नारायणपुर

15 साल का वनवास खत्म: नक्सल दहशत में उजड़े 9 परिवारों की घर वापसी, गांव ने खोले अपने दरवाजे

पहले लौटने पर उठा था विरोध, ग्रामसभा की सहमति की मांग से टूटी थी उम्मीद; अब पुलिस-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की पहल से छिनारी में लौटी खुशियां

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। अबूझमाड़ के गांवों से नक्सल हिंसा और भय के कारण वर्षों पहले उजड़कर दर-दर भटकने को मजबूर हुए परिवारों की जिंदगी में आखिरकार राहत की सुबह आ गई है। एक समय ऐसा भी आया था, जब अपने पैतृक गांव लौटने की उम्मीद लेकर पहुंचे इन परिवारों को ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा और उनकी घर वापसी की आस टूटती नजर आने लगी थी। लेकिन पुलिस, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की पहल, संवाद और आपसी सहमति के प्रयासों ने वर्षों पुराने विवाद को समाप्त कर दिया। अब ग्राम पंचायत छिनारी में 9 परिवारों की सम्मानपूर्वक वापसी हुई है और उनके लिए गांव के दरवाजे फिर से खुल गए हैं।

यह केवल कुछ परिवारों की वापसी नहीं, बल्कि नक्सलवाद की त्रासदी झेल चुके लोगों के जीवन में विश्वास, सम्मान और सामाजिक पुनर्स्थापना की नई शुरुआत मानी जा रही है।

पहले विरोध से पैदा हुई थी निराशा

अबूझमाड़ क्षेत्र में नक्सली हिंसा और संघर्ष के दौर में अनेक आदिवासी परिवार अपनी जान बचाने के लिए गांव छोड़कर दूसरे जिलों और राज्यों में चले गए थे। वर्षों तक विस्थापन का जीवन जीने के बाद जब क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई, सड़कें बनीं और हालात सामान्य होने लगे, तब इन परिवारों के मन में अपने गांव और जमीन से दोबारा जुड़ने की उम्मीद जगी।

करीब दो दशक बाद गांव लौटने की तैयारियों के बीच कई गांवों में इसका विरोध शुरू हो गया था। ग्रामीणों का कहना था कि इतने वर्षों बाद लौट रहे परिवारों को लेकर पहले ग्रामसभा में चर्चा होनी चाहिए और सामूहिक सहमति के बाद ही निर्णय लिया जाना चाहिए। ग्रामीणों को जमीन, वन अधिकार और सामाजिक संतुलन को लेकर आशंकाएं थीं।

वहीं विस्थापित परिवारों का कहना था कि उन्होंने किसी स्वार्थ से नहीं, बल्कि नक्सल हिंसा और भय के कारण गांव छोड़ा था। अब जब हालात बदल रहे हैं, तो वे अपनी मिट्टी, अपनी पहचान और अपने पुरखों की जमीन से फिर जुड़ना चाहते हैं।

दो पाटों के बीच पिसते रहे परिवार

इन परिवारों की पीड़ा केवल विस्थापन तक सीमित नहीं थी। एक ओर नक्सलवाद की दहशत ने उन्हें गांव छोड़ने के लिए मजबूर किया, तो दूसरी ओर वर्षों बाद लौटने पर अपने ही गांव में स्वीकार्यता को लेकर संकट खड़ा हो गया।

करीब 15 वर्षों तक विस्थापन का जीवन जीने वाले इन परिवारों ने मजदूरी और अस्थायी काम करके किसी तरह जीवनयापन किया। लेकिन उनके मन में अपने गांव, खेत और सामाजिक जीवन से दोबारा जुड़ने की इच्छा कभी समाप्त नहीं हुई।

संवाद से निकला समाधान, छिनारी में बनी सहमति

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने लगातार संवाद की प्रक्रिया शुरू की। इसी क्रम में 18 जून को ग्राम पंचायत छिनारी में ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ नागरिकों, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में बैठक आयोजित की गई।

बैठक में सभी पक्षों ने अपनी-अपनी बातें रखीं और अंततः आपसी सहमति तथा सामाजिक सौहार्द के साथ वर्षों पुराने विवाद का समाधान निकाल लिया गया। ग्रामीणों ने 9 परिवारों को दोबारा गांव में बसने की सामाजिक स्वीकृति प्रदान की।

जनप्रतिनिधियों और प्रशासन ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

इस महत्वपूर्ण पहल में छत्तीसगढ़ राज्य लघुवनोपज सहकारी संघ के अध्यक्ष रूपसाय सलाम, जिला पंचायत अध्यक्ष नारायण मरकाम, ग्राम पंचायत छिनारी की सरपंच मंगती सलाम, उपसरपंच नगसु गावड़े, एसडीओपी अविनाश कंवर, थाना प्रभारी सीताराम सागर सहित जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ ग्रामीणों और प्रशासनिक अधिकारियों ने सक्रिय भूमिका निभाई।

सभी ने सामाजिक सद्भाव, भाईचारे और विश्वास को मजबूत करने पर जोर देते हुए गांव में स्थायी शांति की दिशा में इस पहल को महत्वपूर्ण बताया।

गांववासियों ने किया आत्मीय स्वागत

सहमति बनने के बाद लौटे परिवारों का गांववासियों ने आत्मीयता और सद्भाव के साथ स्वागत किया। ग्रामीणों ने भरोसा दिलाया कि वे सभी परिवार अब गांव के सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा होंगे।

वहीं लौटे परिवारों ने भी खुशी व्यक्त करते हुए पुलिस, प्रशासन और गांववासियों के प्रति आभार जताया। उनका कहना है कि वर्षों बाद अब वे अपने पैतृक गांव में घर बनाकर खेती-किसानी और अन्य आजीविका गतिविधियों के जरिए सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे।

बस्तर की पीड़ा से उम्मीद की कहानी तक

बस्तर में विस्थापन का मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील रहा है। सलवा जुडूम और नक्सल हिंसा के दौर में हजारों परिवारों को अपने गांव छोड़ने पड़े थे। ऐसे में छिनारी में 9 परिवारों की सम्मानजनक वापसी केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण है, जिन्होंने वर्षों तक अपनी जमीन और पहचान से दूर रहकर जीवन बिताया।

‘विग्रह से विश्वास की ओर’ बना नई शुरुआत का संदेश

छिनारी में हुई यह पहल इस बात का उदाहरण बनकर सामने आई है कि संवाद, आपसी विश्वास और सामाजिक सहमति के जरिए वर्षों पुराने मतभेदों को भी समाप्त किया जा सकता है। नक्सलवाद की पीड़ा झेल चुके इन परिवारों के लिए यह केवल घर वापसी नहीं, बल्कि सम्मान, पहचान और अपनेपन की वापसी है।

आज छिनारी में फिर से खुशियां लौटी हैं और 15 वर्षों का वनवास समाप्त होने के साथ उन परिवारों के चेहरे पर मुस्कान लौट आई है, जो कभी अपनी ही मिट्टी से बिछड़ गए थे। यह कहानी संघर्ष से विश्वास और विग्रह से पुनर्मिलन तक की एक नई शुरुआत की कहानी बन गई है।

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