शिक्षा

शासन के आदेशों पर सवाल: नारायणपुर में वर्षों से दफ्तरों में जमे शिक्षक, स्कूलों में पढ़ाई पर संकट

डीपीआई के निर्देशों के बाद भी मूल पदस्थापना पर नहीं लौटे शिक्षक, जिला समन्वयक से लेकर आश्रम अधीक्षक तक कई पदों पर शिक्षकों की तैनाती; मंत्री केदार कश्यप बोले— "एजुकेशन के मामले में कोई समझौता नहीं होगा"।

नारायणपुर। प्रदेश सरकार द्वारा संलग्न शिक्षकों को तत्काल उनकी मूल पदस्थापना वाले विद्यालयों में भेजने के स्पष्ट निर्देश जारी किए जाने के बावजूद नारायणपुर जिले में इन आदेशों का पालन होता नजर नहीं आ रहा है। शिक्षा विभाग के कई प्रशासनिक पदों पर वर्षों से शिक्षक प्रभारी अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं, जबकि दूसरी ओर अनेक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी से विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होने की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में शासन के आदेशों के क्रियान्वयन और शिक्षा व्यवस्था की गंभीरता पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

जानकारी के अनुसार, 23 जून 2026 को आयोजित समीक्षा बैठक में स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने विभिन्न कार्यालयों में संलग्न शिक्षकों को तत्काल उनकी मूल शालाओं में भेजने के निर्देश दिए थे। इसके बाद 25 जून 2026 को लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई), नवा रायपुर ने भी सभी जिलों को आदेश जारी कर संलग्न शिक्षकों एवं कर्मचारियों को तत्काल मूल पदस्थापना पर कार्यभार ग्रहण कराने तथा इसकी जानकारी निर्धारित प्रारूप में भेजने के निर्देश दिए।

जिले के कई प्रशासनिक पदों पर अब भी शिक्षक

डीपीआई के आदेश के बावजूद नारायणपुर जिले में जिला समन्वयक, खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ), सहायक खंड शिक्षा अधिकारी (एबीईओ), खंड स्रोत समन्वयक (बीआरसी), मंडल संयोजक सहित अन्य प्रशासनिक पदों पर शिक्षक अब भी प्रभारी के रूप में कार्यरत हैं। विभागीय स्तर पर उन्हें मूल विद्यालयों में कार्यमुक्त करने की कोई ठोस पहल अब तक दिखाई नहीं दे रही है।

आश्रम अधीक्षक बनने के बाद स्कूलों से दूरी

जिले में बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक भी हैं, जिन्हें विद्यालयों में अध्यापन के लिए नियुक्त किया गया था, लेकिन बाद में वे राजनीतिक या प्रशासनिक प्रभाव के चलते आश्रम अधीक्षक का प्रभार लेकर वहीं कार्यरत हो गए। इसके कारण उन्हें मूल विद्यालयों के लिए कार्यमुक्त नहीं किया जा रहा है।

स्थिति यह है कि संबंधित स्कूलों में शिक्षक का पद कागजों में भरा हुआ दर्ज है, जबकि वास्तविकता में शिक्षक विद्यालय में उपलब्ध नहीं रहते। इससे विद्यार्थियों की नियमित पढ़ाई प्रभावित हो रही है और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का दावा सवालों के घेरे में आ गया है।

शिक्षा सुधार की कवायद कागजों तक सीमित?

शिक्षा विभाग लगातार स्कूलों में गुणवत्ता सुधार और बेहतर परिणामों की बात करता है, लेकिन बड़ी संख्या में शिक्षकों के प्रशासनिक दायित्वों और अन्य पदों पर बने रहने से कई विद्यालय शिक्षकविहीन या शिक्षक संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में शिक्षा सुधार की कवायद जमीनी स्तर पर कमजोर पड़ती नजर आ रही है।

क्या बोले वनमंत्री एवं स्थानीय विधायक केदार कश्यप

हाल ही में नारायणपुर में आयोजित जिला स्तरीय शाला प्रवेश उत्सव कार्यक्रम के दौरान मीडिया ने शिक्षकों के लंबे समय से प्रशासनिक पदों पर संलग्न रहने और उन्हें मूल पदस्थापना पर कार्यमुक्त नहीं किए जाने को लेकर सवाल किया। इस पर वनमंत्री एवं स्थानीय विधायक केदार कश्यप ने कहा कि इस विषय पर चर्चा की जाएगी।

उन्होंने कहा, “शिक्षकों के संलग्नीकरण को लेकर चर्चा की जाएगी। तत्कालीन व्यवस्था की दृष्टि से स्थानीय स्तर पर शिक्षकों को संलग्न किया गया होगा, लेकिन राज्य सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि एजुकेशन के मामले में कोई समझौता नहीं होगा। पिछली बार भी युक्तियुक्तकरण के माध्यम से एकल विद्यालयों में शिक्षकों की व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी।”

अब निगाहें जिला प्रशासन पर

शासन के स्पष्ट निर्देश और स्थानीय विधायक के सार्वजनिक बयान के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नारायणपुर जिले में वर्षों से विभिन्न कार्यालयों और अन्य दायित्वों में कार्यरत शिक्षकों को आखिर कब उनके मूल विद्यालयों में भेजा जाएगा? यदि आदेशों का समयबद्ध पालन नहीं हुआ तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और सरकारी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ना तय माना जा रहा है।

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