अबूझमाड़ में बदली तस्वीर: जहां कभी बंदूकें गूंजती थीं, वहां अब सजे सपनों के बाजार
जाटलूर में शुरू हुआ साप्ताहिक हाट, ग्रामीणों को मिली बड़ी राहत

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नक्सल दहशत के चार दशक खत्म, विकास की मुख्यधारा से जुड़ रहे गांव
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प्रशासन की पहल से गांव-गांव पहुंच रही योजनाएं, बढ़ रही आर्थिक गतिविधियां
(कैलाश सोनी) नारायणपुर/ओरछा : घने जंगलों, ऊबड़-खाबड़ रास्तों और वर्षों तक नक्सल दहशत के साये में जीने को मजबूर रहे अबूझमाड़ की तस्वीर अब तेजी से बदल रही है। कभी जहां सन्नाटा और डर इस इलाके की पहचान थे, वहीं आज उसी धरती पर उम्मीद, आत्मनिर्भरता और विकास के रंग साफ नजर आने लगे हैं। ओरछा विकासखंड के दूरस्थ ग्राम जाटलूर में शुरू हुआ नया साप्ताहिक हाट बाजार इस बदलाव की सबसे सजीव मिसाल बनकर उभरा है।
शनिवार का दिन… जाटलूर गांव में अब यह दिन किसी त्योहार से कम नहीं लगता। चारों ओर रंग-बिरंगी दुकानों की कतारें, ग्रामीणों की भीड़, बच्चों की चहल-पहल और खरीदारी में जुटे लोग—यह नजारा कुछ साल पहले तक यहां अकल्पनीय था।

मैदान में लगे अस्थायी तंबुओं के नीचे सब्जियों की दुकानें सजी हैं, कहीं दैनिक उपयोग की वस्तुएं बिक रही हैं तो कहीं छोटे-छोटे खिलौनों और श्रृंगार सामग्री की दुकानें ग्रामीणों को आकर्षित कर रही हैं। एक कोने में इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचता युवक ग्राहकों को समझा रहा है, तो दूसरी ओर महिलाएं घरेलू सामान खरीदने में व्यस्त हैं। यह वही अबूझमाड़ है, जहां कभी बाजार लगाने के लिए भी नक्सलियों से अनुमति लेनी पड़ती थी।

डर से विकास तक का सफर
अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सलवाद की गिरफ्त में रहा। यहां के गांवों में प्रशासन की पहुंच बेहद सीमित थी। ग्रामीणों के लिए जीवन की सामान्य जरूरतें पूरी करना भी चुनौती से कम नहीं था। साप्ताहिक बाजार जैसी सामान्य व्यवस्था भी यहां सीमित दायरे में ही सिमटी रहती थी।
ग्रामीण बताते हैं कि पहले व्यापारी भी डर के साये में यहां आते थे। बाजार लगाने से पहले उन्हें नक्सलियों से अनुमति लेनी पड़ती थी। कई बार अनुमति नहीं मिलने पर बाजार ही नहीं लग पाता था। ऐसे में लोगों को कई किलोमीटर दूर मुख्यालय तक कठिन और जोखिम भरे रास्तों से होकर जाना पड़ता था।
लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। नक्सलवाद के प्रभाव में कमी आई है और प्रशासन ने अपनी पकड़ मजबूत की है। सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ विकास कार्यों ने भी रफ्तार पकड़ी है।

ग्रामीणों की मांग पर मिला बाजार
कुछ समय पहले कलेक्टर नम्रता जैन के दौरे के दौरान जाटलूर और आसपास के ग्रामीणों ने स्थानीय स्तर पर बाजार शुरू करने की मांग रखी थी। ग्रामीणों की इस जरूरत को समझते हुए कलेक्टर ने तत्काल पहल की और साप्ताहिक हाट शुरू कराने का आश्वासन दिया।
आज वही आश्वासन हकीकत में बदल चुका है। हर शनिवार को जाटलूर में नियमित रूप से हाट बाजार सजता है, जहां आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचते हैं।
करीब आठ गांवों के 75 परिवारों के लिए यह बाजार किसी वरदान से कम नहीं है। लगभग 320 ग्रामीण अब अपनी जरूरत का सामान गांव के पास ही खरीद पा रहे हैं। इससे न केवल समय और पैसे की बचत हो रही है, बल्कि जोखिम भरे सफर से भी मुक्ति मिली है।

बाजार बना आत्मनिर्भरता का केंद्र
जाटलूर का यह हाट बाजार अब सिर्फ खरीद-बिक्री का स्थान नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्रामीणों के लिए आत्मनिर्भरता का केंद्र बनता जा रहा है। स्थानीय लोग भी छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू कर रहे हैं।
कुछ ग्रामीण अब खुद सब्जियां और अन्य उत्पाद बेचकर आय अर्जित कर रहे हैं। महिलाओं की भागीदारी भी बाजार में बढ़ी है, जो इस बदलाव का सकारात्मक संकेत है।
एक महिला ने बताया, “पहले हमें छोटे-छोटे सामान के लिए भी बहुत दूर जाना पड़ता था। अब यहां सब कुछ मिल जाता है। बच्चों के लिए भी चीजें खरीदना आसान हो गया है।”
सुरक्षा से बढ़ा भरोसा
इस पूरे बदलाव के पीछे सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी भूमिका रही है। सरकार द्वारा स्थापित नए पुलिस कैंपों ने न केवल क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित की, बल्कि ग्रामीणों के मन से डर भी दूर किया है।
जहां पहले लोग घरों से निकलने में भी हिचकते थे, वहीं अब वे खुले तौर पर बाजार में आकर व्यापार कर रहे हैं और सामाजिक गतिविधियों में भाग ले रहे हैं।
एक स्थानीय युवक ने कहा, “पहले यहां डर का माहौल था। अब हम खुलकर अपना काम कर पा रहे हैं। बाजार लगने से हमें रोजगार का भी अवसर मिला है।”
सरकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ी
अबूझमाड़ के इन दूरस्थ गांवों तक अब धीरे-धीरे सरकारी योजनाएं भी पहुंचने लगी हैं। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका से जुड़ी सुविधाओं में सुधार हो रहा है।
सड़क निर्माण से आवागमन आसान हुआ है, जिससे बाजार तक पहुंचने में भी सहूलियत मिली है। स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार से ग्रामीणों को बेहतर इलाज मिल रहा है, वहीं शिक्षा के क्षेत्र में भी नए प्रयास किए जा रहे हैं।
जाटलूर का यह बाजार इन सभी बदलावों का एक प्रतीक बन गया है। यह दिखाता है कि जब सुरक्षा और विकास एक साथ आगे बढ़ते हैं, तो सबसे दूर और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र भी मुख्यधारा से जुड़ सकते हैं।
तस्वीरों में दिखता बदलाव
बाजार में खींची गई तस्वीरें इस परिवर्तन की कहानी खुद बयां करती हैं। कहीं दुकानों पर सजे सामान, कहीं खरीदारी करते ग्रामीण, तो कहीं आपसी मेलजोल का दृश्य—हर तस्वीर एक नई उम्मीद का संकेत देती है।
एक तस्वीर में दुकानदार अपने सामान को सजा कर ग्राहकों का इंतजार कर रहा है, वहीं दूसरी तस्वीर में ग्रामीणों की भीड़ बाजार में रौनक बढ़ा रही है। महिलाओं और बच्चों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि अब यह बाजार सुरक्षित और भरोसेमंद बन चुका है।
भविष्य की नई उम्मीदें
जाटलूर का यह साप्ताहिक हाट बाजार अबूझमाड़ के लिए सिर्फ एक शुरुआत है। आने वाले समय में ऐसे और भी प्रयास इस क्षेत्र की तस्वीर को पूरी तरह बदल सकते हैं।
ग्रामीण अब अपने भविष्य को लेकर आशान्वित हैं। वे चाहते हैं कि यहां और सुविधाएं विकसित हों, जिससे उनका जीवन और आसान हो सके।
आज जाटलूर में सजा यह छोटा-सा बाजार उस बड़े बदलाव का संकेत है, जो अबूझमाड़ की पहचान को नई दिशा दे रहा है।
जहां कभी डर और अनिश्चितता का माहौल था, वहां अब विकास की नई कहानी लिखी जा रही है—और इस कहानी के केंद्र में हैं यहां के आम ग्रामीण, जिनके सपनों को अब पंख मिलने लगे हैं।




