जहां कभी लहराते थे काले झंडे, अब फहरेगा तिरंगा!
चार दशक की दहशत के बाद अबूझमाड़ में आजादी का असली उत्सव; कोरसकोड़ो से कुमनार तक पहली बार जश्न की तैयारी, गांवों में उमंग—‘अब डर नहीं, लोकतंत्र का भरोसा’

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। अबूझमाड़ की घनी पहाड़ियों और जंगलों में इस बार 15 अगस्त का सूर्योदय एक नई कहानी लिखने जा रहा है। जिन इलाकों में कभी स्वतंत्रता दिवस का नाम सुनते ही बंदूक की छाया और नक्सली फरमान का खौफ छा जाता था, वहां अब तिरंगे की तैयारी है। जहां कभी काले झंडे फहराकर आजादी के पर्व का विरोध जताया जाता था, वहीं अब राष्ट्रीय ध्वज पूरे सम्मान और उत्साह के साथ लहराने की तैयारी है।
यह बदलाव महज एक ध्वजारोहण कार्यक्रम नहीं है। यह उस अबूझमाड़ की तस्वीर बदलने का संकेत है, जो दशकों तक दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और माओवादी हिंसा के कारण मुख्यधारा से लगभग कटा रहा। सुरक्षा बलों की बढ़ती पहुंच, नए सुरक्षा एवं जनसुविधा कैंप, सड़क और संपर्क सुविधाओं के विस्तार के साथ अब यहां डर की जगह भरोसा और बंदूक की जगह तिरंगा दिखाई देने लगा है।
कभी काले झंडे, अब तिरंगे की तैयारी
अबूझमाड़ के कोरसकोड़ो, हच्चेकोटी, आदनार, बोटेर, कुमनार, दिवालूर, गुंडेकोट, रेकापाल और रासमेटा जैसे दुर्गम क्षेत्रों में इस बार स्वतंत्रता दिवस को लेकर विशेष तैयारियां की जा रही हैं। इन इलाकों में हाल के महीनों में सुरक्षा एवं जनसुविधा कैंपों की स्थापना के बाद प्रशासन और सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ी है।
नारायणपुर पुलिस ने 2026 में जटवर, वाड़ापेंदा, कुरसकोड़ो, हच्चेकोटी, आदनार, बोटेर, दिवालूर और कुमनार जैसे इलाकों में नए सुरक्षा एवं जनसुविधा कैंप स्थापित किए हैं। इन कैंपों का उद्देश्य केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़क, पुल-पुलिया, शिक्षा, चिकित्सा और मोबाइल नेटवर्क जैसी सुविधाओं को अंदरूनी क्षेत्रों तक पहुंचाने में सहयोग करना भी है।
कुमनार से दिवालूर तक बदली तस्वीर
22 मार्च 2026 को कुमनार में सुरक्षा एवं जनसुविधा कैंप की स्थापना को अबूझमाड़ में बदलते माहौल की महत्वपूर्ण कड़ी माना गया। पुलिस के अनुसार कुमनार से भैरमगढ़ तक सड़क संपर्क विकसित होने से इस क्षेत्र के ग्रामीणों की आवाजाही और मुख्यधारा की सुविधाओं तक पहुंच आसान होगी।
इससे पहले मार्च में दिवालूर में भी नवीन कैंप स्थापित किया गया था। यह इलाका लंबे समय तक माओवादी गतिविधियों के प्रभाव वाले दुर्गम क्षेत्र के रूप में जाना जाता रहा है। कैंप स्थापित होने के बाद आसपास के क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार सुविधाओं के विस्तार का रास्ता खुला है।
हच्चेकोटी-आदनार में भी पहुंची सुरक्षा की नई रोशनी
फरवरी 2026 में हच्चेकोटी और आदनार में सुरक्षा एवं जनसुविधा कैंप स्थापित किए गए। पुलिस के अनुसार इन कैंपों से आसपास के गांवों में सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों को सुरक्षा प्रदान करने के साथ शासन की योजनाओं को अंदरूनी इलाकों तक पहुंचाने में मदद मिल रही है।
यानी अबूझमाड़ में बदलाव केवल झंडे तक सीमित नहीं है। पहले जहां पहुंचना चुनौती था, वहां अब सड़क पहुंच रही है; जहां संवाद मुश्किल था, वहां प्रशासन पहुंच रहा है और जहां डर था, वहां धीरे-धीरे भरोसा आकार ले रहा है।
चार दशक का इंतजार… अब बच्चों के हाथ में तिरंगा
इस बार का स्वतंत्रता दिवस उन ग्रामीण परिवारों के लिए भावनात्मक क्षण होगा, जिन्होंने वर्षों तक राष्ट्रीय पर्व को उस तरह नहीं मनाया जैसा देश के दूसरे हिस्सों में मनाया जाता है।
कल्पना कीजिए—अबूझमाड़ के किसी छोटे से गांव में सुबह बच्चे कतार में खड़े हैं। सामने तिरंगा है। राष्ट्रगान की धुन गूंजती है। बुजुर्ग ग्रामीण पहली बार खुले मन से आजादी का पर्व मनाते हैं और आसमान में लहराता तिरंगा उन्हें बताता है कि देश की मुख्यधारा अब उनसे दूर नहीं रही।
यह तस्वीर अबूझमाड़ के बदलते दौर की सबसे बड़ी पहचान बन सकती है।
नक्सली प्रभाव के कमजोर पड़ने के साथ बढ़ी लोकतंत्र की पहुंच
अबूझमाड़ में पिछले कुछ समय में सुरक्षा बलों की लगातार बढ़ती मौजूदगी और नए कैंपों की स्थापना से माओवादी प्रभाव वाले कई इलाकों में प्रशासनिक संपर्क मजबूत हुआ है। जनवरी 2026 में भी अबूझमाड़ सहित बस्तर के कई इलाकों में पहली बार गणतंत्र दिवस मनाने और तिरंगा फहराने की खबर सामने आई थी।
मार्च 2026 में नारायणपुर पुलिस ने अबूझमाड़ को नक्सलमुक्त दिशा में निर्णायक उपलब्धि बताते हुए बड़े पैमाने पर हथियार, गोला-बारूद और विस्फोटक सामग्री बरामद करने की जानकारी दी थी।
अब सवाल सिर्फ तिरंगा फहराने का नहीं, उसे थामे रखने का है
अबूझमाड़ में तिरंगा फहराना प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन असली चुनौती इसके बाद की है। राष्ट्रीय ध्वज के साथ सड़क, स्कूल, अस्पताल, रोजगार, बिजली, मोबाइल नेटवर्क और सरकारी योजनाओं की स्थायी पहुंच भी सुनिश्चित करनी होगी।
क्योंकि आजादी का असली अर्थ तभी पूरा होगा, जब अबूझमाड़ का ग्रामीण सिर्फ 15 अगस्त को तिरंगा न देखे, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में भी लोकतंत्र और विकास की मौजूदगी महसूस करे।
काले झंडों से तिरंगे तक… यह सिर्फ रंग का बदलाव नहीं
अबूझमाड़ में इस बार लहराने वाला तिरंगा केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं होगा। वह उन वर्षों की पीड़ा के बाद लौटते विश्वास का प्रतीक होगा। वह बताएगा कि जिस धरती पर कभी भय ने उत्सव को रोक दिया था, वहां अब लोकतंत्र अपने पूरे सम्मान के साथ दस्तक दे रहा है।
15 अगस्त की सुबह जब अबूझमाड़ की पहाड़ियों के बीच तिरंगा हवा में लहराएगा, तो संदेश साफ होगा—
‘जहां कभी डर का राज था, वहां अब संविधान का भरोसा है।’




