‘धान के कटोरे’ में दरार: बारिश ने छोड़ा साथ, कर्ज और सूखे के बीच दम तोड़ती धान की उम्मीद
नारायणपुर के छोटेडोंगर में जून में सामान्य से 60% कम बारिश, आधी से भी कम हो सकी बुवाई | दो-दो लाख का कर्ज लेकर खेतों में उतरे किसान, खेतों में पड़ने लगी दरारें, अगले 10 दिन में बारिश नहीं हुई तो 30 से 40 फीसदी उत्पादन घटने की आशंका

नारायणपुर/छोटेडोंगर। छत्तीसगढ़ को पूरे देश में “धान का कटोरा” कहा जाता है, लेकिन इस बार यही कटोरा सूखने की कगार पर है। मानसून की बेरुखी ने नारायणपुर जिले के छोटेडोंगर अंचल में किसानों के चेहरे से मुस्कान छीन ली है। जून माह में सामान्य से करीब 60 प्रतिशत कम बारिश होने के कारण खेतों में नमी नहीं बची है। धान की रोपाई का सबसे महत्वपूर्ण समय बीतता जा रहा है, जबकि हजारों किसान कर्ज लेकर खेत तैयार कर चुके हैं। अब उनकी निगाहें केवल आसमान पर टिकी हैं।

बारिश नहीं होने से खेतों में दरारें पड़ने लगी हैं। कई स्थानों पर बोए गए बीज अंकुरित नहीं हो पाए हैं, जबकि जहां पौधे निकले भी हैं, वे सूखने लगे हैं। किसान अब फसल से ज्यादा बैंक के कर्ज और परिवार के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
छोटेडोंगर में सबसे अधिक संकट
नारायणपुर जिले का छोटेडोंगर क्षेत्र पूरी तरह वर्षा आधारित खेती पर निर्भर है। यहां 80 प्रतिशत से अधिक किसान धान की खेती करते हैं। क्षेत्र में न तो बड़ी सिंचाई परियोजना है और न ही नहरों का पर्याप्त नेटवर्क। अधिकांश किसानों के लिए बारिश ही खेती का एकमात्र सहारा है। ऐसे में मानसून की देरी ने पूरे क्षेत्र की कृषि व्यवस्था को संकट में डाल दिया है।
“दो लाख का कर्ज लिया, अब खेत में पानी नहीं”
छोटेडोंगर के किसान उमाशंकर मांझी बताते हैं कि इस वर्ष उन्होंने खेती के लिए बैंक और अन्य स्रोतों से लगभग दो लाख रुपये का कर्ज लिया है। खेत तैयार कर बीज और खाद डाल दी, लेकिन बारिश नहीं होने से पूरी मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा है।

वे कहते हैं, “सरकार छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहती है, लेकिन हमारे कटोरे में तो पानी ही नहीं है। अगर बारिश नहीं हुई तो फसल भी जाएगी और बैंक का कर्ज चुकाना भी मुश्किल हो जाएगा।”
इसी तरह किसान तातू राम समरथ ने धान की खेती के लिए 52 हजार रुपये का कृषि ऋण लिया है। उनके खेतों में अब नमी खत्म हो चुकी है और मिट्टी में दरारें दिखाई देने लगी हैं।

तातू राम कहते हैं, “धान की पौध तैयार है, लेकिन खेत में पानी नहीं है। रोज बादलों को देखते हैं, लेकिन बारिश नहीं होती। अब समझ नहीं आ रहा कि मेहनत कैसे बचेगी।”
लागत बढ़ी, उम्मीद घटती जा रही
किसानों के अनुसार धान की एक एकड़ खेती में औसतन 16 हजार रुपये तक का खर्च आता है। इसमें बीज, खाद, मजदूरी, जुताई और अन्य कृषि कार्य शामिल हैं। यदि इस बार उत्पादन आधा भी रह गया तो किसानों की लागत निकलना मुश्किल हो जाएगा। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी सीधा असर पड़ेगा।
50 हजार हेक्टेयर से अधिक खेती प्रभावित
जिला कृषि विभाग के अनुसार इस खरीफ सीजन में जिले में 1.20 लाख हेक्टेयर में बुवाई का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र धान का है। अब तक केवल 50 से 55 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुवाई हो सकी है। शेष क्षेत्र अभी भी बारिश का इंतजार कर रहा है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अगले 10 दिनों के भीतर अच्छी बारिश नहीं हुई तो जिले में धान उत्पादन 30 से 40 प्रतिशत तक घट सकता है। इसका असर न केवल किसानों की आय पर पड़ेगा, बल्कि पूरे जिले की कृषि अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।
कृषि वैज्ञानिकों की सलाह
विशेषज्ञ किसानों को उपलब्ध नमी का संरक्षण करने, खेतों की मेड़ों को मजबूत रखने तथा आवश्यक होने पर कम अवधि और सूखा सहन करने वाली धान की किस्मों का उपयोग करने की सलाह दे रहे हैं। हालांकि किसानों का कहना है कि बिना पर्याप्त बारिश के ये उपाय भी सीमित ही साबित होंगे।
सरकार से राहत की मांग
लगातार बिगड़ते हालात के बीच छोटेडोंगर के किसानों ने शासन से तत्काल राहत पैकेज की मांग की है। किसानों का कहना है कि यदि जल्द राहत नहीं मिली तो हजारों परिवार आर्थिक संकट में आ जाएंगे।
किसानों की प्रमुख मांगें
- छोटेडोंगर क्षेत्र को तत्काल सूखा प्रभावित क्षेत्र घोषित किया जाए।
- सूखा सहनशील धान बीजों पर विशेष अनुदान दिया जाए।
- कृषि ऋण की वसूली पर रोक लगाकर राहत पैकेज घोषित किया जाए।
- डीजल पंप और वैकल्पिक सिंचाई के लिए विशेष सहायता उपलब्ध कराई जाए।
चिंता की बात
नारायणपुर का छोटेडोंगर क्षेत्र हर वर्ष धान उत्पादन के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार आसमान की बेरुखी ने किसानों की उम्मीदों पर संकट के बादल खड़े कर दिए हैं। यदि जल्द अच्छी बारिश नहीं हुई तो “धान का कटोरा” कहलाने वाले इस इलाके में किसानों के सामने आजीविका का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। खेतों में पड़ती दरारें केवल मिट्टी में नहीं, बल्कि किसानों के सपनों में भी साफ दिखाई देने लगी हैं।




