नारायणपुर

अबूझमाड़ में बदली तस्वीर: कभी खौफ के साये में जीते थे ग्रामीण, अब विकास की राह पर प्रशासन के साथ कदमताल

‘सुशासन आपके द्वार’ अभियान से दुर्गम आलबेड़ा में पहुंचा प्रशासन, मांदरी की थाप पर हुआ स्वागत, कलेक्टर ने ग्रामीणों संग बैठकर किया पेज-भात भोजन — बच्चों के सपनों में अब कलेक्टर बनने की चमक

(कैलाश सोनी) नारायणपुर, 14 अप्रैल 2026।

अबूझमाड़… एक समय ऐसा नाम, जो वर्षों तक नक्सली प्रभाव, भय और अनिश्चितता का प्रतीक बना रहा। जहां सरकारी योजनाओं की पहुंच एक सपना थी और प्रशासनिक उपस्थिति दुर्लभ। लेकिन आज वही अबूझमाड़ बदलती तस्वीर की मिसाल बन रहा है। ‘सुशासन आपके द्वार’ अभियान के तहत जिला प्रशासन जब दुर्गम पहाड़ियों, घने जंगलों और उफनते नालों को पार कर ग्राम आलबेड़ा पहुंचा, तो वहां सिर्फ एक प्रशासनिक दौरा नहीं, बल्कि भरोसे और विकास की नई कहानी लिखी गई।

25-30 किलोमीटर का संघर्ष: बाइक और पैदल तय किया सफर

कस्तूरमेटा से आलबेड़ा तक की दूरी भले ही कागजों में 25-30 किलोमीटर हो, लेकिन वास्तविकता में यह सफर किसी चुनौती से कम नहीं। कच्चे रास्ते, घने जंगल, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ और बीच-बीच में बहते नदी-नाले… इन सबके बीच प्रशासनिक अमले ने पहले मोटरसाइकिल से और फिर कई किलोमीटर पैदल चलकर गांव तक पहुंच बनाई।

यह यात्रा सिर्फ भौगोलिक दूरी तय करने की नहीं थी, बल्कि वर्षों से बने अविश्वास और दूरी को पाटने का प्रयास भी थी।


मांदरी की थाप और परंपरागत स्वागत से गूंज उठा आलबेड़ा

जैसे ही प्रशासनिक टीम गांव पहुंची, माहौल उत्सव में बदल गया। ग्रामीणों ने पारंपरिक वेशभूषा में मांदरी की थाप पर नृत्य करते हुए कलेक्टर नम्रता जैन और अधिकारियों का स्वागत किया।

महुआ के फूलों एवं सिहाड़ी के बीजों से बनी मालाएं, जंगल के फूल-पत्तों से तैयार गुलदस्ते—यह स्वागत सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि दिल से निकली आत्मीयता का प्रतीक था।

कभी प्रशासन से दूरी बनाकर रखने वाले यही ग्रामीण आज खुले दिल से स्वागत कर रहे थे। यह दृश्य अपने आप में बदलते अबूझमाड़ की कहानी कह रहा था।


पेड़ के नीचे चौपाल, सीधे संवाद से टूटी दूरी

गांव में किसी आलीशान मंच या सभागार की जगह, पेड़ की छांव में चौपाल सजी। यहां कलेक्टर ने ग्रामीणों से सीधा संवाद किया।

ग्रामीणों ने खुलकर अपनी समस्याएं रखीं—

  • सड़क और परिवहन की कमी
  • पेयजल की समस्या
  • बिजली और मोबाइल नेटवर्क का अभाव
  • शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत

कलेक्टर ने मौके पर ही संबंधित विभागों के अधिकारियों को निर्देश दिए और समस्याओं के त्वरित समाधान का भरोसा दिलाया।

यह संवाद सिर्फ शिकायतें सुनने का नहीं, बल्कि विश्वास बनाने का माध्यम बना।


जब कलेक्टर ने ग्रामीणों संग किया ‘पेज-भात’ का भोजन

दौरे का सबसे भावुक और यादगार पल वह रहा, जब कलेक्टर नम्रता जैन ने ग्रामीणों के साथ जमीन पर बैठकर पारंपरिक ‘पेज-भात’ का भोजन किया।

यह दृश्य प्रशासन और ग्रामीणों के बीच की दूरी को खत्म करता नजर आया।
ग्राम पंचायत कुतूल के सरपंच रामजी वरदा ने बताया कि इससे गांव में अपनापन बढ़ा और लोगों का प्रशासन पर विश्वास मजबूत हुआ।

एक समय जहां सरकारी अधिकारी गांव तक आने से कतराते थे, वहीं आज उनके साथ बैठकर भोजन करना एक नई शुरुआत का संकेत है।


बच्ची का सपना: “मैं भी कलेक्टर बनूंगी”

इस दौरान एक भावुक और प्रेरणादायक क्षण सामने आया।
गांव की कक्षा तीसरी की छात्रा सुखमती ने कलेक्टर से बातचीत करते हुए कहा—
“मैं भी बड़ी होकर कलेक्टर बनना चाहती हूं।”

उसकी यह मासूम लेकिन दृढ़ इच्छा सुनकर वहां मौजूद सभी लोग भावुक हो गए।

यह सिर्फ एक बच्ची का सपना नहीं, बल्कि बदलते अबूझमाड़ की नई सोच का प्रतीक है—जहां अब बच्चे डर नहीं, बल्कि बड़े सपने देख रहे हैं।


सरकारी योजनाओं की पहुंच: स्टॉल और स्वास्थ्य शिविर

शिविर के दौरान विभिन्न विभागों ने अपने-अपने स्टॉल लगाए—

  • स्वास्थ्य विभाग ने ग्रामीणों का परीक्षण कर दवाइयां वितरित कीं
  • महिला एवं बाल विकास विभाग ने पोषण योजनाओं की जानकारी दी
  • खाद्य और राजस्व विभाग ने योजनाओं का लाभ समझाया

ग्रामीणों को पहली बार इतने व्यवस्थित तरीके से योजनाओं की जानकारी मिली।

विशेष रूप से बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य एवं पोषण पर जोर दिया गया, जिससे भविष्य की पीढ़ी मजबूत बन सके।


नक्सल प्रभाव से विकास की ओर: बदल रहा अबूझमाड़

अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सल प्रभाव के कारण मुख्यधारा से कटा रहा।
ग्रामीण भय के कारण शहरों की ओर पलायन करते थे और सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच लगभग शून्य थी।

लेकिन अब हालात बदल रहे हैं—

  • प्रशासन खुद गांव तक पहुंच रहा है
  • ग्रामीणों में विश्वास बढ़ रहा है
  • योजनाओं का लाभ जमीन तक पहुंच रहा है

आज वही ग्रामीण, जो कभी डर के साये में जीते थे, अब प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विकास की राह पर आगे बढ़ रहे हैं।


संस्कृति और विकास का संगम

आलबेड़ा में जो दृश्य देखने को मिला, वह सिर्फ सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि संस्कृति और विकास का संगम था।

एक ओर पारंपरिक नृत्य, मांदरी की थाप और जंगल से जुड़े जीवन की झलक थी, तो दूसरी ओर आधुनिक विकास की पहल—सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल कनेक्टिविटी की चर्चा।

यह संतुलन ही अबूझमाड़ के समग्र विकास की कुंजी बन सकता है।


‘सुशासन आपके द्वार’: दूरियों को मिटाने का अभियान

जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया कि ‘सुशासन आपके द्वार’ अभियान का उद्देश्य सिर्फ योजनाओं की जानकारी देना नहीं, बल्कि दुर्गम क्षेत्रों तक शासन की पहुंच सुनिश्चित करना है।

भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद प्रशासन का यह प्रयास यह संदेश देता है कि—
“अब कोई भी गांव इतना दूर नहीं, जहां सरकार की पहुंच न हो सके।”


भरोसे की नई नींव

आलबेड़ा का यह दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक रहा।

  • प्रशासन और ग्रामीणों के बीच संवाद बढ़ा
  • विश्वास की नई नींव पड़ी
  • विकास की दिशा स्पष्ट हुई

यह पहल अगर इसी तरह जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब अबूझमाड़ भी विकास के नक्शे पर मजबूती से उभरेगा।


डर से उम्मीद तक का सफर

अबूझमाड़ की यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि बदलाव की मिसाल है।
जहां कभी बंदूक की गूंज थी, वहां अब मांदरी की थाप सुनाई दे रही है।
जहां डर था, वहां अब सपने हैं।

और इन सपनों को साकार करने के लिए प्रशासन और ग्रामीण दोनों साथ-साथ चल रहे हैं—यही है नए अबूझमाड़ की असली पहचान।

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