नारायणपुर

अब जंगल की छांव में लहलहाएगी कॉफी, बदलेगी अबूझमाड़ की तस्वीर

नक्सलवाद के बाद विकास की सबसे बड़ी पहल, कुतुल सहित कई गांवों में कॉफी बोर्ड की टीम ने तलाशीं संभावनाएं

अबूझमाड़ की तकदीर बदलने की नई पटकथा

ग्रामीणों की आय बढ़ाने, जंगल बचाने और हजारों परिवारों को रोजगार से जोड़ने की तैयारी, भविष्य में चाय उत्पादन पर भी होगा अध्ययन

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। कभी नक्सल हिंसा और बंदूक की गूंज से पहचाने जाने वाला अबूझमाड़ अब विकास की नई इबारत लिखने की ओर बढ़ रहा है। सरकार ने जिस अबूझमाड़ को दशकों तक संघर्ष के प्रतीक के रूप में देखा, वहीं अब कॉफी की खुशबू बिखेरने की तैयारी शुरू हो गई है। नक्सलवाद की समाप्ति के बाद विकास को नई रफ्तार देने के उद्देश्य से जिला प्रशासन ने भारत सरकार के कॉफी बोर्ड के साथ मिलकर यहां कॉफी की व्यावसायिक खेती की संभावनाओं पर बड़ा कदम उठाया है। यदि योजना सफल रही तो आने वाले वर्षों में अबूझमाड़ देश के प्रमुख कॉफी उत्पादक क्षेत्रों में अपनी पहचान बना सकता है।

इसी कड़ी में कलेक्टर नम्रता जैन ने भारत सरकार के कॉफी बोर्ड के विशेषज्ञों के साथ कुतुल, कच्चापाल, कोडलियार, ईरकभट्टी, तोके सहित आसपास के वन क्षेत्रों का विस्तृत स्थल निरीक्षण किया। विशेषज्ञ दल ने क्षेत्र की जलवायु, वार्षिक वर्षा, तापमान, मिट्टी की गुणवत्ता, समुद्र तल से ऊंचाई तथा प्राकृतिक परिस्थितियों का गहन अध्ययन किया।

कॉफी बोर्ड के अधिकारियों ने निरीक्षण के बाद प्रारंभिक आकलन में माना कि अबूझमाड़ का प्राकृतिक वातावरण कॉफी उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल है। यहां कॉफी आधारित कृषि-वानिकी मॉडल विकसित कर जंगलों का संरक्षण करते हुए स्थानीय लोगों के लिए स्थायी आजीविका का मजबूत आधार तैयार किया जा सकता है।

चार साल बाद शुरू होगी आमदनी, पीढ़ियों तक मिलेगा लाभ

विशेषज्ञों ने बताया कि कॉफी पौधों की नियमित देखभाल के लगभग चार वर्षों बाद उत्पादन शुरू हो जाता है। इसके बाद लंबे समय तक यह किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए स्थायी आय का स्रोत बन सकता है। योजना में स्व-सहायता समूहों और स्थानीय ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी ताकि प्रत्येक परिवार का कम से कम एक सदस्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार एवं आय से जुड़ सके।

जंगल भी बचेंगे, रोजगार भी मिलेगा

कलेक्टर नम्रता जैन ने कहा कि जिले में कॉफी की खेती शुरू करने का उद्देश्य केवल नई फसल तैयार करना नहीं, बल्कि ग्रामीणों को स्थायी आय का माध्यम उपलब्ध कराना, जंगलों का संरक्षण करना और अबूझमाड़ की प्राकृतिक संपदा का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना है। कॉफी आधारित कृषि मॉडल से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, पलायन रुकेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

उन्होंने बताया कि प्रारंभिक चरण में उपयुक्त भूमि का चयन कर कॉफी प्लांटेशन शुरू किया जाएगा। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर कॉफी पौध तैयार करने के लिए नर्सरी स्थापित करने की भी योजना बनाई जा रही है। कॉफी बोर्ड ने इस पूरी परियोजना में तकनीकी सहयोग, मार्गदर्शन और नियमित पर्यवेक्षण देने का भरोसा दिलाया है।

कोरापुट में मिलेगा प्रशिक्षण

कॉफी बोर्ड के विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि जिले के अधिकारियों और कर्मचारियों को कॉफी उत्पादन का तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाए। इस पर कलेक्टर ने अधिकारियों को ओडिशा के कोरापुट स्थित कॉफी क्षेत्रों में प्रशिक्षण के लिए भेजने के निर्देश दिए। प्रशिक्षण के दौरान कॉफी उत्पादन, पौध प्रबंधन, जलवायु अनुकूलन, पर्यावरणीय आवश्यकताओं और आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी जाएगी, ताकि जिले में किसानों और स्व-सहायता समूहों को बेहतर मार्गदर्शन मिल सके।

चाय उत्पादन की संभावनाएं भी तलाशेगा प्रशासन

निरीक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि अबूझमाड़ का वातावरण चाय की खेती के लिए भी उपयुक्त दिखाई देता है। इस पर कलेक्टर ने भविष्य में चाय उत्पादन की संभावनाओं का विस्तृत अध्ययन कर चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए।

विशेषज्ञ दल रहा मौजूद

निरीक्षण के दौरान भारत सरकार कॉफी बोर्ड के उप निदेशक (एक्सटेंशन) एच.आर. मुरलीधर, क्षेत्रीय कॉफी अनुसंधान केंद्र के प्रभारी अधिकारी सुनील बाबू, वरिष्ठ संपर्क अधिकारी बिस्वरंजन भोई, उप संचालक कृषि मोनिका ठाकुर, जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता अशोक चौधरी सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।

बंदूक से बदलाव तक का सफर अब कॉफी की खुशबू के साथ आगे बढ़ता दिख रहा है। यदि यह महत्वाकांक्षी योजना जमीन पर सफल होती है तो अबूझमाड़ केवल नक्सलवाद से मुक्ति की कहानी नहीं, बल्कि देश के नए कॉफी मानचित्र पर उभरते क्षेत्र के रूप में भी अपनी अलग पहचान बनाएगा।

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