शांति लौटी, पर अबूझमाड़ के जंगल पर संकट: कटाई–आगजनी बढ़ी, बायोस्फीयर रिजर्व की आवश्यकता
नारायणपुर/अबूझमाड़ से ग्राउंड रिपोर्ट- कैलाश सोनी
कभी नक्सल प्रभाव के कारण अलग-थलग रहा अबूझमाड़ अब सामान्य जीवन की ओर लौट रहा है, लेकिन इसके साथ ही जंगलों पर संकट गहराता जा रहा है। सुरक्षा और प्रशासनिक पहुंच बढ़ने के बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण अपने मूल गांवों में लौट रहे हैं। इससे खेती और बसाहट के लिए जंगलों को साफ करने की घटनाएं बढ़ गई हैं। कई स्थानों पर झाड़ियों को जलाकर जमीन तैयार की जा रही है और पेड़ों की कटाई तेज हुई है।



करीब 4000 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। यहां गौर, नीलगाय, बारासिंघा, हिरण और राष्ट्रीय पक्षी मोर जैसे वन्यजीव बड़ी संख्या में देखे जा रहे हैं। बावजूद इसके, बढ़ते मानव हस्तक्षेप से इनके प्राकृतिक आवास पर खतरा मंडरा रहा है।


बायोस्फीयर रिजर्व क्या है और क्यों जरूरी
देश में वर्तमान में 18 बायोस्फीयर रिजर्व अधिसूचित हैं, जिनमें से 12 यूनेस्को की सूची में शामिल हैं। बायोस्फीयर रिजर्व ऐसे क्षेत्र होते हैं जहां जैव विविधता संरक्षण, स्थानीय आजीविका और विकास के बीच संतुलन बनाया जाता है। इन्हें कोर, बफर और ट्रांजिशन ज़ोन में विभाजित किया जाता है, जिससे संरक्षण और मानव गतिविधियों को संतुलित तरीके से संचालित किया जा सके।
उल्लेखनीय है कि साल 2007 में अबूझमाड़ को बायोस्फीयर रिजर्व बनाने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन यह अब तक लागू नहीं हो पाया है। वर्तमान में यह क्षेत्र प्रस्तावित श्रेणी में ही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा हालात को देखते हुए अब इसे लागू करना बेहद जरूरी हो गया है।

मानव दखल बढ़ा, जंगलों में आग
लौटते ग्रामीणों के बीच यह धारणा बन रही है कि साफ की गई जमीन पर भविष्य में अधिकार मिल सकता है। इसी कारण जंगलों को काटकर और आग लगाकर खेती योग्य भूमि तैयार की जा रही है। इससे न केवल पेड़ों का नुकसान हो रहा है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी बिगड़ रहा है।


खनन और विकास का दबाव
अबूझमाड़ खनिज संपदा से भी समृद्ध है।
- रावघाट क्षेत्र में आयरन ओर खनन
- छोटेडोंगर क्षेत्र में खनन गतिविधियां
इन परियोजनाओं से विकास और रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं, लेकिन साथ ही जंगलों और वन्यजीवों पर दबाव भी बढ़ रहा है।

वन विभाग की सीमित पकड़, अलग वन मंडल की आवश्यकता
अबूझमाड़ का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक अनसर्वे क्षेत्र रहा है, जिससे वन विभाग की पकड़ सीमित बनी हुई है। यही कारण है कि अवैध कटाई और आगजनी पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है।
ऐसे में अब स्थानीय स्तर पर अलग वन मंडल बनाने की मांग तेज हो गई है, ताकि निगरानी और संरक्षण को मजबूत किया जा सके।
अबूझमाड़ आज एक अहम मोड़ पर है—जहां एक ओर विकास और पुनर्वास की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर जंगल और वन्यजीवों का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।
बायोस्फीयर रिजर्व की घोषणा, अलग वन मंडल का गठन और संतुलित नीति ही इस अनमोल प्राकृतिक धरोहर को बचा सकती है।
