परलकोट में इतिहास और आस्था का महाकुंभ: ‘जय माड़िया मोंगराज मेला’ में उमड़ा जनसैलाब

कैलाश सोनी- नारायणपुर/अबूझमाड़। अबूझमाड़ के घने जंगलों के बीच स्थित ऐतिहासिक परलकोट क्षेत्र इन दिनों आस्था, संस्कृति और इतिहास के अद्भुत संगम का साक्षी बना हुआ है। होली के तीन दिन बाद शुरू होने वाला पारंपरिक “जय माड़िया मोंगराज मेला” यहां पूरे उत्साह के साथ आयोजित हो रहा है, जहां हजारों की संख्या में आदिवासी ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा और वाद्ययंत्रों के साथ शामिल हो रहे हैं।

यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि बस्तर के गौरवशाली इतिहास और आदिवासी अस्मिता का प्रतीक माना जाता है। यही वह भूमि है जहां 1824-25 में बस्तर के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी शहीद गेंद सिंह नायक (बाऊ गेंद सिंह) ने अंग्रेजों और मराठों के शोषण के खिलाफ ऐतिहासिक परलकोट विद्रोह का नेतृत्व किया था।
माड़िया जनजाति की संस्कृति का सबसे बड़ा उत्सव
नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ विकासखंड के कोंगे गांव स्थित परलकोट क्षेत्र में लगने वाला यह मेला सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है।
मेले में अबूझमाड़ के माड़िया जनजाति के लोग ढोल-मांदर, नगाड़ों और पारंपरिक वेशभूषा के साथ नृत्य करते हुए पहुंचते हैं। सिर पर मोरपंखों से सजे मुकुट और हाथों में पारंपरिक वाद्ययंत्र लिए युवाओं के समूह मेले को उत्सव में बदल देते हैं।
इस आयोजन में पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र से भी हल्बा जनजाति के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।
105 देवी-देवताओं का ऐतिहासिक संगम
मेला स्थल पर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर (निर्माण वर्ष 1964) इस आयोजन का केंद्र है।

यहां मेले के दौरान विभिन्न गांवों के देवी-देवताओं का आगमन होता है।

- अबूझमाड़ क्षेत्र के 64 गांवों से देवी-देवता
- कांकेर जिले के 41 गांवों से देवी-देवता
इस प्रकार कुल 105 देवी-देवताओं की उपस्थिति इस मेले को अद्वितीय बनाती है। देवगुड़ी स्थल पर इन देवी-देवताओं की स्थापना कर पारंपरिक पूजा-अर्चना की जाती है।
परलकोट विद्रोह की याद दिलाता ऐतिहासिक स्थल
परलकोट बस्तर रियासत की प्राचीन जमींदारियों में से एक था, जो कोटरी, निबरा और गुड्रा नदियों के संगम क्षेत्र में स्थित था।

यहीं के जमींदार गेंद सिंह नायक ने 1824 में अंग्रेजों और मराठों के अत्याचार के खिलाफ आदिवासी समाज को संगठित किया था।

उन्होंने विद्रोह का संदेश फैलाने के लिए धावड़ा वृक्ष की टहनियों का उपयोग किया। यह टहनी क्रांति का प्रतीक थी और पत्ते सूखने से पहले संबंधित गांव के लोगों को विद्रोह में शामिल होने का संदेश देती थी।
अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए बड़ी सैन्य कार्रवाई की और 10 जनवरी 1825 को परलकोट को घेर लिया।
इसके बाद 20 जनवरी 1825 को गेंद सिंह नायक को उनके ही राजमहल के सामने फांसी दे दी गई।
उन्हें आज भी “बस्तर का प्रथम शहीद” माना जाता है।
भूमकाल नायक वीर गुंडाधुर की भी स्मृति
मेला स्थल पर 1910 के भूमकाल आंदोलन के महानायक वीर गुंडाधुर की प्रतिमा भी स्थापित है।

गुंडाधुर ने अंग्रेजों की जल-जंगल-जमीन की नीति के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया था। परलकोट क्षेत्र आज इन दोनों ऐतिहासिक संघर्षों की स्मृतियों को संजोए हुए है।
अबूझमाड़ का अंतिम छोर, सीमावर्ती क्षेत्र का संगम
यह मेला नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ विकासखंड के कोंगे गांव में आयोजित होता है, जो अबूझमाड़ का अंतिम छोर माना जाता है।
मेला स्थल से लगभग 7 किलोमीटर दूर कोटरी नदी स्थित है, जो जिले की सीमा को चिन्हित करती है।
पास ही कांकेर जिले का सीमावर्ती गांव सीतराम स्थित है, जहां से भी बड़ी संख्या में ग्रामीण मेले में शामिल होते हैं।
बदलते हालात, आसान हुआ सफर
स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि पहले इस मेले तक पहुंचना बेहद कठिन होता था। बैलगाड़ी ही यहां तक पहुंचने का मुख्य साधन था।
लेकिन अब नारायणपुर-सोनपुर-परलकोट-बांदे-
नारायणपुर से बांदे की दूरी लगभग 100 किलोमीटर है, जबकि मेला स्थल नारायणपुर से लगभग 73 किलोमीटर दूर है।
नक्सलवाद के बाद दिख रहा नया बदलाव
यह पहला अवसर माना जा रहा है जब क्षेत्र में नक्सल प्रभाव कम होने और प्रशासन की सक्रियता बढ़ने के बाद मेला बड़े स्तर पर आयोजित हो रहा है।
मेले में प्रशासन द्वारा कई व्यवस्थाएं की गई हैं —
- चिकित्सा शिविर
- सुरक्षा व्यवस्था
- पशु एंबुलेंस
- कोटरी नदी पर अस्थायी पुल
- यातायात व्यवस्था
इन व्यवस्थाओं के कारण दूर-दराज के ग्रामीणों को काफी सुविधा मिल रही है।
सदियों पुरानी परंपरा को संजोए ग्रामीण
कोंगे गांव के बुजुर्ग ग्रामीण बताते हैं कि यह मेला सदियों से आयोजित होता आ रहा है और गांवों के आपसी भाईचारे से इसका आयोजन होता है।
उनका कहना है कि समय के साथ साधन बदल गए हैं, लेकिन मेले की परंपरा और आस्था आज भी वैसी ही बनी हुई है।
इतिहास, आस्था और संस्कृति का संगम
परलकोट का जय माड़िया मोंगराज मेला केवल एक मेला नहीं बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत, जनसंघर्ष और सामुदायिक एकता का जीवंत प्रतीक है।
शहीद गेंद सिंह नायक और वीर गुंडाधुर जैसे जननायकों की स्मृतियों के बीच आयोजित यह मेला आज भी बस्तर की पहचान को जीवित रखे हुए है।




