घने जंगल से मंदिर पहुंचा दुर्लभ पैंगोलिन, सुरक्षित रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ा
कोटगुड़िन मंदिर परिसर में दिखा विलुप्ति की कगार पर पहुंचा शल्कधारी वन्यजीव; वन विभाग की तत्परता से बची अनमोल जैव धरोहर, लोगों से वन्यजीवों को नुकसान नहीं पहुंचाने की अपील

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। जिले के घने जंगलों से भटककर एक दुर्लभ पैंगोलिन सोमवार को बखरूपारा स्थित कोटगुड़िन मंदिर परिसर पहुंच गया। मंदिर परिसर में इस अनजान और शल्कधारी जीव को देखकर पहले लोग घबरा गए, लेकिन बाद में जानकारी मिलने पर पता चला कि यह अत्यंत शर्मीला और इंसानों को नुकसान नहीं पहुंचाने वाला दुर्लभ वन्यजीव है। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और रेस्क्यू अभियान चलाकर पैंगोलिन को सुरक्षित कब्जे में लेकर आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के बाद वापस जंगल में छोड़ दिया।

वन विभाग ने लोगों से अपील की है कि यदि कोई जंगली जीव रिहायशी क्षेत्र में दिखाई दे तो उसे नुकसान पहुंचाने के बजाय तत्काल विभाग को सूचना दें।
समय रहते हुई कार्रवाई, सुरक्षित लौटाया प्राकृतिक आवास
वन विभाग की टीम ने सूचना मिलते ही तत्काल मौके पर पहुंचकर पैंगोलिन का सुरक्षित रेस्क्यू किया। विभागीय अधिकारियों ने बताया कि सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उसे उसके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित छोड़ दिया गया। विभाग के अनुसार यह प्रजाति सामान्यतः घने जंगलों में रहती है, लेकिन कई बार भोजन या रास्ता भटकने के कारण आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंच जाती है।
रेस्क्यू अभियान के बाद वन विभाग ने स्थानीय लोगों को वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूक करते हुए कहा कि किसी भी वन्यजीव को नुकसान न पहुंचाएं और तत्काल विभाग को सूचना दें।
अत्यंत शर्मीला, लेकिन जंगल का महत्वपूर्ण प्रहरी
वन विभाग के अनुसार पैंगोलिन एक अत्यंत शर्मीला, निशाचर और स्तनधारी वन्यजीव है। इसके पूरे शरीर पर कठोर केराटिन के शल्क होते हैं। खतरा महसूस होने पर यह अपने शरीर को गेंद की तरह गोल कर लेता है, जिससे शिकारी भी इसे आसानी से नुकसान नहीं पहुंचा पाते।
यह मुख्य रूप से दीमक और चींटियां खाता है। एक वयस्क पैंगोलिन वर्षभर में लाखों कीटों को खाकर जंगल के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी कारण इसे प्रकृति का ‘प्राकृतिक कीट नियंत्रक’ भी कहा जाता है।
तस्करी ने पहुंचाया विलुप्ति के कगार पर
वन विभाग से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार पैंगोलिन दुनिया में सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले स्तनधारी वन्यजीवों में शामिल है। इसके मांस और शरीर पर मौजूद शल्कों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग होने के कारण इसका बड़े पैमाने पर अवैध शिकार किया जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वैज्ञानिक शोधों में इसके शल्कों के औषधीय गुणों का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है, इसके बावजूद अंधविश्वास और अवैध व्यापार के कारण इसकी तस्करी लगातार जारी है। यही वजह है कि इसकी संख्या तेजी से घट रही है।
देश में सर्वोच्च कानूनी संरक्षण
भारत में पैंगोलिन को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 के अंतर्गत सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है। इसके शिकार, व्यापार या तस्करी पर कठोर सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसके व्यापार पर प्रतिबंध लगाया गया है।
नारायणपुर के जंगलों में सीमित रह गई संख्या
वन विभाग के अनुसार नारायणपुर के घने जंगलों में अब पैंगोलिन की संख्या बेहद सीमित रह गई है। ऐसे में इस प्रजाति का संरक्षण स्थानीय जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। विभाग का मानना है कि आम नागरिक और वन विभाग मिलकर संवेदनशीलता के साथ कार्य करें तो विलुप्ति के कगार पर पहुंचे ऐसे दुर्लभ वन्यजीवों को बचाया जा सकता है।
क्या बोले रेंजर
रेंजर इंद्र कुमार यादव ने बताया, “सूचना मिलते ही हमारी टीम मौके पर पहुंची। पैंगोलिन का सुरक्षित रेस्क्यू किया गया है और सभी आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के बाद उसे उसके प्राकृतिक जंगल में सुरक्षित छोड़ दिया जाएगा। यह एक अत्यंत दुर्लभ और संरक्षित वन्यजीव है।”




