20 साल बाद गांव लौटने की तैयारी, लेकिन ग्रामीणों ने कहा- पहले ग्रामसभा में हो फैसला

नारायणपुर। अबूझमाड़ इलाके में वर्षों पहले विस्थापित हुए आदिवासी परिवारों की घर वापसी को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। करीब दो दशक बाद अपने गांव लौटने की तैयारी कर रहे परिवारों का कई गांवों में विरोध शुरू हो गया है। ग्रामीणों ने साफ कहा है कि बिना ग्रामसभा की सहमति किसी को भी गांव में बसाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

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जानकारी के मुताबिक, नक्सल हिंसा और संघर्ष के दौर में कई परिवार गांव छोड़कर दूसरे जिलों और राज्यों में चले गए थे। अब सुरक्षा हालात सुधरने और गांवों में सड़क व कैंप बनने के बाद कुछ परिवार अपने मूल गांव लौटना चाहते हैं। लेकिन स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इतने वर्षों बाद लौट रहे लोगों को लेकर पहले ग्रामसभा में चर्चा जरूरी है।
ग्रामीणों का आरोप है कि गांव छोड़ने के बाद कई परिवार बाहरी क्षेत्रों में बस गए थे और अब अचानक लौटने से जमीन, वन अधिकार और सामाजिक व्यवस्था को लेकर विवाद की स्थिति बन सकती है। कुछ ग्रामीणों ने यह भी कहा कि गांव की पारंपरिक व्यवस्था और सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए सामूहिक निर्णय जरूरी है।
वहीं विस्थापित परिवारों का कहना है कि उन्होंने डर और हालात की वजह से गांव छोड़ा था। अब जब हालात सामान्य हो रहे हैं तो वे अपनी जमीन और पहचान के साथ वापस गांव में रहना चाहते हैं। परिवारों का कहना है कि वे गांव से अपना रिश्ता दोबारा जोड़ना चाहते हैं।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन भी सतर्क हो गया है। अधिकारियों ने दोनों पक्षों से बातचीत शुरू कर दी है। प्रशासन का कहना है कि किसी भी स्थिति में कानून व्यवस्था बिगड़ने नहीं दी जाएगी और आपसी सहमति से समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा।
बस्तर में विस्थापन का मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील रहा है। सलवा जुडूम और नक्सल हिंसा के दौर में हजारों परिवार गांव छोड़ने को मजबूर हुए थे। अब धीरे-धीरे कुछ परिवारों की वापसी की कोशिश हो रही है, लेकिन जमीन और सामाजिक अधिकारों को लेकर नई चुनौतियां सामने आने लगी हैं।




