मांदर की थाप पर थिरका छोटेडोंगर, शहीदों को नमन से शुरू हुआ आदिवासी गौरव का उत्सव
विश्व आदिवासी दिवस पर 84 परगना सर्व आदिवासी समाज का भव्य आयोजन; पारंपरिक वेशभूषा में निकली रैली, डांडा और गोंडी नृत्य ने बांधा समां

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के संकल्प के साथ रविवार को छोटेडोंगर में विश्व आदिवासी दिवस धूमधाम और पारंपरिक रंगों के बीच मनाया गया। 84 परगना सर्व आदिवासी समाज की ओर से आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत अमर शहीदों को नमन से हुई। साप्ताहिक बाजार स्थल पर अमर शहीदों के छायाचित्र पर पूजा-अर्चना और ध्वजारोहण के बाद सैकड़ों लोगों ने रैली निकाली। पारंपरिक वेशभूषा, मांदर की थाप और लोकनृत्य के बीच निकली रैली ने पूरे छोटेडोंगर को आदिवासी संस्कृति के रंग में रंग दिया।
मोरपंख-सींग के मुकुट और मांदर की थाप
ध्वजारोहण के बाद निकली रैली में पुरुष पारंपरिक सफेद वेशभूषा में नजर आए। सिर पर मोरपंख और सींग से सजे मुकुट और हाथों में पारंपरिक सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ वे मांदर की थाप पर थिरकते हुए आगे बढ़े। वहीं महिलाओं ने पारंपरिक साड़ियों में सजकर लंबी कतार में रैली में भाग लिया।



रैली छोटेडोंगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए वापस साप्ताहिक बाजार स्थल पहुंची। इस दौरान समाज की एकजुटता और जल, जंगल, जमीन की रक्षा का संदेश दिया गया।
तिलक और पगड़ी पहनाकर अतिथियों का सम्मान
बाजार स्थल पर आयोजित मुख्य सांस्कृतिक कार्यक्रम में समाज से जुड़े पदाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को मंच पर आमंत्रित कर तिलक लगाया गया। इसके बाद पगड़ी पहनाकर सम्मान किया गया। सम्मान समारोह के बाद आदिवासी युवक-युवतियों ने पारंपरिक डांडा और गोंडी नृत्य की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं।
मांदर और ढोल की गूंज के बीच कलाकारों की प्रस्तुति देखने के लिए आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग जुटे। नृत्य की हर थाप के साथ दर्शकों का उत्साह बढ़ता गया और कलाकारों का तालियों से स्वागत किया गया।
कलाकारों को मंच पर पहुंचकर दिया प्रोत्साहन
पारंपरिक नृत्य प्रस्तुतियों से प्रभावित होकर भाजपा जिलाध्यक्ष संध्या पवार, छोटेडोंगर के उपसरपंच संतोष बैठारू सहित स्थानीय नागरिकों ने मंच पर पहुंचकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाया। उन्होंने कलाकारों को नकद राशि देकर प्रोत्साहित किया।
‘संस्कृति ही हमारी पहचान’
कार्यक्रम में समाज से जुड़े वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति ही उसकी पहचान है। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व आदिवासी जीवन का मूल आधार रहा है और समाज प्रकृति का संरक्षक है। वक्ताओं ने कहा कि बदलते समय में आदिवासी संस्कृति, भाषा और परंपराओं को संरक्षित करना जरूरी है।
कार्यक्रम में शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वरोजगार को बढ़ावा देने की जरूरत पर भी जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि समाज के सर्वांगीण विकास के लिए नई पीढ़ी को शिक्षा से जोड़ने के साथ रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है।
क्यों मनाया जाता है विश्व आदिवासी दिवस
संयुक्त राष्ट्र ने 9 अगस्त 1994 से प्रतिवर्ष विश्व आदिवासी दिवस मनाने की घोषणा की थी। इससे पहले 9 अगस्त 1982 को संयुक्त राष्ट्र में पहली बार आदिवासी समुदायों के मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई थी। विश्व आदिवासी दिवस का उद्देश्य दुनिया भर में आदिवासी समुदायों की संस्कृति, परंपराओं और अधिकारों के संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाना है।
लोककला और हस्तशिल्प ने बढ़ाई आयोजन की रंगत
कार्यक्रम स्थल पर बस्तर की लोककला और हस्तशिल्प का भी प्रदर्शन किया गया। पारंपरिक कला और शिल्प ने आयोजन में स्थानीय संस्कृति की अलग छटा बिखेरी। सुबह अमर शहीदों को नमन से शुरू हुआ कार्यक्रम दिनभर सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, रैली और सामाजिक संदेशों से सराबोर रहा।
पूरे दिन छोटेडोंगर का साप्ताहिक बाजार स्थल आदिवासी गौरव, परंपरा और उत्साह के रंग में रंगा रहा। मांदर की थाप, गोंडी नृत्य, पारंपरिक वेशभूषा और बड़ी संख्या में समाज की भागीदारी ने विश्व आदिवासी दिवस को यादगार बना दिया।




