अबूझमाड़ के दूरस्थ अंचलों में शिक्षा की नई राह, 24 वैकल्पिक शालाओं से 800 बच्चों को जोड़ने की पहल
बंद पड़े स्कूलों में फिर गूंजने लगी पढ़ाई की आवाज, जेईई-नीट की नि:शुल्क कोचिंग से इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज तक पहुंच रहे विद्यार्थी

नारायणपुर। कभी स्कूलों से दूरी, दुर्गम रास्ते और संसाधनों की कमी जिन बच्चों की पढ़ाई में बाधा बनती थी, अब उन तक शिक्षा पहुंचाने के लिए जिले में नए प्रयास किए जा रहे हैं। नक्सल प्रभावित और दूरस्थ अंचलों में बंद विद्यालयों को दोबारा शुरू करने, नए स्कूल खोलने और वैकल्पिक शालाओं के संचालन से बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने की पहल तेज हुई है। स्कूल शिक्षा विभाग के अनुसार, जिले में 24 वैकल्पिक शालाओं के माध्यम से लगभग 800 बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का प्रयास किया गया है। वहीं, नि:शुल्क प्रतियोगी परीक्षा कोचिंग, स्मार्ट क्लास और व्यावसायिक शिक्षा से विद्यार्थियों के सामने आगे बढ़ने के नए अवसर खुल रहे हैं।

बंद स्कूलों में फिर शुरू हुई पढ़ाई
नियद नेल्ला नार योजना के तहत शिक्षा सत्र 2024-25 में ईरक्कभट्टी, जड्डा, ताडोबेडा और तोयामेटा (एनमेटा) में चार नए प्राथमिक विद्यालय शुरू किए गए। इसके साथ ही लंबे समय से बंद नौ प्राथमिक शालाओं में दोबारा पढ़ाई शुरू कराई गई। विभागीय जानकारी के अनुसार, इन प्रयासों से 207 विद्यार्थियों को लाभ मिला।

शिक्षा सत्र 2025-26 और 2026-27 में 24 वैकल्पिक शालाओं का संचालन शुरू किया गया। इससे उन गांवों के बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का प्रयास हुआ, जहां नियमित विद्यालयों तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण रहा है। सत्र 2026-27 में चार प्राथमिक शालाओं का शुभारंभ भी किया गया है।
सर्वे में मिले 2,342 बच्चे, स्कूल से जोड़ने की पहल
शाला त्यागी और अप्रवेशी बच्चों की पहचान के लिए जिले में ‘स्कूल केईंता’ अभियान चलाया गया। इसके तहत 24,701 परिवारों का सर्वेक्षण किया गया। सर्वे में 1,047 शाला त्यागी और 1,295 अप्रवेशी बच्चों की पहचान हुई। इस तरह कुल 2,342 बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने की जरूरत सामने आई।
जिले में वर्तमान में 538 विद्यालय संचालित हैं। आवासीय शिक्षा के लिए दो कस्तूरबा गांधी विद्यालय, दो पोर्टा केबिन विद्यालय और एक डॉरमेट्री की सुविधा उपलब्ध है। केंद्रीय विद्यालय और जवाहर नवोदय विद्यालय भी विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक अवसर प्रदान कर रहे हैं।
शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए 187 शासकीय शालाओं में 273 अतिथि शिक्षकों की स्वीकृति दी गई है। इसके अलावा जरूरत वाले गांवों में शिक्षा दूतों के माध्यम से भी बच्चों की पढ़ाई जारी रखने की व्यवस्था की जा रही है।
नि:शुल्क कोचिंग से इंजीनियरिंग-मेडिकल कॉलेज तक पहुंच
दूरस्थ अंचलों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के बेहतर अवसर देने के लिए जिले में पिछले दो वर्षों से जेईई और नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की नि:शुल्क कोचिंग संचालित की जा रही है।
शिक्षा सत्र 2025-26 में गणित संकाय के 29 विद्यार्थियों में से 16 का चयन विभिन्न प्रतिष्ठित शासकीय इंजीनियरिंग महाविद्यालयों में हुआ। वहीं, जीवविज्ञान संकाय के सात विद्यार्थियों ने नीट के माध्यम से काउंसलिंग प्रक्रिया में सफलता प्राप्त की। इनमें एक विद्यार्थी का चयन शासकीय मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिए हुआ है।
ये परिणाम बताते हैं कि उचित मार्गदर्शन और तैयारी के अवसर मिलने पर दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थी भी तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं।
स्मार्ट क्लास से लेकर अटल टिंकरिंग लैब तक
जिले में डिजिटल और नवाचार आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 10 आईसीटी लैब और 32 स्मार्ट क्लास संचालित हैं। इनके माध्यम से विद्यार्थियों को डिजिटल शिक्षण सामग्री की मदद से विषयों को सरल और रोचक तरीके से समझने का अवसर मिल रहा है।
आठ विद्यालयों में अटल टिंकरिंग लैब के जरिए विद्यार्थियों को वैज्ञानिक प्रयोग, तकनीकी नवाचार और मॉडल निर्माण से परिचित कराया जा रहा है। वहीं, 12 हायर सेकेंडरी स्कूलों में व्यावसायिक शिक्षा संचालित है, जिससे विद्यार्थियों को रोजगारोन्मुखी कौशल और व्यावहारिक ज्ञान मिल रहा है।
जिले के दोनों विकासखंडों में एक-एक पीएम श्री विद्यालय और कुल सात स्वामी आत्मानंद विद्यालय संचालित हैं। विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के विद्यार्थियों के लिए पीएम जनमन योजना के अंतर्गत 100-100 सीटों वाले बालक और बालिका छात्रावासों के संचालन की दिशा में भी काम शुरू किया गया है।
चुनौती अब शिक्षा की निरंतरता और गुणवत्ता की
नारायणपुर के दूरस्थ अंचलों में विद्यालयों का संचालन, बच्चों की पहचान, डिजिटल सुविधाओं का विस्तार और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के अवसर शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। हालांकि, इन प्रयासों की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बच्चे नियमित रूप से स्कूल पहुंचें, उन्हें पर्याप्त शिक्षक और जरूरी संसाधन मिलें तथा शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार सुधार हो।
जिले के बोर्ड परीक्षा परिणामों में भी बेहतर स्थिति की जानकारी दी गई है। दूरस्थ गांवों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की पहल यदि इसी तरह निरंतर जारी रहती है, तो उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों तक उनकी पहुंच और मजबूत हो सकती है।



