जिन हाथों में कभी बंदूक थी, उन्हीं हाथों ने बांधी राखी
अबूझमाड़ में हिंसा से रिश्तों तक पहुंची नई कहानी, आत्मसमर्पित महिला माओवादियों ने डीआरजी जवानों, एसपी व पुलिस अधिकारियों की कलाई पर बांधा रक्षा सूत्र

रक्षाबंधन पर डीआरजी परिसर में छलका अपनत्व; कभी जंगल में आमने-सामने रहने वाले जवानों और पूर्व महिला माओवादियों के बीच दिखा विश्वास और भाईचारे का भाव
(कैलाश सोनी) नारायणपुर। अबूझमाड़ के घने जंगलों में कभी बंदूक और बारूद की आवाज के बीच जिंदगी गुजारने वाली आत्मसमर्पित महिला माओवादियों के लिए इस बार रक्षाबंधन का पर्व एक नई शुरुआत का प्रतीक बन गया। जिन हाथों में कभी हथियार हुआ करते थे, उन्हीं हाथों ने रक्षाबंधन पर डीआरजी जवानों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। कभी जिनसे जंगल में आमना-सामना होता था, आज उन्हीं जवानों को बहन का दर्जा देते हुए राखी बांधने का यह दृश्य भावुक कर देने वाला रहा।
नारायणपुर पुलिस के डीआरजी परिसर में आयोजित रक्षाबंधन कार्यक्रम में आत्मसमर्पित महिला माओवादियों ने पुलिस अधीक्षक समेत पुलिस अधिकारियों और जवानों की कलाई पर राखी बांधी। इस दौरान परिसर में अपनत्व, विश्वास और भाई-बहन के रिश्ते की भावनाएं नजर आईं। आत्मसमर्पण के बाद पहली बार रक्षाबंधन के अवसर पर आयोजित इस पहल को हिंसा से शांति और भय से विश्वास की ओर बढ़ते कदम के रूप में देखा गया।

कभी जंगल में आमना-सामना, अब कलाई पर रक्षा सूत्र
अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सल हिंसा से प्रभावित रहा है। जंगलों में सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच मुठभेड़ों के दौरान एक-दूसरे के आमने-सामने रहने वाली आत्मसमर्पित महिला माओवादियों ने अब हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया है। रक्षाबंधन पर उन्होंने डीआरजी जवानों की कलाई पर राखी बांधकर अपने नए जीवन और पुलिस परिवार के साथ विश्वास के रिश्ते का संदेश दिया।
राखी बांधते समय महिलाओं के चेहरों पर खुशी और संतोष नजर आया। वहीं, जवान भी इस अप्रत्याशित और भावनात्मक पल से अभिभूत दिखाई दिए।
एसपी समेत पुलिस अधिकारियों को भी बांधी राखी
कार्यक्रम में आत्मसमर्पित महिला माओवादियों ने पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार पटेल, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अक्षय साबद्रा, अजय कुमार एवं ऐश्वर्य चंद्राकर, उप पुलिस अधीक्षक अजय सिंह, अविनाश कंवर, मनोज मंडावी एवं आशीष नेताम, रक्षित निरीक्षक मोहसिन खान तथा थाना प्रभारी नारायणपुर विनीत दुबे सहित पुलिस अधिकारियों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा।
इस दौरान पुलिस अधिकारियों और जवानों ने भी बहनों को रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दीं और उनके सुरक्षित, सम्मानजनक एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
‘कभी सोचा नहीं था कि एक दिन इन्हीं हाथों से राखी बंधेगी’
कार्यक्रम के दौरान एक डीआरजी जवान ने भावुक होते हुए कहा कि जिन लोगों के साथ वर्षों तक जंगलों में मुठभेड़ की स्थिति रही, उन्हीं आत्मसमर्पित महिला माओवादियों से आज राखी बंधवाना बेहद भावुक क्षण है। उन्होंने कहा कि कभी कल्पना नहीं की थी कि एक दिन हथियार छोड़कर यही महिलाएं भाई-बहन के रिश्ते की डोर से जुड़ेंगी।
राखी ने बदली रिश्तों की तस्वीर
रक्षाबंधन का यह आयोजन महज राखी बांधने तक सीमित नहीं रहा। यह उस बदलाव की तस्वीर बन गया, जिसमें बंदूक की जगह रक्षा सूत्र, हिंसा की जगह विश्वास और डर की जगह अपनत्व दिखाई दिया।
अबूझमाड़ के जिन जंगलों में कभी गोलियों की आवाज गूंजती थी, वहीं से निकलकर मुख्यधारा में आई इन महिलाओं ने रक्षाबंधन के अवसर पर पुलिस जवानों के साथ भाई-बहन के रिश्ते की शुरुआत की। इस पहल ने यह संदेश दिया कि विश्वास और संवाद के जरिए हिंसा से दूर होकर सामाजिक जीवन में वापसी का रास्ता तैयार किया जा सकता है।
‘रक्षाबंधन विश्वास और सुरक्षा के संकल्प का पर्व’
पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार पटेल ने कहा कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान और सुरक्षा के संकल्प का भी प्रतीक है। समाज की मुख्यधारा में लौटे लोगों को सम्मान और अपनत्व देना तथा उनके जीवन में नई उम्मीद जगाना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। नारायणपुर पुलिस सुरक्षा के साथ-साथ समाज में विश्वास और भाईचारे का वातावरण मजबूत करने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है।
उन्होंने कहा कि आत्मसमर्पित लोगों को समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने और उनके सुरक्षित एवं बेहतर भविष्य की दिशा में सकारात्मक वातावरण तैयार करना आवश्यक है।
बदलते बस्तर की तस्वीर बनी यह राखी
डीआरजी परिसर में मनाया गया यह रक्षाबंधन बदलते बस्तर की एक अलग तस्वीर सामने लेकर आया। कभी हिंसा और भय से पहचाने जाने वाले रास्तों पर अब शांति, विश्वास और विकास की उम्मीद दिखाई दे रही है। आत्मसमर्पित महिला माओवादियों द्वारा पुलिस अधिकारियों और जवानों को राखी बांधना इसी बदलाव की भावनात्मक तस्वीर बना।
कार्यक्रम के अंत में सभी ने एक-दूसरे को रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दीं और क्षेत्र में शांति, सुरक्षा, भाईचारे और उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
खास बात:
बंदूक से रक्षा सूत्र तक का सफर—अबूझमाड़ की इस तस्वीर में केवल राखी नहीं, बल्कि हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने और विश्वास के रिश्ते को मजबूत करने की कहानी नजर आई।




