नारायणपुर

ठूंठों से लौटती हरियाली: अबूझमाड़ ने फिर सिखाया, प्रकृति कभी हार नहीं मानती

विनाश के बाद पुनर्जन्म की यह कहानी केवल जंगल की नहीं, बल्कि इंसान और प्रकृति के रिश्ते को फिर से समझने का अवसर भी है

लेखक : कैलाश सोनी


अबूझमाड़… यह नाम सुनते ही आंखों के सामने घने जंगल, बादलों में लिपटी पहाड़ियां, कल-कल बहते झरने और प्रकृति की गोद में बसे आदिवासी गांवों की तस्वीर उभर आती है। बस्तर का यह इलाका केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि मध्य भारत के सबसे समृद्ध प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहरों में से एक है। सदियों से यहां के जंगलों ने न केवल वन्यजीवों और जैव विविधता को आश्रय दिया है, बल्कि हजारों आदिवासी परिवारों के जीवन, संस्कृति और आजीविका को भी संजोकर रखा है।

लेकिन कुछ समय पहले इन जंगलों ने ऐसा दर्द देखा, जिसने हर प्रकृति प्रेमी को भीतर तक झकझोर दिया था। जहां कभी दूर-दूर तक साल और सागौन की हरियाली लहराती थी, वहां केवल राख, जले हुए तने और कटे हुए पेड़ों की ठूंठें दिखाई देती थीं। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने जंगल की आत्मा ही छीन ली हो।

आज उसी अबूझमाड़ में खड़ा होकर जब मैं कच्चापाल और तोके की पहाड़ियों को देखता हूं, तो मन अनायास ही ठहर जाता है। वही ठूंठ, जिन्हें देखकर कभी लगा था कि अब इनमें जीवन नहीं बचा, आज उन्हीं से नई-नई कोपलें फूट रही हैं। बारिश की बूंदों ने मानो प्रकृति के पुराने घावों पर मरहम लगा दिया हो।

यही अबूझमाड़ की सबसे बड़ी कहानी है—प्रकृति कभी हार नहीं मानती।

जब जंगल रोया था…

नक्सल प्रभाव कम होने के बाद अबूझमाड़ के कई हिस्सों में पहली बार लोग बड़ी संख्या में पहुंचे। विकास के रास्ते खुले, सड़कें बनीं, लेकिन इसी दौर में जंगलों के कुछ हिस्सों में अवैध कटाई और आगजनी की घटनाओं ने प्रकृति को गहरा जख्म दिया।

अबूझमाड़ के इन इलाकों में हजारों की संख्या में पेड़ नष्ट हुए। सैटेलाइट चित्रों में भी कई हिस्से हरे रंग की जगह भूरे दिखाई देने लगे। जो पहाड़ियां कभी हरियाली से ढकी रहती थीं, वे अचानक सूनी और उदास लगने लगीं।

उन दिनों जब मैं इन इलाकों में पहुंचा था, तो दूर-दूर तक जली हुई लकड़ियां, राख और काले पड़ चुके तने दिखाई देते थे। ऐसा लगता था जैसे जंगल बोलना भूल गया हो।

फिर एक दिन बारिश आई…

प्रकृति का अपना समय होता है। वह जल्दीबाजी नहीं करती।

पहली अच्छी बारिश के कुछ ही सप्ताह बाद कटे हुए ठूंठों पर हल्की-हल्की हरी कोपलें दिखाई देने लगीं। शुरुआत में लगा कि शायद कुछ झाड़ियां उग रही होंगी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, स्पष्ट होने लगा कि यह उन्हीं पेड़ों का पुनर्जन्म है जिन्हें मृत मान लिया गया था।

आज उन्हीं ठूंठों से निकलती शाखाएं हवा के साथ झूमती दिखाई देती हैं। पहाड़ियां फिर से हरी होने लगी हैं। जंगल की खामोशी में फिर पक्षियों की आवाज सुनाई देने लगी है।

यह दृश्य केवल आंखों को सुकून नहीं देता, बल्कि मन में एक विश्वास भी जगाता है कि जीवन कभी समाप्त नहीं होता।

प्रकृति की सबसे बड़ी ताकत—पुनर्जनन

वैज्ञानिक इसे प्राकृतिक पुनर्जनन कहते हैं।

साल, सागौन और तेन्दू जैसे वृक्षों की जड़ों में वर्षों तक जीवन सुरक्षित रहता है। यदि जड़ों को पूरी तरह नष्ट न किया जाए और उन्हें संरक्षण मिले तो वहीं से नई शाखाएं निकल आती हैं।

प्रकृति हमें बिना कुछ कहे यह सिखाती है कि टूटना अंत नहीं होता। हर अंत के भीतर एक नई शुरुआत छिपी होती है।

शायद इसलिए जंगलों को सबसे बड़ा शिक्षक कहा जाता है।

अबूझमाड़ केवल जंगल नहीं है

आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चिंता कर रही है, तब अबूझमाड़ का महत्व और भी बढ़ जाता है।

करीब 3900 वर्ग किलोमीटर में फैला यह वन क्षेत्र बस्तर का ग्रीन लंग्स माना जाता है। यहां की हरियाली वर्षा चक्र को संतुलित रखती है। यही जंगल नदियों को पानी देते हैं, भूजल को बचाते हैं और हजारों परिवारों की आजीविका का आधार बनते हैं।

महुआ, तेंदूपत्ता, हर्रा, बहेरा, चार और अनेक लघु वनोपज यहां के लोगों के लिए केवल वन उपज नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं।

यहां के जंगलों में 600 से अधिक औषधीय पौधों की प्रजातियां पाई जाती हैं। इसलिए जब एक पेड़ कटता है तो केवल लकड़ी नहीं जाती, बल्कि उसके साथ पूरी जैव विविधता का एक हिस्सा भी खत्म हो जाता है।

जंगल बचेंगे तो संस्कृति बचेगी

अबूझमाड़ के आदिवासी समाज के लिए जंगल किसी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज वन भूमि नहीं हैं।

यही उनका बाजार है।

यही उनका अस्पताल है।

यही उनका विद्यालय है।

यही उनका मंदिर है।

उनके लोकगीतों में जंगल है, त्योहारों में जंगल है और जीवन के हर संस्कार में जंगल मौजूद है।

इसलिए जब जंगल उजड़ते हैं तो केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि पूरी संस्कृति घायल होती है।

यह दूसरा अवसर है

अबूझमाड़ आज हमें दूसरा अवसर दे रहा है।

प्रकृति ने अपना काम शुरू कर दिया है। अब जिम्मेदारी हमारी है।

यदि इन क्षेत्रों को अगले पांच वर्षों तक सुरक्षित रखा जाए, अवैध कटाई और आगजनी पर पूरी तरह रोक लगे तथा स्थानीय समुदाय को वन संरक्षण का साझेदार बनाया जाए, तो यही कोपलें कुछ वर्षों बाद फिर घने वृक्ष बन सकती हैं।

लेकिन यदि हमने फिर वही गलतियां दोहराईं तो शायद इस बार जंगल इतनी जल्दी लौटकर नहीं आएगा।

ठूंठों में छिपा जीवन का दर्शन

जब मैं कच्चापाल की पहाड़ियों पर खड़ा होकर उन ठूंठों से निकलती कोपलों को देख रहा था, तब मुझे लगा कि प्रकृति शायद इंसानों से कहीं अधिक धैर्यवान है।

हम छोटी-सी असफलता पर हार मान लेते हैं।

प्रकृति हजारों पेड़ खो देने के बाद भी मुस्कुराना नहीं छोड़ती।

वह राख से भी हरियाली उगा देती है।

यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

अबूझमाड़ की खामोश पुकार

आज अबूझमाड़ के जंगल किसी भाषण या नारे के माध्यम से नहीं, बल्कि अपनी लौटती हरियाली के जरिए पूरी दुनिया को संदेश दे रहे हैं।

वे कह रहे हैं—

“हमें बचाइए, क्योंकि हमारे बिना न बारिश बचेगी, न नदियां, न जंगल, न जीवन।”

कटे हुए ठूंठों से निकली ये नन्हीं कोपलें केवल नए पेड़ नहीं हैं। ये आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीद की सांस हैं। ये विश्वास हैं कि धरती अभी जीवित है और यदि हम उसके साथ खड़े रहें तो वह हर बार स्वयं को फिर से हरा-भरा कर सकती है।

अबूझमाड़ की यह हरियाली केवल बस्तर की नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है। यह हमें सिखाती है कि विकास और पर्यावरण विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जंगल बचेंगे, तभी भविष्य बचेगा।

और शायद इसी कारण अबूझमाड़ की पहाड़ियों पर फूटती हर नई कोपल आज चुपचाप यही कह रही है—

“मैं फिर लौट आई हूं… अब तुम मुझे बचाकर रखना।”

— कैलाश सोनी
 स्थानीय पत्रकार, नारायणपुर (बस्तर)

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