नारायणपुर

बंदूक से ट्रैक्टर तक: पुनर्वास की राह पर बदली जिंदगी

नारायणपुर में आत्मसमर्पितों को कौशल प्रशिक्षण व दस्तावेजों से मिल रही नई पहचान, लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ने की पहल तेज

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। कभी जंगलों में बंदूक थामे जीवन बिताने वाले हाथ अब ट्रैक्टर के इंजन, क्लच और गियर को समझने में जुटे हैं। जिला मुख्यालय स्थित लाइवलीहुड कॉलेज परिसर में संचालित पुनर्वास केंद्र का हाल जानने जब हमने मौके पर पहुंचकर पड़ताल की, तो एक बदली हुई तस्वीर सामने आई—जहां अस्थिरता और भय के स्थान पर अब सीखने की ललक, आत्मनिर्भर बनने की कोशिश और समाज की मुख्यधारा से जुड़ने की स्पष्ट इच्छा दिखाई दी।

यह बदलाव अचानक नहीं आया है, बल्कि पुनर्वास नीति के तहत चल रही योजनाओं, कौशल प्रशिक्षण और सरकारी दस्तावेजों के व्यवस्थित निर्माण की प्रक्रिया ने इसे संभव बनाया है। केंद्र में रह रहे पुनर्वासितों के लिए अब सबसे बड़ी जरूरत पहचान और आजीविका है—और इन्हीं दो बिंदुओं पर काम होता साफ नजर आया।

पहचान से जुड़ाव तक: दस्तावेजों पर जोर

पुनर्वास केंद्र में सबसे पहले जिस पहल ने ध्यान खींचा, वह थी दस्तावेजों का निर्माण। कई पुनर्वासित ऐसे हैं, जिनके पास पहले कोई वैध पहचान पत्र नहीं था। अब उनके लिए वोटर आईडी, आधार और अन्य जरूरी कागजात तैयार किए जा रहे हैं।

मौके पर मिली जानकारी के अनुसार हाल ही में 8 पुनर्वासितों को वोटर आईडी कार्ड वितरित किए गए हैं। इसके अलावा 25 लोगों का ऑनलाइन पंजीयन किया गया, जबकि 40 लोगों के फॉर्म-6 भरवाए गए हैं। यह प्रक्रिया सिर्फ कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि उन्हें नागरिक अधिकारों से जोड़ने की दिशा में एक अहम कदम है।

केंद्र में मौजूद एक पुनर्वासित युवक ने बताया, “पहले हमारा कोई नाम-निशान नहीं था, अब पहचान मिल रही है। वोट डालने का अधिकार मिलेगा, यह हमारे लिए नई बात है।” यह कथन इस पूरी प्रक्रिया के सामाजिक महत्व को रेखांकित करता है।

कौशल की ओर बढ़ते कदम

पुनर्वास केंद्र में दूसरा बड़ा फोकस कौशल विकास पर है। यहां रहने वाले लोगों को उनकी रुचि और स्थानीय जरूरतों के आधार पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। हाल ही में शुरू किया गया ट्रैक्टर संचालन और मरम्मत प्रशिक्षण इसका प्रमुख उदाहरण है।

हमने प्रशिक्षण स्थल पर देखा कि लगभग 40 पुनर्वासित नियमित रूप से ट्रैक्टर चलाना सीख रहे हैं। प्रशिक्षक उन्हें इंजन की संरचना, क्लच-गियर के संचालन, रखरखाव और छोटी-मोटी तकनीकी समस्याओं को ठीक करने के तरीके समझा रहे थे।

दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई ऐसे हैं, जिन्होंने पहले कभी साइकिल तक नहीं चलाई थी। इसके बावजूद वे तेजी से सीखने की कोशिश कर रहे हैं। एक अन्य प्रशिक्षु ने कहा, “पहले जो काम करते थे उसमें सिर्फ डर था, अब जो सीख रहे हैं उसमें भविष्य दिखता है।”

जंगल की जिंदगी से खेत तक का सफर

पुनर्वास की इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए जब गहराई से बातचीत की गई, तो यह साफ हुआ कि बदलाव सिर्फ पेशे का नहीं, बल्कि सोच का भी है। पहले जहां जीवन का अधिकांश हिस्सा संघर्ष और अस्थिरता में बीतता था, वहीं अब स्थायी आजीविका की ओर झुकाव दिख रहा है।

ट्रैक्टर प्रशिक्षण को लेकर पुनर्वासितों में खास उत्साह देखा गया। स्थानीय संदर्भ में यह कौशल बेहद उपयोगी माना जा रहा है, क्योंकि इससे खेती, परिवहन और छोटे ठेके जैसे कई रोजगार विकल्प खुलते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, बस्तर क्षेत्र में कृषि आधारित कार्यों की संभावनाएं अधिक हैं, ऐसे में ट्रैक्टर संचालन सीखना सीधे रोजगार से जुड़ने का माध्यम बन सकता है। यही कारण है कि प्रशिक्षण में तकनीकी पहलुओं के साथ-साथ व्यवहारिक अभ्यास पर भी जोर दिया जा रहा है।

पुनर्वास नीति का जमीनी असर

राज्य सरकार की पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पित लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। इसमें सुरक्षा, आवास, आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और दस्तावेजी पहचान शामिल हैं।

नारायणपुर में इन प्रावधानों का असर जमीनी स्तर पर दिख रहा है। हालांकि, चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं—जैसे लंबे समय तक अलग-थलग रहे लोगों को सामाजिक रूप से पूरी तरह स्वीकार किया जाना, या उन्हें स्थायी रोजगार से जोड़ना। लेकिन शुरुआती स्तर पर जो बदलाव नजर आ रहा है, वह सकारात्मक दिशा का संकेत देता है।

बदलते चेहरे, बदलती सोच

पुनर्वास केंद्र के परिसर में बातचीत के दौरान सबसे बड़ा परिवर्तन जो दिखा, वह था आत्मविश्वास। पहले जहां संकोच और डर हावी था, वहीं अब खुलकर बातचीत करने की प्रवृत्ति नजर आई।

कई पुनर्वासितों ने यह स्वीकार किया कि मुख्यधारा में लौटना आसान नहीं था, लेकिन अब वे अपने फैसले से संतुष्ट हैं। एक व्यक्ति ने कहा, “पहले रास्ता गलत था, अब सही दिशा मिल रही है। सीख रहे हैं, आगे बढ़ना है।”

नई शुरुआत का आधार

पुनर्वास केंद्र की गतिविधियों को करीब से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यहां सिर्फ आश्रय नहीं, बल्कि जीवन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश हो रही है। दस्तावेजों के जरिए पहचान, प्रशिक्षण के जरिए रोजगार और सामाजिक जुड़ाव के जरिए सम्मान—इन तीन स्तंभों पर पूरा ढांचा टिका हुआ है।

बंदूक से ट्रैक्टर तक का यह सफर सिर्फ प्रतीकात्मक बदलाव नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन परिवर्तन की कहानी है। जहां कभी हथियारों के सहारे जीवन चलाया जाता था, वहीं अब मशीनों के जरिए आजीविका कमाने की तैयारी हो रही है।

आगे की राह

हालांकि यह पहल अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन यदि प्रशिक्षण के बाद रोजगार के अवसरों से जोड़ने की प्रक्रिया मजबूत की जाती है, तो यह मॉडल और प्रभावी हो सकता है। स्थानीय स्तर पर कृषि कार्यों, निर्माण कार्यों और परिवहन सेवाओं में इन प्रशिक्षित लोगों को अवसर देने की जरूरत होगी।

नारायणपुर का यह उदाहरण बताता है कि सही नीति, जमीनी क्रियान्वयन और निरंतर निगरानी से बदलाव संभव है। पुनर्वास की यह प्रक्रिया न केवल व्यक्तियों के जीवन को बदल रही है, बल्कि समाज में स्थिरता और विश्वास का माहौल भी बना रही है।

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