नारायणपुर

कब मिलेगा नारायणपुर को अपने अधिकार का 31 करोड़?

7 दिन का अल्टीमेटम ठंडा पड़ा, जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल

असंतोष: खनन की धूल नारायणपुर को, मलाई कांकेर को…

डीएमएफ राशि पर सियासत, 2 महीने बाद भी कार्रवाई शून्य…

खनन प्रभावित क्षेत्र को नहीं मिल रहा हक, विकास कार्य अटके…


(कैलाश सोनी) नारायणपुर। खनिज संपदा से समृद्ध लेकिन विकास की दौड़ में पिछड़ता नारायणपुर जिला इन दिनों अपने ही अधिकार की लड़ाई में उलझा हुआ है। जिला खनिज न्यास निधि (DMF) की करीब 31.27 करोड़ रुपए की राशि को लेकर नारायणपुर और कांकेर के बीच खींचतान अब जनभावनाओं का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

19 फरवरी को जनप्रतिनिधियों द्वारा कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में साफ तौर पर चेतावनी दी गई थी कि यदि 7 दिनों के भीतर कार्रवाई नहीं हुई, तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। लेकिन विडंबना यह है कि 2 महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद न तो आंदोलन हुआ और न ही राशि का हस्तांतरण

अब सवाल उठ रहा है—क्या यह सिर्फ खानापूर्ति थी? क्या नारायणपुर के जनप्रतिनिधियों की आवाज दबा दी गई? या फिर सत्ता के समीकरणों ने इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया?


हक की लड़ाई या सिर्फ दिखावा?

ज्ञापन सौंपने के दौरान जनप्रतिनिधियों ने बड़े जोर-शोर से नारायणपुर के अधिकार की बात उठाई थी। मीडिया में बयान आए, आंदोलन की चेतावनी दी गई और जनता को भरोसा दिलाया गया कि जल्द ही न्याय मिलेगा।

लेकिन आज हालात बिल्कुल उलट नजर आ रहे हैं।

  • 7 दिन का अल्टीमेटम अब 60 दिन पार कर चुका है
  • कोई धरना, प्रदर्शन या दबाव नहीं बना
  • प्रशासनिक स्तर पर भी ठोस प्रगति नहीं

इससे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि मामला अब केवल औपचारिकता तक सीमित रह गया है।


क्या है पूरा मामला?

रावघाट परियोजना अंतर्गत अंजरेल माइंस में हो रहे खनन कार्य से भारी मात्रा में राजस्व और DMF फंड उत्पन्न हो रहा है।

तथ्य बताते हैं:

  • कुल खनन क्षेत्र का बड़ा हिस्सा नारायणपुर जिले में आता है
  • लेकिन रॉयल्टी और DMF का बड़ा हिस्सा कांकेर जिले को मिल रहा है
  • अब तक 46.81 करोड़ रुपए का प्रावधान था
  • लेकिन नारायणपुर को केवल 15.54 करोड़ रुपए ही मिले
  • शेष 31.27 करोड़ रुपए अब भी लंबित हैं

यानी खनन की मार झेल रहा नारायणपुर, लेकिन लाभ किसी और को मिल रहा है।


जहां असर, वहीं अधिकार की अनदेखी

खनन से प्रभावित क्षेत्र में धूल, प्रदूषण, सड़क क्षति, स्वास्थ्य समस्याएं और जल संकट जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है:

  • गांवों में मूलभूत सुविधाओं की कमी है
  • स्वास्थ्य और शिक्षा पर असर पड़ रहा है
  • सड़कें जर्जर हो चुकी हैं

ऐसे में DMF राशि का उपयोग इन क्षेत्रों के विकास के लिए होना चाहिए था, लेकिन राशि अटकने से विकास कार्य ठप पड़े हैं


जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर उठते सवाल

सबसे बड़ा सवाल अब जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर खड़ा हो रहा है।

ज्ञापन सौंपने के बाद:

  • न कोई फॉलोअप
  • न कोई दबाव
  • न कोई आंदोलन

क्या यह मान लिया जाए कि जनप्रतिनिधियों ने अपनी जिम्मेदारी निभा दी?

या फिर यह भी संभव है कि सत्तापक्ष से जुड़े होने के कारण वे खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे हैं?


सत्ता समीकरण बना बाधा?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि मामला सत्तापक्ष से जुड़ा होने के कारण जानबूझकर ठंडा किया जा रहा है।

जनप्रतिनिधियों ने शुरुआत में जो आक्रामक रुख अपनाया था, वह अब पूरी तरह गायब है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि:

  • ऊपर से दबाव हो सकता है
  • या फिर राजनीतिक हित प्राथमिकता बन गए हैं

इसका सीधा नुकसान नारायणपुर की जनता को उठाना पड़ रहा है।


कांकेर प्रशासन की चुप्पी भी सवालों में

दूसरी ओर कांकेर जिला प्रशासन भी इस मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखा रहा है।

करीब 31 करोड़ रुपए की राशि जो नारायणपुर को मिलनी चाहिए, उसे हस्तांतरित करने में कोई तत्परता नजर नहीं आ रही।

यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है:

  • क्या प्रशासन जानबूझकर देरी कर रहा है?
  • या फिर कोई तकनीकी अड़चन है?
  • अगर है, तो अब तक समाधान क्यों नहीं निकला?

विकास पर सीधा असर

DMF राशि का उपयोग जिन कार्यों में होना था, वे अब प्रभावित हो रहे हैं:

  • स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
  • स्कूल और शिक्षा सुविधाएं
  • सड़क और बुनियादी ढांचा
  • पेयजल व्यवस्था
  • आदिवासी क्षेत्रों का विकास

इन सभी योजनाओं पर अब ब्रेक लग चुका है।

स्थानीय लोगों का कहना है—
“जब पैसा ही नहीं आएगा, तो विकास कैसे होगा?”


आदिवासी क्षेत्रों के अधिकार का सवाल

यह मुद्दा केवल राशि का नहीं, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों के अधिकार से भी जुड़ा है।

खनन से सबसे अधिक प्रभावित आदिवासी समुदाय ही हैं, लेकिन उन्हें उसका लाभ नहीं मिल पा रहा।

विशेषज्ञ मानते हैं कि:

  • DMF का मूल उद्देश्य ही प्रभावित क्षेत्रों का विकास है
  • लेकिन जब राशि ही नहीं पहुंचेगी, तो उद्देश्य अधूरा रह जाएगा

मीडिया में उठ चुका है मुद्दा

इस पूरे मामले को लेकर पहले भी प्रमुख समाचार पत्रों में खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं।

  • राशि के बंटवारे पर सवाल उठाए
  • प्रशासनिक उदासीनता को उजागर किया
  • जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर चर्चा की

लेकिन इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं दिख रहा।


अब क्या होगा आगे?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब आगे क्या होगा?

संभावनाएं:

  • जनप्रतिनिधि फिर से आंदोलन का रास्ता अपनाएं
  • शासन स्तर पर हस्तक्षेप हो
  • या मामला यूं ही लंबित बना रहे

यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो यह मुद्दा आने वाले समय में बड़ा जन आंदोलन बन सकता है।


जनता का साफ संदेश

नारायणपुर की जनता अब जवाब चाहती है:

  • हमें हमारा हक कब मिलेगा?
  • 31 करोड़ रुपए कब आएंगे?
  • विकास कार्य कब शुरू होंगे?

जनता का गुस्सा धीरे-धीरे बढ़ रहा है, और यदि इसे नजरअंदाज किया गया, तो हालात बिगड़ सकते हैं।

नारायणपुर की कहानी आज एक ऐसे जिले की कहानी बन गई है, जहां संसाधन तो हैं, लेकिन अधिकार नहीं।

खनन की धूल यहां के लोगों को मिल रही है, जबकि उसका लाभ कहीं और जा रहा है।

जनप्रतिनिधियों की चुप्पी, प्रशासन की उदासीनता और राजनीतिक समीकरण—इन सबके बीच सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता का हो रहा है।

अब देखना यह है कि
क्या नारायणपुर को उसका हक मिलेगा,
या यह 31 करोड़ रुपए भी फाइलों में ही दबकर रह जाएंगे?

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