जंगल की धरती से आत्मनिर्भरता की नई कहानी
नारायणपुर के कृषि महाविद्यालय में मशरूम अचार ने खोले रोजगार के नए रास्ते

छात्रा प्रीति सांगिले की पहल बनी प्रेरणा, वैल्यू एडेड प्रोडक्ट से ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को मिल सकता है स्वरोजगार
(कैलाश सोनी) नारायणपुर। बस्तर अंचल की पहचान अब केवल वनों, प्राकृतिक सौंदर्य और जनजातीय संस्कृति तक सीमित नहीं रही। यहां के युवा अब कृषि आधारित नवाचारों के जरिए आत्मनिर्भरता की नई इबारत भी लिख रहे हैं। नारायणपुर स्थित लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र में तैयार किया गया “मशरूम अचार” इसी बदलते दौर की एक प्रेरणादायक मिसाल बनकर सामने आया है।

महाविद्यालय के चतुर्थ वर्ष के मॉड्यूल कार्यक्रम के अंतर्गत छात्रा प्रीति सांगिले ने मशरूम से वैल्यू एडेड प्रोडक्ट के रूप में पौष्टिक अचार तैयार कर यह साबित कर दिया कि खेती और कृषि उत्पाद केवल उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें रोजगार और उद्यमिता की अपार संभावनाएं भी छिपी हुई हैं। यह प्रयोग अब केवल एक शैक्षणिक गतिविधि नहीं रह गया, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाले मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल, बस्तर जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण परिवार मशरूम उत्पादन से जुड़े हैं, लेकिन बाजार की सीमित पहुंच और संरक्षण की कमी के कारण उन्हें पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता। ऐसे में मशरूम को लंबे समय तक सुरक्षित रखने और उससे अधिक मूल्य प्राप्त करने के लिए वैल्यू एडेड उत्पाद तैयार करना एक कारगर विकल्प बनकर उभरा है। मशरूम अचार इसी दिशा में किया गया ऐसा प्रयास है, जिसने ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए नए अवसरों के द्वार खोल दिए हैं।
महाविद्यालय की अधिष्ठाता डॉ. रत्ना नशीने के मार्गदर्शन में संचालित इस गतिविधि में विद्यार्थियों को केवल तकनीकी जानकारी ही नहीं दी गई, बल्कि उन्हें यह भी समझाया गया कि कृषि आधारित छोटे-छोटे नवाचार किस प्रकार बड़े आर्थिक बदलाव का आधार बन सकते हैं। कार्यक्रम में डॉ. मदनलाल कुर्रे, डॉ. जी.पी. भास्कर, डॉ. देवेंद्र कुमार कुर्रे, डॉ. नवीन कुमार मरकाम, डॉ. पुष्पेंद्र सिंह पैकरा, डॉ. सविता आदित्य, डॉ. पुष्पराज दीवान एवं डॉ. विवेक विश्वकर्मा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मॉड्यूल कोर्स टीचर डॉ. विवेक विश्वकर्मा के विशेष निर्देशन में विद्यार्थियों ने इस प्रयोग को सफलतापूर्वक पूरा किया।
स्वाद के साथ पोषण का अनोखा मेल
विशेषज्ञों के अनुसार मशरूम को “सुपर फूड” की श्रेणी में रखा जाता है। इसमें प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और कई प्रकार के खनिज तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच मशरूम की मांग लगातार बढ़ रही है। हालांकि ताजा मशरूम जल्दी खराब हो जाता है, जिसके कारण किसानों को कई बार नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे में मशरूम से अचार, पापड़, सूप पाउडर और अन्य वैल्यू एडेड उत्पाद तैयार करना किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
छात्रा प्रीति सांगिले द्वारा तैयार किए गए दूधिया मशरूम अचार की प्रक्रिया भी काफी सरल और कम लागत वाली है। सबसे पहले ताजे मशरूम को साफ कर हल्का उबाला गया, फिर कुछ समय तक धूप में सुखाया गया। इसके बाद सरसों तेल में मेथी, सौंफ, हल्दी, लाल मिर्च, राई, हींग और अन्य मसालों को भूनकर मशरूम के साथ मिलाया गया। तैयार अचार को स्वच्छ कांच के जार में वायुरोधी तरीके से सुरक्षित रखा गया। विशेषज्ञों का कहना है कि सही तरीके से तैयार किया गया यह अचार लंबे समय तक सुरक्षित रह सकता है और बाजार में इसकी अच्छी मांग भी बन सकती है।
महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का जरिया
महाविद्यालय के विशेषज्ञों का मानना है कि मशरूम अचार जैसे उत्पाद ग्रामीण महिलाओं के लिए घरेलू उद्योग का रूप ले सकते हैं। कम पूंजी और सीमित संसाधनों में शुरू होने वाला यह कार्य महिला स्व-सहायता समूहों के लिए आय का मजबूत स्रोत बन सकता है। यदि स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण, पैकेजिंग और विपणन की सुविधा उपलब्ध कराई जाए तो बस्तर क्षेत्र के कई गांवों में यह रोजगार का बड़ा माध्यम बन सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आज के दौर में केवल खेती करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण और ब्रांडिंग भी जरूरी हो गई है। यदि किसान अपने उत्पादों को सीधे बाजार की जरूरतों के अनुसार तैयार करें, तो उन्हें अधिक लाभ मिल सकता है। मशरूम अचार इसी सोच का हिस्सा है, जहां एक साधारण कृषि उत्पाद को बाजार योग्य ब्रांड में बदलने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है।
पढ़ाई के साथ व्यावहारिक ज्ञान पर जोर
लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय में विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक शिक्षा तक सीमित नहीं रखा जा रहा, बल्कि उन्हें व्यावहारिक गतिविधियों से भी जोड़ा जा रहा है। मॉड्यूल कार्यक्रम के माध्यम से छात्र-छात्राओं को खेती, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और उद्यमिता के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी जा रही है। इससे विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ रहा है और वे नौकरी तलाशने के बजाय स्वयं रोजगार सृजित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
महाविद्यालय प्रबंधन का मानना है कि नई शिक्षा नीति के तहत कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना समय की जरूरत है। कृषि क्षेत्र में नवाचार और तकनीक के समावेश से ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया जा सकता है। इसी सोच के साथ विद्यार्थियों को ऐसे प्रयोगों के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जो सीधे समाज और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े हों।
बस्तर में बदल रही कृषि की तस्वीर
एक समय था जब बस्तर क्षेत्र को केवल परंपरागत खेती तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब यहां के युवा नई तकनीकों और वैल्यू एडेड उत्पादों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। मशरूम उत्पादन, जैविक खेती, मिलेट्स और वन उत्पाद आधारित उद्योगों ने ग्रामीण क्षेत्रों में नई उम्मीद जगाई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि ऐसे प्रयासों को सरकारी योजनाओं और बाजार से बेहतर समर्थन मिले, तो बस्तर आने वाले वर्षों में कृषि आधारित उद्यमिता का बड़ा केंद्र बन सकता है।
नारायणपुर कृषि महाविद्यालय की यह पहल केवल एक शैक्षणिक गतिविधि नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि छोटे-छोटे नवाचार बड़े बदलाव की नींव बन सकते हैं। छात्रा प्रीति सांगिले द्वारा तैयार किया गया मशरूम अचार अब कई युवाओं और महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रहा है। यह पहल बताती है कि यदि शिक्षा को कौशल और नवाचार से जोड़ा जाए, तो गांवों में भी आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार हो सकता है।




