अबूझमाड़ में खाकी का मानवीय चेहरा: 17 दिन से बीमार महिला को स्ट्रेचर पर 10 घंटे तक ढोया
सड़कविहीन जंगल, 2-3 फीट पानी और फिसलन भरे रास्तों के बीच ITBP का रेस्क्यू अभियान; इलाज के लिए ले जाते समय महिला ने तोड़ा दम, पति की इच्छा पर जवान पार्थिव शरीर लेकर फिर पहुंचे गांव

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। अबूझमाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच सुरक्षा बलों का मानवीय चेहरा एक बार फिर सामने आया है। 29वीं वाहिनी भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के जवानों ने सड़कविहीन और दुर्गम इलाके में बीमार महिला को चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाने के लिए घंटों पैदल सफर किया। लगातार बारिश, कीचड़, फिसलन, नाले और लॉग ब्रिज जैसी बाधाओं के बावजूद जवान स्ट्रेचर लेकर आगे बढ़ते रहे। हालांकि अस्पताल पहुंचने से पहले ही महिला ने दम तोड़ दिया। इसके बाद पति की इच्छा का सम्मान करते हुए जवान पार्थिव शरीर को भी उसी दुर्गम रास्ते से पैदल गांव तक लेकर पहुंचे।


यह घटना 3 सितंबर की है। ग्राम दिवालूर की 51 वर्षीय बुदरी मंडावी, पत्नी बिज्जा मंडावी, पिछले करीब 17 दिनों से बुखार से पीड़ित थीं। पिछले 12 दिनों से वह केवल तरल आहार पर थीं और अत्यधिक कमजोर हो चुकी थीं। उनके पति सहित तीन ग्रामीण सुबह करीब 9 बजे पैदल दिवालूर COB पहुंचे और ITBP जवानों को महिला की गंभीर स्थिति की जानकारी दी।

सूचना मिलते ही 16 जवानों की मेडिकल-रेस्क्यू टीम रवाना
जानकारी मिलते ही इंस्पेक्टर शिव प्रताप ने तत्काल मेडिकल एवं रेस्क्यू पार्टी को गांव भेजा। 16 सदस्यीय दल पैदल दिवालूर पहुंचा और महिला को स्ट्रेचर पर लेकर दिवालूर COB की ओर रवाना हुआ। वहां प्राथमिक उपचार और चिकित्सकीय जांच की गई। उस समय महिला के जीवन-रक्षक संकेत लगभग सामान्य पाए गए।
महिला की स्थिति को देखते हुए दल ने उसे आगे के उपचार के लिए बोतेर COB होते हुए ओरछा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की ओर ले जाना शुरू किया।
2-3 फीट पानी, दो लॉग ब्रिज… फिर भी नहीं रुके कदम
रेस्क्यू का रास्ता किसी चुनौती से कम नहीं था। लगातार बारिश के कारण रास्ते में कीचड़ और फिसलन थी। सड़क पूरी तरह गैर-मोटरेबल थी। इसके बावजूद जवान स्ट्रेचर लेकर आगे बढ़ते रहे। रास्ते में दो लॉग ब्रिज पार किए गए और 2 से 3 फीट तक जलस्तर वाले नालों को भी सावधानीपूर्वक पार कराया गया।
मेडिकल स्टाफ पूरे रास्ते महिला की स्थिति पर नजर रखे हुए था। करीब दोपहर 1.30 बजे बोतेर से लगभग एक घंटे पहले भी महिला की जांच की गई। इसके बाद दल ने बारिश और कठिन रास्ते के बीच भी उसे जल्द से जल्द चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाने का प्रयास जारी रखा।
मंजिल करीब थी… लेकिन रास्ते में थम गई सांसें
करीब 2.30 बजे बोतेर COB पहुंचने से पहले मेडिकल स्टाफ ने महिला की दोबारा जांच की। इस दौरान उसके जीवन-रक्षक संकेत नहीं मिले और उसकी मृत्यु हो चुकी थी। बोतेर COB नजदीक होने के कारण जवान महिला को लेकर आगे बढ़ते रहे और करीब 2.40 बजे COB पहुंचे।
COB पहुंचने के बाद घटना की जानकारी कमांडर को दी गई और महिला के पति को स्थिति से अवगत कराया गया।
पति ने कहा- गांव ले जाना है पार्थिव शरीर
महिला के पति ने इच्छा जताई कि वे अपनी पत्नी के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए पैतृक गांव दिवालूर ले जाना चाहते हैं। ITBP जवानों ने उनकी इच्छा का सम्मान किया।
इसके बाद 3 एसओ, 24 अन्य कार्मिक और एक मेडिक सहित 27 सदस्यीय दल पार्थिव शरीर को स्ट्रेचर पर लेकर वापस दिवालूर के लिए पैदल रवाना हुआ। जिस रास्ते से कुछ घंटे पहले महिला को बचाने के लिए जवान निकले थे, उसी रास्ते पर अब वे उनका पार्थिव शरीर लेकर लौट रहे थे।
लगातार बारिश, कीचड़, फिसलन, नाले और दुर्गम पहाड़ी रास्तों को पार करते हुए दल करीब शाम 6.05 बजे दिवालूर पहुंचा और पार्थिव शरीर परिजनों को सौंप दिया।
नक्सलवाद के बाद बदलती तस्वीर, अब मददगार बना सुरक्षा बल
अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सलवाद और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विकास की मुख्यधारा से दूर रहा। सड़क, परिवहन और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी आज भी यहां बड़ी चुनौती है। ऐसे में सुरक्षा बलों की भूमिका केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गई है। दुर्गम गांवों में जरूरत के समय ग्रामीणों तक पहुंचना और उन्हें मानवीय सहायता उपलब्ध कराना भी सुरक्षा बलों और ग्रामीणों के बीच विश्वास की नई कड़ी बन रहा है।
दिवालूर की यह घटना इसी बदलती तस्वीर को सामने लाती है। एक ओर स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंचने में भूगोल की कठिनाई ने जिंदगी छीन ली, वहीं दूसरी ओर उसी कठिन भूगोल से जूझते जवानों ने इंसानियत का फर्ज निभाते हुए महिला को सम्मानपूर्वक उसके गांव तक पहुंचाया।
सुरक्षा से आगे, विश्वास की जिम्मेदारी
29वीं वाहिनी ITBP का यह अभियान अबूझमाड़ के ग्रामीण इलाकों में सुरक्षा के साथ मानवीय सेवा और भरोसे की भूमिका को भी रेखांकित करता है। सीमित चिकित्सा एवं परिवहन सुविधाओं वाले क्षेत्रों में सूचना मिलते ही जवानों का कठिन परिस्थितियों में ग्रामीणों तक पहुंचना निश्चित रूप से सराहनीय प्रयास है।
अबूझमाड़ में नक्सलवाद की पकड़ कमजोर होने के बाद यदि ग्रामीणों को सुरक्षा बलों से सुरक्षा के साथ स्वास्थ्य, आपदा और मानवीय सहायता का भरोसा मिलता है, तो यह क्षेत्र में बदलते विश्वास की महत्वपूर्ण तस्वीर है। दिवालूर की बुदरी मंडावी को बचाया नहीं जा सका, लेकिन उन्हें बचाने की कोशिश में जवानों ने जिस तरह बारिश और जंगल की कठिनाइयों को चुनौती दी और बाद में उनके पार्थिव शरीर को गांव तक पहुंचाया, वह सुरक्षा बलों की मानवीय प्रतिबद्धता का उदाहरण बन गया।




