अबूझमाड़ की हरित क्रांति को राष्ट्रीय सलाम, ‘पर्यावरण चैंपियन पुरस्कार–2026’ से चमका नारायणपुर
लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय के जनभागीदारी मॉडल को देशभर में मिली पहचान, 36,421 पौधे, 48 हजार सीड बॉल और प्राकृतिक खेती ने बदली अबूझमाड़ की तस्वीर

नारायणपुर। कभी दुर्गम, नक्सल प्रभावित और विकास की मुख्यधारा से दूर माना जाने वाला अबूझमाड़ आज पर्यावरण संरक्षण और जनभागीदारी के क्षेत्र में पूरे देश के लिए मिसाल बनकर उभरा है। लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, नारायणपुर को जल शक्ति मंत्रालय के ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के तहत प्रतिष्ठित ‘पर्यावरण चैंपियन पुरस्कार–2026’ से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान केवल एक संस्थान की उपलब्धि नहीं, बल्कि नारायणपुर और अबूझमाड़ के किसानों, महिलाओं, विद्यार्थियों, एनएसएस स्वयंसेवकों और ग्रामीण समुदाय के सामूहिक प्रयासों की राष्ट्रीय पहचान है।
कभी जल संकट, भूमि क्षरण, अनियमित वर्षा और सीमित संसाधनों से जूझ रहे इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ते हुए ऐसा मॉडल विकसित किया गया, जिसने हरियाली के साथ सामाजिक और आर्थिक बदलाव की नई इबारत लिख दी।
हरियाली की नई पहचान बना अबूझमाड़
महाविद्यालय ने पर्यावरण संरक्षण को केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जल संरक्षण, प्राकृतिक खेती, जैव विविधता संरक्षण, पोषण वाटिका, वर्मी कम्पोस्ट, महिला सशक्तिकरण और युवा नेतृत्व को एक साथ जोड़कर सतत विकास का व्यापक मॉडल तैयार किया। यही समग्र दृष्टिकोण राष्ट्रीय सम्मान का आधार बना।
अभियान के तहत 36,421 पौधों का रोपण किया गया, जबकि दुर्गम वन क्षेत्रों में 48 हजार से अधिक सीड बॉल्स का प्रसारण कर प्राकृतिक पुनर्जीवन की अभिनव पहल की गई। पौधों की सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी स्वयं ग्रामीणों, विद्यार्थियों, एनएसएस स्वयंसेवकों और महिला समूहों ने संभाली, जिससे हजारों पौधे आज विकसित वृक्ष बन चुके हैं।
राष्ट्रीय सम्मान के बाद जनआंदोलन बना अभियान
‘पर्यावरण चैंपियन पुरस्कार–2026’ मिलने के बाद अभियान को नई गति मिली। ग्रामीण स्वयं महाविद्यालय पहुंचकर पौधे लेने लगे और गांव, खेत, विद्यालय, देवस्थलों तथा सार्वजनिक स्थलों पर स्वप्रेरणा से वृक्षारोपण शुरू कर दिया। कई परिवारों ने बच्चों के जन्म, विवाह और स्मृति दिवस पर पौधे लगाने की परंपरा भी शुरू की।
ग्राम पंचायतों ने पर्यावरण संरक्षण को ग्राम विकास की प्राथमिकताओं में शामिल किया। ग्राम सभाओं में जल संरक्षण, जैव विविधता, प्राकृतिक खेती और स्वच्छता जैसे विषय नियमित चर्चा का हिस्सा बनने लगे।
प्राकृतिक खेती से बदली किसानों की सोच
महाविद्यालय ने एक हजार से अधिक किसानों को प्राकृतिक एवं जैविक खेती अपनाने के लिए प्रशिक्षित किया, जबकि तीन हजार से अधिक किसानों को विभिन्न शासकीय योजनाओं से जोड़ा। जीवामृत, वर्मी कम्पोस्ट, जैविक कीट प्रबंधन और फसल विविधीकरण जैसी तकनीकों से खेती की लागत घटी और मिट्टी की उर्वरता बढ़ी।
ग्रामीण क्षेत्रों में 60 सौर पंपों की स्थापना से सिंचाई सुविधा मजबूत हुई तथा स्वच्छ ऊर्जा आधारित कृषि को बढ़ावा मिला।
महिला शक्ति और युवाओं ने संभाली हरित अभियान की कमान
महिला स्व-सहायता समूहों ने वर्मी कम्पोस्ट, पोषण वाटिका और जैविक खाद निर्माण को आजीविका से जोड़ते हुए पर्यावरण संरक्षण को आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम बनाया। दूसरी ओर राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के स्वयंसेवकों और विद्यार्थियों ने वृक्षारोपण, सीड बॉल अभियान, स्वच्छता, प्लास्टिक मुक्त परिसर और जनजागरूकता कार्यक्रमों के जरिए अभियान को गांव-गांव तक पहुंचाया।
देशभर के लिए बना प्रेरणादायी मॉडल
राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए देशभर से 100 से अधिक नामांकन प्राप्त हुए थे, जिनमें कठोर मूल्यांकन के बाद केवल नौ संस्थानों का चयन किया गया। इनमें लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, नारायणपुर का चयन छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय बना।
यह मॉडल साबित करता है कि शिक्षा, विज्ञान, स्थानीय ज्ञान और जनभागीदारी के समन्वय से सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र भी पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की राष्ट्रीय मिसाल बन सकते हैं।
मुख्य उपलब्धियां
- ‘पर्यावरण चैंपियन पुरस्कार–2026’ से राष्ट्रीय सम्मान।
- 36,421 पौधों का रोपण और संरक्षण।
- 48,000 से अधिक सीड बॉल्स का वन क्षेत्रों में प्रसारण।
- 60 सौर पंपों के माध्यम से जल संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा।
- 1,000 से अधिक किसानों ने प्राकृतिक खेती अपनाई।
- 3,000 से अधिक किसान विभिन्न शासकीय योजनाओं से लाभान्वित।
- महिला स्व-सहायता समूहों, एनएसएस स्वयंसेवकों और ग्राम पंचायतों की व्यापक भागीदारी।
- पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और सतत कृषि का राष्ट्रीय मॉडल स्थापित।
निष्कर्ष:
अबूझमाड़ की यह हरित यात्रा केवल राष्ट्रीय पुरस्कार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब समाज, शिक्षा संस्थान और प्रशासन एक साझा लक्ष्य के साथ आगे बढ़ते हैं, तो सबसे दुर्गम क्षेत्र भी देश के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। आज नारायणपुर की पहचान केवल घने जंगलों और अबूझमाड़ से नहीं, बल्कि जनभागीदारी आधारित पर्यावरण संरक्षण के राष्ट्रीय मॉडल के रूप में भी स्थापित हो चुकी है।




