपात स्थिति से बचा जा सके।
हालांकि राहत की बात यह रही कि समय रहते सभी जवानों को सुरक्षित निकाल लिया गया और किसी जनहानि की सूचना नहीं है। लेकिन बालेबेड़ा की यह घटना यह संकेत जरूर देती है कि अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं को देखते हुए सुरक्षा ढांचे और कैंपों की योजना का पुनर्मूल्यांकन करना जरूरी होगा।
- बालेबेड़ा बीएसएफ कैंप कुकुर नदी की बाढ़ में पूरी तरह जलमग्न।
- जवानों ने पेड़ों और बैरकों की छत पर चढ़कर बचाई जान।
- बाद में रेस्क्यू कर सभी जवानों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।
- ग्रामीणों का दावा— नदी किनारे कैंप नहीं बनाने की पहले ही दी थी चेतावनी।
- घटना के बाद कैंप चयन और मानसून तैयारी पर गंभीर सवाल।




