तेंदूपत्ता तोड़ाई के बीच ‘टीबी मुक्त भारत’ की दस्तक: जंगल-पहाड़ तक पहुंची AI स्क्रीनिंग टीम
नारायणपुर जिले के दुर्गम इलाकों में 176 ग्रामीणों की जांच, व्यस्त सीजन में भी ग्रामीणों ने दिखाई जागरूकता • AI आधारित HHX-Ray तकनीक से तेज और सटीक स्क्रीनिंग • “टीबी हारेगा, देश जीतेगा” अभियान को मिला जनसहयोग

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। बस्तर के नारायणपुर जिले के दुर्गम और वनांचल क्षेत्रों में, जहां आजीविका के सीमित साधनों के बीच तेंदूपत्ता तोड़ाई का मौसम ग्रामीणों के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है, वहीं इसी व्यस्तता के बीच एक और महत्वपूर्ण अभियान चुपचाप अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है—राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP)। तेंदूपत्ता फड़ों पर काम में जुटे ग्रामीणों के बीच स्वास्थ्य विभाग की टीम पहुंची और आधुनिक AI तकनीक के सहारे टीबी स्क्रीनिंग कर यह संदेश दिया कि आजीविका के साथ स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी है।
नारायणपुर जिले में चल रहे “टीबी मुक्त भारत” के 100 दिवसीय अभियान के तहत स्वास्थ्य विभाग ने दुर्गम ग्रामों तक पहुंचकर न सिर्फ जांच की, बल्कि जागरूकता का भी ऐसा वातावरण तैयार किया, जो इस अभियान की सफलता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

तेंदूपत्ता फड़ों पर स्वास्थ्य का संगम
नारायणपुर जिले के ग्राम AAM–Hlamimunjmeta के तेंदूपत्ता फड़ पर उस समय अलग ही दृश्य देखने को मिला, जब एक ओर ग्रामीण पत्तों की गड्डियां बनाने में व्यस्त थे, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य टीम AI आधारित HHX-Ray मशीन के साथ जांच कर रही थी। यह वही समय होता है जब ग्रामीणों के लिए हर दिन की मेहनत सीधे उनकी सालभर की आमदनी से जुड़ी होती है।
इसके बावजूद ग्रामीणों ने अपने काम के बीच समय निकालकर जांच कराई। कुल 71 लोगों की स्क्रीनिंग यहां सफलतापूर्वक की गई। यह न केवल जागरूकता का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि स्वास्थ्य सेवाएं जब लोगों तक पहुंचती हैं, तो वे उसे अपनाने में पीछे नहीं रहते।

AI तकनीक बनी गेम चेंजर
इस अभियान की सबसे बड़ी खासियत रही AI आधारित HHX-Ray तकनीक, जिसने कम समय में अधिक लोगों की सटीक जांच संभव बनाई। दुर्गम इलाकों में जहां पारंपरिक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचना कठिन होता है, वहां इस तकनीक ने काम को आसान बना दिया है।
पूसा गांव और ब्रहबेड़ा में भी इसी तकनीक के माध्यम से 105 लोगों का एक्स-रे किया गया, जिनमें 45 महिलाएं और 26 पुरुष शामिल रहे। यह आंकड़ा दर्शाता है कि महिलाएं भी इस अभियान में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं।

DTO ने दी चेतावनी और प्रेरणा
कार्यक्रम के दौरान जिला क्षय अधिकारी (DTO) ने ग्रामीणों से सीधे संवाद किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि टीबी एक गंभीर लेकिन पूरी तरह इलाज योग्य बीमारी है, बशर्ते समय पर इसकी पहचान हो।
उन्होंने ग्रामीणों से अपील की कि खांसी, बुखार, वजन कम होना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करें और तुरंत जांच कराएं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हर पंचायत को टीबी मुक्त बनाना सामूहिक जिम्मेदारी है।
DTO ने ग्रामीणों को यह भरोसा भी दिलाया कि टीबी का इलाज पूरी तरह निःशुल्क है और सरकार हर संभव सहायता प्रदान कर रही है।
देर शाम तक चलता रहा अभियान
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद देर शाम तक लगातार काम किया। जंगलों के बीच, सीमित संसाधनों में, टीम ने जिस समर्पण के साथ स्क्रीनिंग पूरी की, वह विभाग की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
मरकाबेड़ा ग्राम के तेंदूपत्ता फड़ का भी दौरा किया गया, जहां ग्रामीणों को जांच के लिए प्रेरित किया गया। टीम ने हर व्यक्ति तक पहुंचने का प्रयास किया, ताकि कोई भी संभावित मरीज छूट न जाए।
स्थानीय सहयोग बना सफलता की कुंजी
इस अभियान की सफलता में स्थानीय स्तर पर कार्यरत CHO, मितानिन और MT का विशेष योगदान रहा। इनकी मदद से न केवल लोगों को एकत्रित किया गया, बल्कि उन्हें जांच के लिए प्रेरित भी किया गया।
ग्रामीणों के साथ इनका भरोसेमंद रिश्ता ही इस कार्यक्रम की असली ताकत बना। यही कारण है कि व्यस्त समय के बावजूद लोग सहजता से जांच के लिए आगे आए।
तेंदूपत्ता: आजीविका और जिम्मेदारी का संतुलन
बस्तर के इन इलाकों में तेंदूपत्ता तोड़ाई केवल एक काम नहीं, बल्कि सालभर की आर्थिक मजबूती का आधार है। सीमित समय में अधिक से अधिक संग्रह करना ग्रामीणों की प्राथमिकता होती है।
ऐसे समय में स्वास्थ्य जांच के लिए समय निकालना आसान नहीं होता, लेकिन इस अभियान ने यह साबित किया कि जब सेवाएं लोगों के पास पहुंचती हैं, तो वे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं।
यह दृश्य—जहां एक ओर पत्तों की गड्डियां बन रही हैं और दूसरी ओर स्वास्थ्य जांच चल रही है—ग्रामीण जीवन के संघर्ष और जागरूकता दोनों को एक साथ दर्शाता है।
टीबी उन्मूलन की ओर बढ़ता नारायणपुर
“टीबी हारेगा, देश जीतेगा” के संकल्प के साथ नारायणपुर जिला लगातार आगे बढ़ रहा है। दुर्गम इलाकों में पहुंचकर किए जा रहे ऐसे प्रयास न केवल आंकड़ों में सुधार लाएंगे, बल्कि लोगों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव करेंगे।
इस अभियान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर काम करें, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है।
स्वास्थ्य सेवाओं की नई तस्वीर
इन तस्वीरों में दिखता दृश्य केवल एक अभियान नहीं, बल्कि बदलती व्यवस्था का प्रतीक है। जहां पहले स्वास्थ्य सेवाएं गांवों तक पहुंचने में संघर्ष करती थीं, वहीं अब तकनीक और टीमवर्क के जरिए वे जंगलों के बीच भी उपलब्ध हैं।
AI आधारित स्क्रीनिंग, ग्रामीणों की भागीदारी और स्वास्थ्य कर्मियों की मेहनत—ये तीनों मिलकर एक नई कहानी लिख रहे हैं, जहां बीमारी से लड़ाई केवल अस्पतालों में नहीं, बल्कि गांव-गांव में लड़ी जा रही है।
जागरूकता ही असली जीत
नारायणपुर जिले में तेंदूपत्ता तोड़ाई के बीच चला यह अभियान एक मजबूत संदेश देता है—आर्थिक गतिविधियों के बीच भी स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना जरूरी है।
जब ग्रामीण अपने काम के साथ-साथ स्वास्थ्य जांच को भी महत्व देते हैं और प्रशासन उनके दरवाजे तक सेवाएं पहुंचाता है, तब ही “टीबी मुक्त भारत” का सपना साकार हो सकता है।
नारायणपुर की यह पहल न केवल एक जिले की सफलता है, बल्कि देश के लिए एक मॉडल भी है कि कैसे कठिन परिस्थितियों में भी जनस्वास्थ्य के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।



