अबूझमाड़ के जंगलों में उम्मीद का पुल
कुड़मेल में आईटीबीपी और ग्रामीणों ने मिलकर बनाया 60 मीटर लंबा अस्थायी पुल, बरसात में नहीं टूटेगा गांवों का संपर्क

15 जवानों ने 15 दिनों में बल्ली और बांस से तैयार किया जीवनदायिनी रास्ता, अब बाइक से भी हो सकेगा आवागमन
(कैलाश सोनी) नारायणपुर। अबूझमाड़ के दुर्गम जंगलों में जहां बरसात का मौसम आते ही कई गांव महीनों तक दुनिया से कट जाते हैं, वहां आईटीबीपी और ग्रामीणों ने मिलकर उम्मीद का ऐसा पुल तैयार किया है जिसने स्थानीय लोगों के जीवन में नई राहत ला दी है। ओरछा थाना क्षेत्र के कुड़मेल गांव के पास नाले पर बल्ली और बांस से लगभग 60 मीटर लंबा अस्थायी पुल तैयार किया गया है। यह पुल न केवल ग्रामीणों के लिए राहत का जरिया बनेगा, बल्कि सुरक्षा बलों की आवाजाही और आपूर्ति व्यवस्था को भी मजबूती देगा।

दूरस्थ और संवेदनशील अबूझमाड़ क्षेत्र में तैयार किया गया यह पुल इन दिनों इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। बरसात के दिनों में तेज बहाव के कारण जिस नाले को पार करना ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता था, अब उसी स्थान पर लोगों को सुरक्षित रास्ता मिल गया है। स्थानीय लोग इसे केवल पुल नहीं, बल्कि जीवन की नई डोर मान रहे हैं।
बरसात में कट जाता था संपर्क
कुड़मेल गांव ओरछा थाना से लगभग 20 किलोमीटर दूर घने जंगलों और पहाड़ी रास्तों के बीच स्थित है। हर साल मानसून के दौरान यहां बहने वाले नाले का जलस्तर अचानक बढ़ जाता था। तेज बहाव के कारण गांवों का संपर्क पूरी तरह टूट जाता था।
स्थिति इतनी गंभीर हो जाती थी कि ग्रामीण कई-कई दिनों तक गांवों में ही फंसे रहते थे। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती थी, मरीजों को अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो जाता था और राशन जैसी बुनियादी जरूरतें भी संकट में पड़ जाती थीं। कई बार गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को खाट या कंधों के सहारे नदी-नालों को पार कराना पड़ता था।
केवल ग्रामीण ही नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों को भी इस समस्या का सामना करना पड़ता था। अबूझमाड़ जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षा बलों की नियमित आवाजाही और अभियान बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं, लेकिन बारिश के मौसम में नाले के उफान पर आने से परिचालन गतिविधियां भी प्रभावित होती थीं।
पक्का पुल तत्काल संभव नहीं, तो निकाला नया रास्ता
स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती यह थी कि आगामी बरसात को देखते हुए तत्काल स्थायी पुल का निर्माण संभव नहीं दिख रहा था। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां, सीमित संसाधन और कठिन पहुंच मार्ग इस काम को जटिल बना रहे थे।
ऐसी स्थिति में 38वीं वाहिनी आईटीबीपी ने त्वरित समाधान के रूप में अस्थायी पुल निर्माण का निर्णय लिया। उद्देश्य स्पष्ट था—बरसात आने से पहले ऐसा सुरक्षित मार्ग तैयार करना जिससे ग्रामीणों और जवानों की आवाजाही बाधित न हो।
इसके बाद आईटीबीपी के जवानों ने स्थानीय ग्रामीणों के साथ मिलकर कार्य शुरू किया। जंगलों में उपलब्ध लकड़ी, बल्ली और बांस को संसाधन के रूप में इस्तेमाल किया गया। कठिन परिस्थितियों और सीमित साधनों के बावजूद जवानों और ग्रामीणों ने मिलकर दिन-रात मेहनत की।
15 जवानों ने 15 दिनों में पूरा किया मिशन
38वीं वाहिनी के कमांडेंट रोशन सिंह असवाल के मार्गदर्शन और असिस्टेंट कमांडेंट राम कुमार मौर्य के नेतृत्व में 15 जवानों की टीम ने इस चुनौतीपूर्ण कार्य को अंजाम दिया। लगातार 15 दिनों तक कठिन परिस्थितियों में काम करते हुए जवानों ने पुल तैयार कर दिया।
घने जंगल, असमतल जमीन, गर्म मौसम और सीमित तकनीकी संसाधनों के बावजूद टीम ने जिस तेजी और समर्पण से काम किया, वह स्थानीय लोगों के लिए भी प्रेरणा बन गया। पुल निर्माण के दौरान ग्रामीणों ने लकड़ी और बांस उपलब्ध कराने से लेकर श्रम सहयोग तक हर स्तर पर मदद की।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों बाद उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से समझा गया है। ग्रामीणों ने बताया कि यह पुल उनके लिए केवल आवाजाही का साधन नहीं, बल्कि जीवन को आसान बनाने वाला महत्वपूर्ण माध्यम साबित होगा।
बाइक का भार भी उठा सकेगा पुल
बल्ली और बांस से तैयार यह पुल देखने में भले ही पारंपरिक शैली का प्रतीत होता हो, लेकिन इसे मजबूती के साथ तैयार किया गया है। आईटीबीपी के अनुसार यह पुल न केवल पैदल आवागमन के लिए सुरक्षित है, बल्कि चलती हुई मोटरसाइकिल का भार भी आसानी से वहन कर सकता है।
अब तक ग्रामीणों को बारिश के दौरान कई किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती थी। कई बार लोग जोखिम उठाकर उफनते नाले को पार करते थे, जिससे हादसों की आशंका बनी रहती थी। अब पुल बनने के बाद गांवों के बीच संपर्क सुगम हो जाएगा।
विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से यह पुल काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आपातकालीन स्थिति में मरीजों को तेजी से बाहर ले जाने में यह मददगार होगा। साथ ही बच्चों और महिलाओं की आवाजाही भी पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित हो सकेगी।
सुरक्षा और जनसेवा का अनूठा उदाहरण
अबूझमाड़ क्षेत्र लंबे समय से सुरक्षा चुनौतियों और विकास की कमी के कारण चर्चा में रहा है। ऐसे क्षेत्रों में सुरक्षा बल केवल कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं रहते, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में भी भूमिका निभाते हैं।
कुड़मेल में तैयार किया गया यह पुल उसी सोच का उदाहरण बनकर सामने आया है। आईटीबीपी ने यहां केवल सुरक्षा जिम्मेदारी नहीं निभाई, बल्कि स्थानीय जरूरत को समझते हुए जनसेवा का भी परिचय दिया।
ग्रामीणों ने बताया कि जवानों ने बेहद आत्मीयता के साथ गांव वालों के साथ काम किया। कई ग्रामीण स्वयं लकड़ी काटने, सामग्री ढोने और पुल निर्माण में जुटे रहे। इससे सुरक्षा बलों और स्थानीय समुदाय के बीच विश्वास भी मजबूत हुआ है।
बरसात से पहले बड़ी राहत
मानसून के दस्तक देने से पहले पुल तैयार हो जाना ग्रामीणों के लिए किसी राहत से कम नहीं माना जा रहा। हर साल बारिश के दौरान संपर्क टूटने से गांवों में भय और चिंता का माहौल बन जाता था। इस बार लोगों को उम्मीद है कि हालात पहले जैसे नहीं होंगे।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि भविष्य में यहां स्थायी पुल का निर्माण हो जाए तो क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है। फिलहाल अस्थायी पुल ने ही लोगों को बड़ी राहत दे दी है।
विकास की राह में छोटी लेकिन बड़ी पहल
अबूझमाड़ जैसे दूरस्थ इलाकों में छोटी-छोटी सुविधाएं भी लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव लेकर आती हैं। कुड़मेल में बना यह पुल भी ऐसी ही पहल है, जिसने यह साबित कर दिया कि इच्छाशक्ति और सामूहिक सहयोग से कठिन परिस्थितियों में भी समाधान निकाला जा सकता है।
आईटीबीपी और ग्रामीणों के संयुक्त प्रयास से तैयार यह पुल अब केवल लकड़ी और बांस का ढांचा नहीं, बल्कि संघर्ष, सहयोग और संवेदनशीलता का प्रतीक बन गया है। जंगलों के बीच बना यह रास्ता आने वाले दिनों में हजारों कदमों की उम्मीद को आगे बढ़ाएगा।




