लाल ज़हर ने निगल लिए खेत… रावघाट माइंस के अपशिष्ट से फसलें तबाह, जलस्रोत भी संकट में
लगातार बारिश में अंजरेल माइंस से बहा लौह अयस्क मिश्रित लाल पानी और चिपचिपा मलबा, 50-60 किसान सीधे प्रभावित होने का दावा • कई एकड़ धान की फसल लाल कीचड़ में दबी • ग्रामीणों ने पांच वर्षों से समस्या बने रहने का लगाया आरोप, प्रशासन ने जांच और नुकसान के आकलन की कही बात

नारायणपुर। रावघाट लौह अयस्क खनन क्षेत्र से एक बार फिर पर्यावरण और किसानों की आजीविका से जुड़ा गंभीर मामला सामने आया है। लगातार हो रही बारिश के बीच अंजरेल माइंस से बहकर आया लौह अयस्क मिश्रित लाल पानी और चिपचिपा अपशिष्ट खोड़गांव ग्राम पंचायत के अंजरेल सहित आसपास के खेतों, जलस्रोतों और निचले इलाकों में फैल गया है। किसानों का आरोप है कि कई एकड़ में लगी धान की फसल लाल कीचड़ की मोटी परत के नीचे दब गई है, जबकि प्राकृतिक जलस्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले करीब पांच वर्षों से यह समस्या बनी हुई है, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं हो पाया। दूसरी ओर प्रशासन ने मामले को गंभीर बताते हुए जांच दल गठित कर नुकसान का आकलन कराने की बात कही है।

रावघाट क्षेत्र देश के महत्वपूर्ण लौह अयस्क भंडारों में शामिल है और यहां से निकला उच्च गुणवत्ता का लौह अयस्क भिलाई इस्पात संयंत्र तक पहुंचाया जाता है। लेकिन स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि खनन गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव अब गांवों और कृषि भूमि पर साफ दिखाई देने लगा है। लगातार बारिश के दौरान माइंस क्षेत्र से बहकर आया लाल रंग का पानी और लौह अयस्क युक्त मलबा खेतों में फैल गया। कई स्थानों पर यह मलबा खेतों, मेड़ों और रास्तों पर जम गया है तथा निचले इलाकों तक पहुंच गया है।

कई एकड़ खेत लाल कीचड़ से पटे, किसानों की मेहनत पर फिरा पानी
ग्रामीणों के अनुसार अंजरेल और खोड़गांव पंचायत के लगभग 50 से 60 किसान सीधे इस समस्या से प्रभावित हुए हैं, जबकि आसपास के सैकड़ों किसान आंशिक रूप से इसकी चपेट में हैं। किसानों का दावा है कि करीब 20 से 30 किसानों की कई एकड़ कृषि भूमि पर लाल कीचड़ की कई टन मोटी परत जम गई है, जिससे धान सहित अन्य फसलें बर्बाद होने की स्थिति में पहुंच गई हैं।

किसानों का कहना है कि एक ओर खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, दूसरी ओर हर वर्ष इस तरह की स्थिति उनकी आर्थिक कमर तोड़ रही है। उनका आरोप है कि यदि समय रहते प्रभावी रोकथाम नहीं की गई तो आने वाले वर्षों में खेती करना मुश्किल हो जाएगा।
जलस्रोतों तक पहुंचा लाल पानी, पेयजल को लेकर बढ़ी चिंता
ग्रामीणों का कहना है कि माइंस क्षेत्र से निकला लाल पानी खेतों से होकर तालाबों, नालों, झरिया और कच्चे कुओं तक पहुंच रहा है। अंजरेल गांव के अनेक परिवार आज भी प्राकृतिक जलस्रोतों पर निर्भर हैं। ऐसे में लाल अपशिष्ट के संपर्क में आने से पेयजल की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। ग्रामीणों ने प्रशासन से पानी की गुणवत्ता की वैज्ञानिक जांच कराने और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की मांग की है।
खेतों और जलभराव वाले क्षेत्रों में मृत मिले जलीय जीव
ग्रामीणों का दावा है कि जिन खेतों और जलभराव वाले क्षेत्रों में लाल पानी जमा हुआ है, वहां छोटी मछलियां, केकड़े और अन्य जलीय जीव मृत अवस्था में मिले हैं। कई स्थानों पर दुर्गंध भी महसूस की जा रही है। हालांकि, इन जीवों की मृत्यु का कारण अभी किसी वैज्ञानिक अध्ययन या आधिकारिक जांच रिपोर्ट से प्रमाणित नहीं हुआ है। इस संबंध में प्रशासनिक जांच का इंतजार है।
‘पांच साल से सुन रहे आश्वासन, नहीं मिला स्थायी समाधान’
ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले करीब पांच वर्षों से हर बारिश में यही स्थिति बनती है। कई बार शिकायतें करने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। उनका कहना है कि हर वर्ष नुकसान का दायरा बढ़ता जा रहा है और प्रभावित किसानों को पर्याप्त राहत भी नहीं मिलती।
प्रशासन ने कहा- जांच कर होगा नुकसान का आकलन
मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने जांच दल गठित कर नुकसान का आकलन शुरू कराने की बात कही है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई और आवश्यक निर्णय लिए जाने की जानकारी दी गई है।
क्या हैं ग्रामीणों के प्रमुख आरोप
- अंजरेल माइंस से लाल पानी और लौह अयस्क मिश्रित अपशिष्ट खेतों में पहुंचा।
- लगभग 50-60 किसान सीधे प्रभावित होने का दावा।
- कई एकड़ धान की फसल लाल कीचड़ से ढंकी।
- तालाब, नाले, झरिया और कच्चे कुएं प्रभावित होने की आशंका।
- पिछले पांच वर्षों से समस्या बने रहने का आरोप।
- प्रशासन ने जांच और नुकसान के आकलन की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही।




