अबूझमाड़ में सुशासन के पहिए दौड़े, ट्रैक्टर से दुर्गम गांवों तक पहुंचा सरकारी राशन
40–50 किमी पैदल चलने की मजबूरी हुई खत्म, कलेक्टर नम्रता जैन की पहल से ट्रैक्टर आधारित पीडीएस मॉडल बना ग्रामीणों के लिए राहत का सहारा

नारायणपुर। कभी सरकारी राशन लेने के लिए 40 से 50 किलोमीटर तक पैदल चलना, पहाड़ों और उफनते नदी-नालों को पार करना तथा दो से तीन दिन का कठिन सफर तय करना अबूझमाड़ के ग्रामीणों की मजबूरी थी। बरसात आते ही कई गांवों का संपर्क टूट जाता था और महीनों तक राशन पहुंचाना प्रशासन के लिए चुनौती बन जाता था। लेकिन अब यह तस्वीर बदल चुकी है। नारायणपुर जिला प्रशासन ने ट्रैक्टर आधारित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) लागू कर अबूझमाड़ के दुर्गम गांवों तक नियमित रूप से सरकारी राशन पहुंचाने की नई मिसाल कायम की है।
कलेक्टर नम्रता जैन के नेतृत्व में शुरू की गई इस अभिनव पहल ने न केवल खाद्यान्न वितरण व्यवस्था को मजबूत किया है, बल्कि दुर्गम वनांचल में रहने वाले हजारों ग्रामीणों के जीवन को भी आसान बनाया है। यह मॉडल आज संवेदनशील प्रशासन और सुशासन का प्रभावी उदाहरण बनकर सामने आया है।
बरसात में महीनों बंद हो जाती थी राशन व्यवस्था
ओरछा क्षेत्र के थुलथुली, गोमागाल, मुरूमवाड़ा, आदेर, जाटलूर, जटवर, बालेबेड़ा, हांदावाड़ा, पीडियाकोट सहित अनेक गांव वर्षों तक सड़क और परिवहन सुविधाओं से वंचित रहे। ग्रामीणों को 35 किलोग्राम चावल और अन्य आवश्यक खाद्यान्न प्राप्त करने के लिए लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती थी। बारिश के मौसम में नदी-नाले उफान पर होने से राशन वितरण कई बार महीनों तक प्रभावित रहता था।
इस कठिन व्यवस्था के कारण ग्रामीणों का समय, श्रम और आर्थिक संसाधन भी प्रभावित होते थे। कई परिवारों को केवल राशन लेने के लिए दो से तीन दिन तक घर से बाहर रहना पड़ता था।
ट्रैक्टर बना सुशासन का नया पहिया
इन समस्याओं को देखते हुए जिला प्रशासन ने पारंपरिक परिवहन व्यवस्था में बदलाव करते हुए ट्रैक्टर आधारित विकेंद्रीकृत पीडीएस मॉडल लागू किया। मुख्य गोदामों से ट्रैक्टरों के माध्यम से सीधे गांवों तक खाद्यान्न पहुंचाने की व्यवस्था की गई।
इसके साथ ही ग्राम पंचायत स्तर पर नए पीडीएस भवनों की स्वीकृति, प्रत्येक गांव के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्ति तथा मानसून से पहले तीन से चार माह का अग्रिम राशन भंडारण सुनिश्चित किया गया, ताकि बारिश के दौरान भी किसी ग्रामीण को खाद्यान्न के लिए परेशान न होना पड़े।
ग्रामीणों को मिली बड़ी राहत
नई व्यवस्था लागू होने के बाद जिन गांवों तक कभी सरकारी राशन पहुंचाना कठिन माना जाता था, वहां अब नियमित रूप से समय पर खाद्यान्न उपलब्ध हो रहा है। ग्रामीणों को लंबी पैदल यात्रा से राहत मिली है, समय और श्रम की बचत हो रही है तथा बरसात के दिनों में भी राशन की उपलब्धता बनी हुई है।
ग्रामीण बताते हैं कि जब पहली बार सरकारी राशन से लदा ट्रैक्टर गांव पहुंचा तो वह केवल अनाज नहीं, बल्कि प्रशासन पर भरोसा और विकास की नई उम्मीद भी लेकर आया। अब राशन कार्ड केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि समय पर मिलने वाले अधिकार की गारंटी बन गया है।
अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने की पहल
जिला प्रशासन का मानना है कि यह पहल केवल खाद्यान्न वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन की योजनाओं को अंतिम छोर तक पहुंचाने की प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद नवाचार, प्रभावी योजना और मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति के बल पर यह संभव हुआ है।
सुशासन का बना नया मॉडल
ट्रैक्टर आधारित राशन वितरण व्यवस्था ने यह साबित कर दिया है कि यदि प्रशासन संवेदनशीलता और नवाचार के साथ कार्य करे तो दुर्गम से दुर्गम क्षेत्रों तक भी सरकारी योजनाओं का लाभ प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सकता है। आज अबूझमाड़ में ट्रैक्टर से पहुंचता सरकारी राशन केवल खाद्यान्न नहीं, बल्कि सुशासन, विश्वास और विकास का प्रतीक बन चुका है।
मुख्य बिंदु
- 40–50 किमी पैदल चलने की मजबूरी समाप्त।
- ट्रैक्टर आधारित पीडीएस मॉडल से गांव-गांव पहुंच रहा राशन।
- मानसून से पहले 3–4 माह का अग्रिम खाद्यान्न भंडारण।
- ग्राम पंचायत स्तर पर नए पीडीएस भवन और नोडल अधिकारियों की व्यवस्था।
- दूरस्थ अबूझमाड़ में समय पर खाद्यान्न उपलब्ध होने से ग्रामीणों का बढ़ा प्रशासन पर विश्वास।




