नक्सली खौफ छंटा तो फिर गूंजने लगी मांदर की थाप
अबूझमाड़ के घोटुलों में लौटी रौनक, शाम ढलते ही चेलिक-मोटियारिनों के गीत और नृत्य से जीवंत हो रही आदिवासी संस्कृति

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। कभी गोलियों की आवाज, बंदूक के साये और अनिश्चितता से घिरी रहने वाली अबूझमाड़ की शामें अब फिर अपनी पुरानी लय में लौट रही हैं। सूर्य ढलते ही गांवों में सन्नाटे की जगह चहल-पहल दिखाई देने लगी है। घरों से निकलते कदम घोटुल की ओर बढ़ रहे हैं और वहां पहुंचते ही मांदर की थाप के साथ पारंपरिक गीतों की स्वर लहरियां वातावरण में घुलने लगी हैं। चेलिक और मोटियारिनों के सामूहिक नृत्य से घोटुल फिर गुलजार होने लगे हैं।

नक्सल प्रभाव और हिंसा के लंबे दौर में जिन गांवों में शाम होते ही लोग घरों में सिमट जाते थे, वहां अब युवा पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक उल्लास के साथ घोटुल में जुट रहे हैं। यह बदलाव महज सामान्य जनजीवन की वापसी नहीं, बल्कि अबूझमाड़ की आदिवासी संस्कृति के फिर से सांस लेने की कहानी भी कह रहा है।
जहां कभी शाम का मतलब था सन्नाटा, अब वहां गूंजती है मांदर
अबूझमाड़ में लंबे समय तक हिंसा और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का असर सामाजिक जीवन पर भी पड़ा। ग्रामीणों के मुताबिक शाम होते ही गांवों में आवाजाही कम हो जाती थी। किसी अप्रिय घटना की आशंका के बीच लोग घरों से बाहर निकलने से बचते थे। त्योहार, सामूहिक आयोजन और सांस्कृतिक गतिविधियां भी प्रभावित हुईं।

घोटुल, जो आदिवासी समाज के सामुदायिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, उसकी गतिविधियां भी कई जगह प्रभावित हुईं। युवाओं के मिलने-जुलने, लोकगीत सीखने, पारंपरिक नृत्य करने और सामाजिक अनुशासन से परिचित होने की यह व्यवस्था लंबे समय तक भय के माहौल में अपनी पूरी जीवंतता के साथ संचालित नहीं हो सकी।
अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। नक्सल प्रभाव में कमी और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के साथ ग्रामीणों में भरोसा बढ़ा है। गांवों में आवाजाही बढ़ी है और सामुदायिक गतिविधियां फिर गति पकड़ रही हैं। इसी बदलाव की सबसे खूबसूरत तस्वीर घोटुलों में दिखाई दे रही है।
घोटुल : संस्कृति की पाठशाला
आदिवासी समाज में घोटुल केवल युवाओं के मिलने-जुलने का स्थान नहीं है। यह सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की ऐसी संस्था है, जहां नई पीढ़ी अपनी परंपराओं से परिचित होती है।
चेलिक यानी युवक और मोटियारिन यानी युवतियां यहां लोकगीत, पारंपरिक नृत्य, सामाजिक व्यवहार, अनुशासन और सामूहिक जीवन के तौर-तरीके सीखते हैं। बुजुर्गों और नई पीढ़ी के बीच सांस्कृतिक ज्ञान का हस्तांतरण भी इसी माध्यम से होता रहा है।
यही कारण है कि घोटुलों में लौटती रौनक को केवल मनोरंजन की गतिविधि के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह अपनी जड़ों, परंपराओं और सामुदायिक पहचान से फिर जुड़ने का संकेत है।
बंदूक की आवाज के बीच दब गई थी गीतों की आवाज
हिंसा के दौर को याद करते हुए ग्रामीण बताते हैं कि गांव में हर समय अनिश्चितता बनी रहती थी। रास्तों पर निकलने से पहले कई बार सोचना पड़ता था। जंगल और गांव के बीच आवाजाही भी आसान नहीं थी। ऐसे माहौल में सामूहिक उत्सव और सांस्कृतिक आयोजन स्वाभाविक रूप से प्रभावित हुए।
ग्रामीणों के लिए अपने ही गांव में सहज होकर शाम बिताना भी कभी चुनौती जैसा था। घोटुलों में होने वाली गतिविधियां कम हुईं तो उसका असर केवल मनोरंजन पर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपराओं के सतत प्रवाह पर भी पड़ा।
आज जब उसी गांव में शाम ढलने के बाद युवा घोटुल पहुंचते हैं तो बुजुर्गों के चेहरे पर अलग ही संतोष दिखाई देता है। मांदर की थाप और गीतों के बीच थिरकते कदम उन्हें उन दिनों की याद दिलाते हैं, जब गांव का सामुदायिक जीवन अपनी पूरी रंगत में हुआ करता था।
जंगल, नदी और पहाड़ों से जुड़ी है लोक संस्कृति
अबूझमाड़ की आदिवासी संस्कृति प्रकृति के बेहद करीब है। यहां के लोकगीतों में जंगल, पहाड़, नदी, खेत, ऋतुओं, सामाजिक रिश्तों और रोजमर्रा के जीवन की झलक मिलती है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन इन गीतों को सामूहिक अभिव्यक्ति देती है।
घोटुल इस सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। यहां युवा केवल गीत और नृत्य नहीं सीखते, बल्कि अपने समाज की पहचान और परंपराओं से जुड़ते हैं।
इसलिए घोटुल में फिर सुनाई दे रही मांदर की थाप को अबूझमाड़ के सांस्कृतिक जीवन की वापसी का प्रतीक माना जा रहा है।
सुरक्षा के साथ लौट रहा भरोसा
नक्सल प्रभाव में कमी के बाद अबूझमाड़ के कई हिस्सों में सामान्य गतिविधियों को बढ़ावा मिला है। सुरक्षा अभियानों का असर ग्रामीण जीवन में भी दिखाई देने लगा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों के बीच सुरक्षा व्यवस्था में आए बदलाव को ग्रामीण अपने अनुभवों से जोड़कर देखते हैं।
हालांकि उनके लिए बदलाव का सबसे बड़ा पैमाना कोई आंकड़ा नहीं, बल्कि रोजमर्रा का जीवन है। खेतों तक पहुंचने में सहजता, बाजार तक आवाजाही, गांव में लोगों का एक-दूसरे से मिलना और शाम को घोटुल में युवाओं का जुटना—ये ग्रामीणों के लिए शांति के सबसे स्पष्ट संकेत हैं।
भय पीछे हटा तो संस्कृति ने खुद पकड़ ली अपनी लय
अबूझमाड़ की सबसे खास बात उसकी सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता है। यहां की परंपराएं किसी बाहरी आयोजन से पैदा नहीं होतीं। अनुकूल वातावरण मिलते ही वे स्वयं समुदाय के जीवन में लौट आती हैं।
आज यही तस्वीर कई गांवों में दिखाई दे रही है। शाम ढलते ही घोटुल की ओर बढ़ते कदम, मांदर की थाप, सामूहिक गीत और पारंपरिक नृत्य उस बदलाव को बयान कर रहे हैं, जिसे शब्दों से ज्यादा महसूस किया जा सकता है।
जहां पहले शाम सन्नाटे और आशंका का पर्याय बन गई थी, वहीं अब कई गांवों में शाम का मतलब सामुदायिक मिलन और सांस्कृतिक उल्लास बनता जा रहा है।
सिर्फ सुरक्षा नहीं, विकास भी जरूरी
हालांकि इस बदलाव को स्थायी और मजबूत बनाने के लिए केवल सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। अबूझमाड़ के गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, संचार, रोजगार और स्थानीय युवाओं के लिए अवसरों का विस्तार भी जरूरी है।
इसके साथ ही आदिवासी समाज की परंपराओं और सांस्कृतिक संस्थाओं के संरक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा। घोटुल जैसी स्थानीय संस्थाओं को समुदाय की भागीदारी के साथ मजबूत किया जाए तो यह नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकती हैं।
मांदर की थाप में सुनाई दे रही सामान्य जीवन की वापसी
शाम का अंधेरा गहराता है, लेकिन घोटुलों की रौनक बढ़ती जाती है। मांदर की थाप तेज होती है। गीतों की स्वर लहरियां वातावरण में फैलती हैं और चेलिक-मोटियारिनों के कदम पारंपरिक नृत्य की लय पकड़ लेते हैं।
यह सिर्फ गीत-संगीत नहीं है। यह उन गांवों की कहानी है जिन्होंने लंबे समय तक भय और हिंसा का सामना किया। यह उन बुजुर्गों की खुशी है जो अपनी परंपराओं को फिर जीवंत होते देख रहे हैं। यह नई पीढ़ी का अपनी पहचान से जुड़ने का उत्साह है।
अबूझमाड़ में घोटुल की लौटती रौनक इसलिए खास है, क्योंकि मांदर की हर थाप के साथ सामान्य जीवन की एक नई धुन सुनाई दे रही है। भय पीछे हट रहा है और आदिवासी संस्कृति अपनी पुरानी लय में फिर मुस्कुराने लगी है।




