
परलकोट से अबूझमाड़ तक घटनाओं की कड़ी… वन्यजीव गलियारे की सुरक्षा पर उठे सवाल | स्थानीय समुदाय को संरक्षण से जोड़ने और संयुक्त सर्वे की मांग

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। कभी नक्सल गतिविधियों के कारण बाहरी दुनिया से लगभग कटा रहा अबूझमाड़ अब धीरे-धीरे सुरक्षा और विकास के नक्शे पर आ रहा है। लेकिन इसी बदलाव के बीच अब जंगल के भीतर एक नई चिंता दस्तक दे रही है—वन्यजीवों के शिकार और उनकी खाल की तस्करी। नारायणपुर के धोड़ाई क्षेत्र में तेंदुए की खाल बरामद होने और आरोपियों की गिरफ्तारी ने इस पूरे इलाके में वन्यजीव सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
करीब 3 हजार 900 वर्ग किलोमीटर में फैला अबूझमाड़ घने जंगल, पहाड़, नदी-नालों और दुर्गम भू-भाग के कारण लंबे समय तक प्रशासनिक और वन विभागीय निगरानी के लिए चुनौती रहा है। अब सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ी है, सड़क और संचार सुविधाओं का विस्तार हो रहा है, ऐसे में जंगलों में नियमित निगरानी का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।
धोड़ाई रेंज में तेंदुए की खाल बरामदगी अकेली घटना नहीं है। कांकेर के परलकोट पीवी-19 में मवेशी के शिकार के बाद मिले पंजों के निशान, महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ सीमा क्षेत्र में बाघों की खाल बरामदगी और नारायणपुर के जंगलों में तेंदुए की खाल मिलने जैसी घटनाएं एक बड़े वन्यजीव परिदृश्य की ओर इशारा कर रही हैं।

धोड़ाई में तेंदुए की खाल, तीन आरोपी पकड़े गए
धोड़ाई रेंज में कार्रवाई के दौरान वन विभाग की टीम ने तेंदुए की खाल बरामद की। मामले में तीन आरोपियों को पकड़े जाने की जानकारी सामने आई है। बरामद खाल की तस्वीरें भी सामने आई हैं, जिसमें पूरा तेंदुआ चमड़ा सहित दिखाई दे रहा है।

अब जांच का सबसे अहम हिस्सा केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं होना चाहिए। वन विभाग और जांच एजेंसियों के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि—
तेंदुए का शिकार कहां हुआ?
खाल किसने उपलब्ध कराई?
इसे किसे बेचा जाना था?
क्या इसके पीछे स्थानीय शिकारी हैं या कोई संगठित गिरोह?
और क्या इसका नेटवर्क जिले अथवा राज्य की सीमा से बाहर तक फैला है?
वन्यजीव अपराध में अंतिम खरीदार तक पहुंचना ही पूरे नेटवर्क को तोड़ने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होती है।

परलकोट में मवेशी का शिकार, पंजों के निशान ने बढ़ाई चिंता
कांकेर जिले के परलकोट क्षेत्र के पीवी-19 में जंगल में एक गाय के शिकार की घटना भी सामने आई। मौके की तस्वीरों में मवेशी के शरीर पर शिकारी वन्यजीव के हमले के निशान दिखाई दे रहे हैं। वहीं कीचड़ में मिले पंजों के निशान भी जांच का अहम आधार बने हैं।

तस्वीर में दर्ज स्थान की स्थिति भी घटना के भौगोलिक संदर्भ को स्पष्ट करती है। ग्रामीणों में इसे लेकर दहशत का माहौल बना और क्षेत्र में वन्यजीवों की आवाजाही को लेकर निगरानी बढ़ाने की मांग उठी।
यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि परलकोट क्षेत्र महाराष्ट्र की ओर जाने वाले वन क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यहां वन्यजीवों की आवाजाही को अलग-थलग घटना मानने के बजाय पूरे वन परिदृश्य से जोड़कर देखना जरूरी है।

बाघ की खाल बरामदगी ने भी खोली बड़ी तस्वीर
महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ सीमा क्षेत्र में बाघों की खाल बरामदगी के मामले ने वन्यजीव तस्करी के अंतरराज्यीय पहलू को भी सामने ला दिया है। जून 2026 में दो बाघों की खाल बरामद होने के बाद जांच आगे बढ़ी और तीसरी खाल भी बरामद हुई। जांच में इन मामलों की कड़ियां इंद्रावती टाइगर रिजर्व-अबूझमाड़ परिदृश्य तक पहुंचने की बात सामने आई।

यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ एक तेंदुए या एक बाघ के शिकार का नहीं है। सवाल यह है कि क्या मध्य भारत के इस बड़े वन क्षेत्र में वन्यजीवों के शिकार और तस्करी का कोई संगठित नेटवर्क सक्रिय है?

अबूझमाड़—जंगल नहीं, वन्यजीवों का गलियारा
अबूझमाड़ को केवल एक दुर्गम जंगल मानना इसके वास्तविक पर्यावरणीय महत्व को छोटा कर देना होगा। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली क्षेत्र से इंद्रावती के जंगलों, अबूझमाड़ और आगे उदंती-सीतानदी तथा ओडिशा के वन क्षेत्रों तक फैला परिदृश्य वन्यजीवों की आवाजाही के लिए महत्वपूर्ण है।

इस वन क्षेत्र में बाघ, तेंदुआ, गौर, भालू, हिरण सहित अनेक प्रजातियों की मौजूदगी बताई जाती है। वन्यजीवों के लिए जंगलों की निरंतरता जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी है उनके आवागमन वाले मार्गों की सुरक्षा।

वन्यजीव गलियारा सुरक्षित नहीं रहा तो संरक्षित क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं रह पाएंगे।
3 हजार 900 वर्ग किमी का सवाल—कितनी निगरानी?
अबूझमाड़ का लगभग 3 हजार 900 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र दशकों तक प्रशासनिक पहुंच और सर्वेक्षण की चुनौती से जूझता रहा। नक्सल गतिविधियों और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इस विशाल क्षेत्र में नियमित सरकारी निगरानी आसान नहीं रही।
अब परिस्थितियां बदल रही हैं। सुरक्षा बलों के नए शिविर स्थापित हो रहे हैं, सड़कें पहुंच रही हैं और प्रशासनिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। ऐसे में वन विभाग के सामने भी एक बड़ा अवसर है।
अब केवल जमीन और गांवों का सर्वे पर्याप्त नहीं होगा। वन्यजीव आवास, जलस्रोत, जंगल के भीतर आने-जाने वाले रास्ते, वन्यजीवों के गलियारे और शिकारियों के संभावित मार्गों का वैज्ञानिक मानचित्र तैयार करना भी जरूरी है।
जहां निगरानी कमजोर, वहां शिकारी मजबूत
अबूझमाड़ की भौगोलिक जटिलता वन्यजीव तस्करों के लिए भी अवसर बन सकती है। घना जंगल, लंबी दूरी तक बसा हुआ निर्जन क्षेत्र और सीमित मानव आवाजाही वाले रास्ते शिकार की घटनाओं को छिपाने में मदद कर सकते हैं।
ऐसे में केवल घटना के बाद कार्रवाई करने के बजाय पहले से निगरानी का जाल मजबूत करना होगा। कैमरा ट्रैप, नियमित पैदल गश्त, वन्यजीवों की गतिविधियों का रिकॉर्ड, जलस्रोतों की निगरानी और स्थानीय सूचना तंत्र को मजबूत करना जरूरी है।
खुर्सेल की जैव विविधता भी चिंता के घेरे में
नारायणपुर की खुर्सेल घाटी और आसपास के जंगल जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यहां चौसिंगा यानी चार सींग वाला हिरण जैसी दुर्लभ प्रजातियों के साथ गौर, भालू और अन्य वन्यजीव पाए जाते हैं।

वन्यजीव संरक्षण का मतलब सिर्फ बाघ और तेंदुए को बचाना नहीं है। जंगल की पूरी खाद्य शृंखला और जैव विविधता को सुरक्षित रखना जरूरी है। एक प्रजाति पर बढ़ता शिकार दूसरी कई प्रजातियों के अस्तित्व को भी प्रभावित कर सकता है।
स्थानीय समाज ही बन सकता है जंगल का सबसे मजबूत प्रहरी
अबूझमाड़ के जंगलों को पीढ़ियों से जानने वाला स्थानीय समाज वन्यजीव संरक्षण की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। अबूझमाड़िया और माड़िया समुदाय को केवल वन संसाधनों के उपयोगकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि वन संरक्षण के साझेदार के रूप में शामिल करने की जरूरत है।
स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण देकर वन्यजीव निगरानी दलों से जोड़ा जा सकता है। संदिग्ध गतिविधियों की सूचना, वनाग्नि रोकथाम, जलस्रोत संरक्षण और कैमरा ट्रैप निगरानी जैसे कामों में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है।
जंगल के भीतर रहने वाला व्यक्ति जिस रास्ते, पहाड़ी और जलस्रोत को पहचानता है, उसे बाहर से आने वाली कोई टीम आसानी से नहीं पहचान सकती।
एक नजर में : घटनाएं जो दे रही हैं चेतावनी
| घटना | स्थान | स्थिति |
|---|---|---|
| मवेशी का शिकार | कांकेर–परलकोट, पीवी-19 | पंजों के निशान मिले, बड़े शिकारी वन्यजीव की आशंका |
| तेंदुए की खाल बरामद | नारायणपुर–धोड़ाई रेंज | खाल बरामद, तीन आरोपी पकड़े गए |
| बाघ की खाल बरामदगी | महाराष्ट्र–छत्तीसगढ़ सीमा | जांच में इंद्रावती-अबूझमाड़ क्षेत्र की कड़ी सामने आने की बात |
| दुर्लभ चौसिंगा | नारायणपुर–खुर्सेल क्षेत्र | जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा |
| बाघ की मौजूदगी | महाराष्ट्र–छत्तीसगढ़ सीमा क्षेत्र | ग्रामीण के बाघ के हमले में मारे जाने की घटना ने भी वन्यजीव निगरानी पर सवाल बढ़ाए |
अब सिर्फ खाल बरामद नहीं, तस्करी का पूरा नेटवर्क पकड़ना होगा
तेंदुए की खाल की बरामदगी के बाद सबसे जरूरी सवाल यही है कि इस शिकार का मास्टरमाइंड कौन है? जंगल में शिकार करने वाला व्यक्ति अक्सर पूरी तस्करी श्रृंखला का अंतिम व्यक्ति होता है। उसके पीछे खरीदार, बिचौलिया और दूसरे राज्यों तक माल पहुंचाने वाला नेटवर्क हो सकता है।
इसलिए जांच को खाल की बरामदगी और आरोपियों की गिरफ्तारी से आगे बढ़ाकर शिकार स्थल से अंतिम खरीदार तक ले जाने की जरूरत है।
यदि अबूझमाड़ से वन्यजीवों की खाल बाहर जा रही है तो यह केवल स्थानीय अपराध नहीं, बल्कि अंतरराज्यीय वन्यजीव अपराध का मामला बन सकता है।
2007 का प्रस्ताव, अब फिर उम्मीद
अबूझमाड़ को जैव विविधता संरक्षण के व्यापक ढांचे में लाने की चर्चा वर्षों पुरानी है। वर्ष 2007 के आसपास बायोस्फीयर रिजर्व की दिशा में प्रस्ताव की बात सामने आई थी, लेकिन नक्सल प्रभावित परिस्थितियों और प्रशासनिक चुनौतियों के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

आज स्थिति पहले जैसी नहीं है। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई है और प्रशासनिक पहुंच बढ़ रही है। ऐसे में पुराने प्रस्ताव को वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप वैज्ञानिक अध्ययन और स्थानीय समुदाय की भागीदारी के साथ फिर से जांचने का समय आ गया है।
सरकार के सामने चार बड़ी मांगें
1. तत्काल संयुक्त सर्वे
राजस्व और वन विभाग मिलकर अबूझमाड़ के शेष असर्वेक्षित क्षेत्रों का विस्तृत सर्वे करें।
2. संरक्षण का वैज्ञानिक ढांचा
बायोस्फीयर रिजर्व संबंधी पुराने प्रस्ताव की वर्तमान परिस्थितियों में समीक्षा कर आगे की कार्ययोजना बनाई जाए।
3. स्थायी एंटी-पोचिंग व्यवस्था
परलकोट, धोड़ाई, पश्चिम सोनपुर सहित प्रमुख वन्यजीव मार्गों पर स्थायी वन सुरक्षा एवं एंटी-पोचिंग दल तैनात किए जाएं।
4. स्थानीय समाज की भागीदारी
अबूझमाड़िया-माड़िया समाज को वन्यजीव संरक्षण, निगरानी और सूचना तंत्र में औपचारिक भागीदारी दी जाए।
बड़ा सवाल : सुरक्षा के बाद अब जंगल की बारी
अबूझमाड़ में दशकों तक नक्सलवाद ने प्रशासन और आम लोगों की पहुंच को सीमित रखा। अब सुरक्षा का दायरा बढ़ रहा है। सड़कें पहुंच रही हैं। नए सुरक्षा कैंप बन रहे हैं। प्रशासनिक गतिविधियां बढ़ रही हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या बदलते अबूझमाड़ में जंगल की सुरक्षा भी उतनी ही तेजी से बदलेगी?
धोड़ाई में तेंदुए की खाल बरामदगी, परलकोट में शिकारी वन्यजीव के पंजों के निशान, बाघ की खाल बरामदगी और सीमावर्ती इलाकों में बाघ की मौजूदगी से जुड़ी घटनाएं अलग-अलग दिखाई दे सकती हैं, लेकिन इन सबको एक साथ देखने पर एक बड़ा सवाल सामने आता है—
अबूझमाड़ के जंगल में वन्यजीव सुरक्षित हैं या तस्करों की नजर में?
अब जरूरत सिर्फ कार्रवाई की नहीं, बल्कि अबूझमाड़ के जंगल का वैज्ञानिक सर्वे, वन्यजीव गलियारों की पहचान, स्थायी निगरानी और स्थानीय समाज की भागीदारी के साथ एक समग्र संरक्षण अभियान शुरू करने की है।
क्योंकि अबूझमाड़ को केवल सुरक्षा के नक्शे पर नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण के मानचित्र पर भी उतनी ही मजबूती से दर्ज करना होगा।




