नारायणपुर

चार दशक के इंतजार के बाद विकास की धार पहुंची अबूझमाड़

महाराष्ट्र सीमा से सटे पदमकोट में हर घर नल से जल, सौर ऊर्जा आधारित जलापूर्ति से बदली आदिवासी जीवनशैली

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। कभी नक्सल प्रभाव, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और सरकारी योजनाओं की सीमित पहुंच के कारण विकास से कोसों दूर रहा अबूझमाड़ अब तेजी से बदल रहा है। जिन पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसे गांवों में वर्षों तक मूलभूत सुविधाएं सपना थीं, वहां अब विकास की नई धारा बह रही है। महाराष्ट्र सीमा से सटी नारायणपुर जिले की अंतिम ग्राम पंचायतों में शामिल पदमकोट इसका ताजा उदाहरण बनकर सामने आई है, जहां जल जीवन मिशन के माध्यम से हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंच रहा है।

चार दशकों तक नक्सली प्रभाव के कारण प्रशासनिक पहुंच सीमित रहने वाले इस इलाके में अब सुरक्षा बलों की सतत कार्रवाई, राज्य सरकार की इच्छाशक्ति और प्रशासनिक सक्रियता के परिणामस्वरूप विकास कार्यों ने गति पकड़ी है। जिन ग्रामीणों को कभी एक मटकी पानी के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था, आज उनके घरों के आंगन तक नल के माध्यम से पानी पहुंच रहा है। यह बदलाव केवल पेयजल सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि अबूझमाड़ के सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी जीवन में व्यापक परिवर्तन का संकेत भी है।

जिला मुख्यालय नारायणपुर से लगभग 65 किलोमीटर दूर स्थित पदमकोट पंचायत लंबे समय तक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रही। घने जंगल, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के कारण यहां विकास योजनाओं का क्रियान्वयन आसान नहीं था। लेकिन बीते कुछ वर्षों में बदले हालात ने प्रशासन को गांव-गांव तक पहुंचने का अवसर दिया और अब परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं।

जल जीवन मिशन के तहत पंचायत में 3,925 मीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई है। साथ ही 10 हजार लीटर क्षमता की चार सौर ऊर्जा आधारित पानी टंकियों का निर्माण किया गया है। इन टंकियों के माध्यम से पूरे गांव में नियमित रूप से स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति की जा रही है। विशेष बात यह है कि पूरी व्यवस्था सौर ऊर्जा से संचालित है, जिससे बिजली पर निर्भरता कम होने के साथ-साथ दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में निर्बाध जलापूर्ति सुनिश्चित हो रही है।

ग्रामीणों के अनुसार कुछ वर्ष पहले तक पानी की व्यवस्था उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। गर्मी के दिनों में महिलाएं और बच्चे सुबह से लेकर दोपहर तक जलस्रोतों की तलाश में भटकते थे। कई बार उन्हें पहाड़ी ढलानों और जंगलों से होकर दूरस्थ झरनों या कुओं तक जाना पड़ता था। दिन का बड़ा हिस्सा केवल पानी लाने में बीत जाता था। अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। घर-घर नल कनेक्शन मिलने से पानी के लिए होने वाला संघर्ष समाप्त हो गया है।

इस बदलाव का सबसे अधिक लाभ महिलाओं को मिला है। पानी लाने में लगने वाला समय और श्रम बचने से वे अब स्वयं सहायता समूहों, कृषि आधारित गतिविधियों और अन्य आजीविका कार्यों में भागीदारी बढ़ा रही हैं। वहीं बच्चों को भी राहत मिली है। पहले जहां कई बच्चे पानी लाने में परिवार का सहयोग करते थे, अब वे पढ़ाई और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के लिए अधिक समय निकाल पा रहे हैं।

पेयजल उपलब्धता का सकारात्मक प्रभाव स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी दिखाई देने लगा है। स्वच्छ और सुरक्षित पानी मिलने से जलजनित बीमारियों के मामलों में कमी आई है। ग्रामीणों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ी है तथा घरों और आसपास के वातावरण को साफ-सुथरा रखने की प्रवृत्ति विकसित हुई है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का मानना है कि स्वच्छ पेयजल किसी भी ग्रामीण क्षेत्र के स्वास्थ्य स्तर को सुधारने का सबसे प्रभावी माध्यम है और पदमकोट में इसके परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

पानी की उपलब्धता ने गांव के पोषण स्तर को बेहतर बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अनेक परिवारों ने अपने घरों के आसपास किचन गार्डन विकसित किए हैं। इन उद्यानों में मौसमी सब्जियां, हरी पत्तेदार फसलें और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ उगाए जा रहे हैं। इससे ग्रामीण परिवारों को ताजा सब्जियां उपलब्ध होने लगी हैं तथा बाजार पर निर्भरता कम हुई है। स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ने से परिवारों के भोजन में विविधता आई है और पोषण सुरक्षा को मजबूती मिली है।

अबूझमाड़ में हो रहे इस परिवर्तन को केवल एक सरकारी योजना की सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह उस व्यापक बदलाव का प्रतीक है, जो क्षेत्र में शांति और विकास की स्थापना के साथ संभव हुआ है। कभी नक्सली गतिविधियों के कारण जहां विकास कार्यों की कल्पना भी कठिन थी, वहां आज सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पेयजल जैसी सुविधाएं पहुंच रही हैं। शासन की योजनाएं अब जंगलों के भीतर बसे अंतिम गांवों तक पहुंचने लगी हैं।

पदमकोट की कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि प्रशासनिक प्रतिबद्धता, योजनाबद्ध क्रियान्वयन और सुरक्षा का वातावरण उपलब्ध हो तो सबसे दुर्गम क्षेत्र भी विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकते हैं। जल जीवन मिशन ने यहां केवल नल से पानी नहीं पहुंचाया है, बल्कि लोगों के जीवन में सुविधा, सम्मान और आत्मविश्वास का संचार किया है।

महाराष्ट्र सीमा से सटा यह वनांचल गांव आज उस नए अबूझमाड़ की तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है, जहां विकास अब दस्तक नहीं दे रहा, बल्कि स्थायी रूप से अपना स्थान बना रहा है। वर्षों तक उपेक्षा और संघर्ष का प्रतीक रहा यह क्षेत्र अब उम्मीद, बदलाव और समावेशी विकास की नई पहचान गढ़ता दिखाई दे रहा है।

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