नारायणपुर

अबूझमाड़ में बदली तस्वीर: जहां बरसात में कट जाता था संपर्क, वहां अब झूलता पुल बना विकास का सेतु

नक्सलवाद की छाया हटते ही विकास ने पकड़ी रफ्तार, आईटीबीपी ने जाटलूर नाले पर बनाया 250 फीट लंबा सस्पेंशन ब्रिज; ग्रामीणों, विद्यार्थियों और सुरक्षा बलों को सालभर मिलेगा सुरक्षित आवागमन

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। कभी नक्सल हिंसा और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण देशभर में पहचान रखने वाला अबूझमाड़ अब तेजी से बदल रहा है। जिस इलाके में बरसात आते ही गांव टापू बन जाते थे, बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाते थे और मरीजों को अस्पताल तक ले जाना चुनौती बन जाता था, वहां अब विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। सुरक्षा बलों ने केवल सुरक्षा का दायित्व ही नहीं निभाया, बल्कि जनजीवन को सुगम बनाने की दिशा में भी उल्लेखनीय पहल की है।

इसी कड़ी में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल (आईटीबीपी) की 38वीं वाहिनी ने जाटलूर नाले पर लगभग 250 फीट लंबा, 5 फीट चौड़ा और 15 फीट ऊंचा लकड़ी एवं बांस से निर्मित सस्पेंशन ब्रिज तैयार कर क्षेत्र के लोगों को वर्षों पुरानी समस्या से राहत दिलाई है। इस पुल का लोकार्पण केंद्रीय सीमांत मुख्यालय के महानिरीक्षक अजय पाल सिंह ने किया।

बरसात के दिनों में जाटलूर नाला उफान पर आ जाने से गांवों का संपर्क पूरी तरह टूट जाता था। ग्रामीणों, विद्यार्थियों, मरीजों और सुरक्षा बलों को जान जोखिम में डालकर नाला पार करना पड़ता था। अब यह पुल वर्षभर सुरक्षित और निर्बाध आवागमन का मजबूत माध्यम बनेगा।


कभी भय का इलाका, अब भरोसे और विकास की पहचान

अबूझमाड़ में लंबे समय तक नक्सली गतिविधियों के कारण विकास कार्य प्रभावित रहे। सड़क, पुल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं भी यहां तक नहीं पहुंच पाती थीं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों की सतत मौजूदगी और सरकार की विकासोन्मुखी पहल ने क्षेत्र की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है।

ग्रामीणों का कहना है कि पहले बारिश का मौसम आते ही कई गांव बाहरी दुनिया से कट जाते थे। बच्चों की पढ़ाई बाधित होती थी, बाजार तक पहुंचना मुश्किल होता था और किसी आपात स्थिति में घंटों इंतजार करना पड़ता था। अब वैकल्पिक लकड़ी एवं बांस से बने ऐसे पुल लोगों के लिए जीवनरेखा बन रहे हैं।


ग्रामीणों और जवानों ने मिलकर खड़ा किया विकास का पुल

इस सस्पेंशन ब्रिज का निर्माण केवल सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण है। आईटीबीपी के जवानों और स्थानीय ग्रामीणों ने संयुक्त श्रमदान करते हुए स्थानीय संसाधनों के उपयोग से पुल तैयार किया।

कम समय में तैयार हुआ यह पुल न केवल मजबूत और उपयोगी है, बल्कि यह सुरक्षा बलों और स्थानीय समाज के बीच बढ़ते विश्वास का भी प्रतीक बन गया है।


सिविक एक्शन प्रोग्राम के जरिए बांटी खुशियां

लोकार्पण समारोह के दौरान आईटीबीपी ने सिविक एक्शन प्रोग्राम (सीएपी) के अंतर्गत विद्यार्थियों एवं जरूरतमंद ग्रामीणों को साइकिलें और दैनिक उपयोग की सामग्री वितरित की। इसके साथ ही स्वरोजगार, कौशल विकास तथा केंद्र एवं राज्य शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देकर ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया गया।

ग्रामीणों और विद्यार्थियों के चेहरों पर दिखी खुशी इस बात का प्रमाण थी कि विकास अब केवल घोषणा नहीं, बल्कि जमीन पर उतरता हुआ दिखाई दे रहा है।


शहीद अमोल माधवराव महस्के के नाम से होगी पुल की पहचान

महानिरीक्षक अजय पाल सिंह ने पुल निर्माण में योगदान देने वाले अधिकारियों एवं जवानों को प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया। उन्होंने घोषणा की कि इस सस्पेंशन ब्रिज का नाम नक्सल विरोधी अभियान में सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीद अमोल माधवराव महस्के की स्मृति में रखा जाएगा।

उन्होंने कहा कि यह पुल केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा, साहस और सर्वोच्च बलिदान का जीवंत स्मारक भी रहेगा।


अधिकारियों और ग्रामीणों की रही बड़ी भागीदारी

कार्यक्रम में कमांडेंट राजीव गुप्ता (45वीं वाहिनी), अभिषेक सूद (29वीं वाहिनी), द्वितीय कमान अशोक कुमार सिंह (38वीं वाहिनी), संजय कुमार (53वीं वाहिनी) सहित केंद्रीय सीमांत मुख्यालय एवं विभिन्न वाहिनियों के अधिकारी उपस्थित रहे। बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, शिक्षक, विद्यार्थी और ग्रामीण भी समारोह में शामिल हुए।

समापन पर ग्रामीणों एवं बच्चों के बीच मिठाइयां वितरित की गईं तथा सामूहिक भोज का आयोजन किया गया।


व्यू

अबूझमाड़ की बदलती तस्वीर केवल पुल निर्माण की कहानी नहीं, बल्कि विश्वास, विकास और सुरक्षा के नए दौर की शुरुआत है। जिन इलाकों में कभी भय का साया था, वहां आज बच्चों के हाथों में साइकिल है, गांवों को जोड़ते पुल हैं और विकास की नई उम्मीद दिखाई दे रही है। यदि इसी गति से आधारभूत सुविधाओं का विस्तार जारी रहा तो अबूझमाड़ आने वाले वर्षों में परिवर्तन का राष्ट्रीय उदाहरण बन सकता है।

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