अबूझमाड़ में टूटा अंधेरे का साम्राज्य: दशकों बाद पहुंची रोशनी, विकास की नई सुबह
नक्सलवाद के साए से बाहर निकल रहा अबूझमाड़, ईरपानार जैसे दुर्गम गांवों में पहली बार जले बल्ब; सड़क, बिजली, पानी के साथ बदल रही जिंदगी

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़—एक ऐसा नाम, जो लंबे समय तक देश के नक्शे पर केवल एक रहस्यमय और दुर्गम इलाके के रूप में जाना जाता रहा। घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और नक्सलवाद के काले साए में वर्षों तक कैद यह क्षेत्र आज एक ऐतिहासिक परिवर्तन का साक्षी बन रहा है। आजादी के दशकों बाद यहां मूलभूत सुविधाओं की किरणें पहुंच रही हैं और विकास की नई इबारत लिखी जा रही है।

अबूझमाड़, जो कभी शासन-प्रशासन की पहुंच से दूर था, आज धीरे-धीरे मुख्यधारा से जुड़ रहा है। नक्सलवाद के कमजोर पड़ने और समाप्ति की दिशा में बढ़ते कदमों के बाद अब सरकार और जिला प्रशासन इस क्षेत्र तक पहुंच बनाने में सफल हो रहे हैं। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं अब यहां के लोगों के जीवन में बदलाव ला रही हैं।
ईरपानार: जहां पहली बार जली उम्मीद की रोशनी
अबूझमाड़ के सबसे कठिन और दुर्गम इलाकों में गिने जाने वाले ईरपानार गांव की कहानी इस बदलाव की सबसे जीवंत मिसाल बनकर सामने आई है। नारायणपुर जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव वर्षों तक अंधेरे में डूबा रहा। यहां तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है—कच्चे रास्ते, पहाड़ी चढ़ाई, घने जंगल और कई जगहों पर पैदल यात्रा ही एकमात्र विकल्प है।
बरसात के मौसम में यह दूरी और भी कठिन हो जाती है, जब संपर्क लगभग टूट जाता है। ऐसे हालात में इस गांव तक बिजली पहुंचाना किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन अब यह असंभव कार्य संभव हो चुका है।
जब ईरपानार के घरों में पहली बार बल्ब जले, तो यह सिर्फ रोशनी नहीं थी—यह विकास, विश्वास और नई उम्मीदों का उजाला था। वर्षों तक लालटेन और लकड़ी के सहारे जीवन बिताने वाले ग्रामीणों ने पहली बार स्थायी बिजली का अनुभव किया।
घने जंगलों के बीच चला विकास का अभियान
ईरपानार तक बिजली पहुंचाने का कार्य छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड, नारायणपुर संभाग द्वारा मिशन मोड में पूरा किया गया। कलेक्टर नम्रता जैन के नेतृत्व में इस परियोजना को प्राथमिकता दी गई।
अधिकारियों और कर्मचारियों को इस कार्य के दौरान असाधारण चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कई स्थानों पर बिजली के खंभे, तार और अन्य सामग्री पहुंचाने के लिए मशीनों का उपयोग संभव नहीं था। ऐसे में मानव श्रम और स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से सामग्री को जंगलों और पहाड़ों के बीच पहुंचाया गया।
ऊबड़-खाबड़ रास्तों, वन्य क्षेत्र और सीमित संसाधनों के बावजूद टीम ने निर्धारित समय में कार्य पूरा कर एक मिसाल पेश की। यह केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और समर्पण का प्रतीक भी है।
₹56.11 लाख की लागत, लेकिन असर पीढ़ियों तक
ग्राम ईरपानार के विद्युतीकरण पर कुल ₹56.11 लाख की लागत आई। इस परियोजना के तहत गांव के सभी परिवारों को पहली बार विद्युत कनेक्शन उपलब्ध कराया गया।
हालांकि यह राशि एक परियोजना की लागत के रूप में देखी जा सकती है, लेकिन इसका प्रभाव आने वाली कई पीढ़ियों तक महसूस किया जाएगा। यह केवल एक गांव में बिजली पहुंचाने का कार्य नहीं, बल्कि विकास की उस सोच का प्रतीक है जिसमें अंतिम व्यक्ति तक सुविधाएं पहुंचाने का संकल्प शामिल है।
बच्चों के सपनों को मिला उजाला
बिजली आने के साथ ही ईरपानार के बच्चों के जीवन में बड़ा बदलाव आया है। अब वे रात के समय भी पढ़ाई कर सकते हैं। पहले जहां अंधेरा होते ही जीवन ठहर जाता था, वहीं अब रोशनी के साथ संभावनाएं भी बढ़ी हैं।
मोबाइल चार्जिंग जैसी सामान्य सुविधा, जो शहरों में सहज उपलब्ध है, अब यहां भी पहुंच चुकी है। पंखे, बल्ब और छोटे घरेलू उपकरणों के उपयोग से जीवन स्तर में सुधार आने लगा है।
भविष्य में डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन सेवाएं, स्वास्थ्य परामर्श और संचार सुविधाओं के विस्तार की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं। यह बदलाव केवल वर्तमान को नहीं, बल्कि आने वाले कल को भी संवारने वाला है।
ग्रामीणों की आंखों में झलकी खुशी
जब पहली बार गांव में बिजली आई, तो पूरे ईरपानार में उत्सव जैसा माहौल था। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर चेहरे पर खुशी साफ नजर आई।
ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने अपने जीवन में पहली बार अपने घरों में स्थायी रोशनी देखी है। वर्षों तक लालटेन और ढिबरी के सहारे गुजारा करने वाले लोगों के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा था।
ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन और बिजली विभाग के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इसे गांव के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन बताया।
नक्सलवाद के साए से विकास की ओर बढ़ते कदम
अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सलवाद का गढ़ माना जाता रहा है। इस वजह से यहां विकास कार्य ठप पड़े रहे और मूलभूत सुविधाएं लोगों तक नहीं पहुंच पाईं।
लेकिन हाल के वर्षों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने और नक्सल प्रभाव कम होने के बाद अब प्रशासन इस क्षेत्र में सक्रिय रूप से काम कर पा रहा है। इसका परिणाम यह है कि अबूझमाड़ के दूरस्थ गांवों तक भी विकास की किरणें पहुंचने लगी हैं।
सड़क, पानी और स्वास्थ्य सेवाओं की भी बढ़ी पहुंच
बिजली के साथ-साथ अबूझमाड़ में अन्य बुनियादी सुविधाओं पर भी तेजी से काम हो रहा है। सड़क निर्माण के माध्यम से गांवों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे आवागमन आसान हो सके।
पेयजल योजनाओं के जरिए स्वच्छ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है। साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए मोबाइल मेडिकल यूनिट और स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन किया जा रहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी नए स्कूल और आवासीय सुविधाएं विकसित की जा रही हैं, ताकि क्षेत्र के बच्चे बेहतर भविष्य की ओर बढ़ सकें।
अबूझमाड़ में बदलाव की नई शुरुआत
ईरपानार की तरह अबूझमाड़ के अन्य दूरस्थ गांवों को भी प्राथमिकता के आधार पर विकास योजनाओं से जोड़ा जा रहा है। बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा और आजीविका के अवसरों का विस्तार इस क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य को बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
यह बदलाव केवल सुविधाओं का विस्तार नहीं, बल्कि विश्वास की पुनर्स्थापना भी है—एक ऐसा विश्वास कि विकास का अधिकार हर नागरिक को है, चाहे वह कितना ही दूर और दुर्गम क्षेत्र में क्यों न रहता हो।
अंतिम छोर तक पहुंचने का संकल्प
अबूझमाड़ में पहुंचती यह रोशनी उस संकल्प का प्रतीक है, जिसमें शासन-प्रशासन अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक विकास पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है।
ईरपानार में जले ये बल्ब केवल घरों को रोशन नहीं कर रहे, बल्कि एक पूरे क्षेत्र के भविष्य को उजागर कर रहे हैं।
अबूझमाड़, जो कभी अंधेरे और अलगाव का प्रतीक था, आज उम्मीद, विकास और नए भारत की कहानी कह रहा है।




