अबूझमाड़ के जंगलों से थाली तक पहुंची मानसून की पहली सौगात, बाजारों में सजी ‘खेक्सी’
सिर्फ बारिश के मौसम में प्राकृतिक रूप से उगती है जंगली खेक्सी • ग्रामीण जंगलों से संग्रह कर पहुंचा रहे बाजार • स्वाद, पौष्टिकता और औषधीय गुणों के कारण बढ़ी मांग

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। अबूझमाड़ के घने जंगलों में मानसून की दस्तक के साथ प्रकृति की अनमोल सौगात मानी जाने वाली खेक्सी (ककोड़) स्थानीय बाजारों में पहुंचने लगी है। बारिश शुरू होते ही जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाली इस मौसमी जंगली सब्जी का ग्रामीण संग्रह कर बाजारों तक पहुंचा रहे हैं। बाजार में पहली खेप पहुंचते ही खेक्सी खरीदने वालों की भीड़ उमड़ने लगी है और इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

अबूझमाड़ की पहचान बन चुकी खेक्सी की खासियत यह है कि इसकी खेती नहीं की जाती। यह केवल मानसून के मौसम में जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगती है। ग्रामीण इसे जंगलों से एकत्र कर स्थानीय हाट-बाजारों में बेचते हैं। हालांकि प्रदेश और देश के कुछ हिस्सों में इसकी खेती भी की जाती है, लेकिन अबूझमाड़ में मिलने वाली खेक्सी पूरी तरह जंगली और प्राकृतिक होती है, जिससे इसका स्वाद और गुणवत्ता अलग मानी जाती है।
सावन के साथ बढ़ जाती है मांग
स्थानीय लोगों का कहना है कि पहली अच्छी बारिश के बाद ही जंगलों में खेक्सी दिखाई देने लगती है। सावन के मौसम में यह सब्जी पारंपरिक भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है। इसकी पहली आवक का लोग पूरे वर्ष इंतजार करते हैं। बाजार में पहुंचते ही यह हाथों-हाथ बिक रही है।
स्वाद के साथ सेहत का भी खजाना
विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों के अनुसार खेक्सी में कई औषधीय और पौष्टिक गुण पाए जाते हैं। यह विटामिन, खनिज और रेशेदार तत्वों से भरपूर होती है। ऋतु परिवर्तन के दौरान मौसमी और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है, इसलिए इसकी मांग हर वर्ष बढ़ जाती है।
ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त आय का जरिया
खेक्सी का मौसम अबूझमाड़ के ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त आमदनी का भी अवसर लेकर आता है। जंगलों से संग्रह कर ग्रामीण इसे स्थानीय बाजारों में बेचते हैं, जिससे उन्हें शुरुआती दिनों में अच्छा दाम मिल जाता है। इससे उनकी आय में भी वृद्धि होती है।
अबूझमाड़ की प्राकृतिक पहचान
प्राकृतिक रूप से उगने वाली खेक्सी केवल एक मौसमी सब्जी नहीं, बल्कि अबूझमाड़ की जैव विविधता, पारंपरिक जीवनशैली और जंगल आधारित आजीविका की भी पहचान है। हर वर्ष मानसून के साथ बाजारों में इसकी दस्तक यह संदेश देती है कि प्रकृति आज भी इस वनांचल को अपनी अनमोल सौगातों से समृद्ध कर रही है।




