बंदूक के साये से निकलकर संस्कृति के रंग में रंगा अबूझमाड़
नारायणपुर में ऐतिहासिक रहा विश्व आदिवासी दिवस : हजारों की मौजूदगी में दिखी आदिवासी संस्कृति की जीवंत तस्वीर, अबूझमाड़ से बड़ी संख्या में पहुंचे ग्रामीण

पारंपरिक वेशभूषा में सजा नारायणपुर, बाइक रैली और पदयात्रा ने दिया एकता का संदेश; आत्मसमर्पित नक्सलियों ने भी मनाया पर्व, बोले—चार दशक बाद अपनी जड़ों से फिर जुड़ने का अवसर मिला
(कैलाश सोनी) नारायणपुर। नक्सलवाद के लंबे साये से निकलकर अबूझमाड़ अब अपनी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान के रंग में रंगता नजर आ रहा है। रविवार को विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर नारायणपुर में इसका जीवंत नजारा देखने को मिला। जिले में आयोजित कार्यक्रम में आदिवासी समाज की ऐसी व्यापक भागीदारी दिखाई दी, जिसने इस आयोजन को खास बना दिया। अबूझमाड़ के सुदूर इलाकों से बड़ी संख्या में ग्रामीण अपने पारंपरिक पर्व में शामिल होने नारायणपुर पहुंचे। महिला, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ आयोजन का हिस्सा बने।

विश्व आदिवासी दिवस पर नारायणपुर की सड़कों से लेकर कार्यक्रम स्थल तक लोक संस्कृति, पारंपरिक परिधान, गीत-संगीत और सामाजिक एकजुटता की झलक दिखाई दी। कभी नक्सलवाद के प्रभाव के कारण मुख्यधारा से दूर रहने वाले अबूझमाड़ के ग्रामीणों का बड़ी संख्या में जिला मुख्यालय पहुंचना बदलते सामाजिक माहौल की तस्वीर पेश करता नजर आया।

अबूझमाड़ से उमड़ा जनसैलाब
विश्व आदिवासी दिवस के कार्यक्रम में इस बार अबूझमाड़ से बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचे। दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों से आए लोगों ने पारंपरिक वेशभूषा में अपनी संस्कृति का प्रदर्शन किया। पुरुषों के सिर पर पारंपरिक साफे और पगड़ी, महिलाओं के पारंपरिक परिधान व आभूषण और युवाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने पूरे आयोजन को सांस्कृतिक रंग दे दिया।

कार्यक्रम में आदिवासी समाज की अलग-अलग परंपराओं और वेशभूषाओं की झलक देखने को मिली। गांवों से आए लोगों के लिए यह केवल जिला मुख्यालय तक पहुंचने का अवसर नहीं था, बल्कि अपनी सामाजिक पहचान और सांस्कृतिक जड़ों को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त करने का मौका भी था।

चार दशक बाद बंदूक नहीं, संस्कृति के साथ
विश्व आदिवासी दिवस की सबसे भावुक तस्वीर उन आत्मसमर्पित नक्सलियों की रही, जिन्होंने कभी बंदूक और नक्सलवाद के साये में जीवन बिताया था। आत्मसमर्पण के बाद समाज की मुख्यधारा में लौटे इन लोगों ने भी आदिवासी दिवस के आयोजन में भाग लिया और पारंपरिक वेशभूषा में अपनी संस्कृति के साथ खड़े नजर आए।
आत्मसमर्पित लोगों ने बताया कि नक्सलवाद के कारण करीब चार दशकों तक वे अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से दूर होते चले गए। त्योहार और सामाजिक आयोजन भी उनके जीवन से लगभग गायब हो गए थे। अब आत्मसमर्पण के बाद समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर मिला है।
उनका कहना था कि आज बंदूक के बजाय अपनी संस्कृति और समाज के साथ खड़ा होना उनके लिए खुशी और गर्व का क्षण है। विश्व आदिवासी दिवस पर परिवार और समाज के लोगों के साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों में शामिल होना उनके लिए नए जीवन की अनुभूति जैसा रहा।
ध्वजारोहण के साथ शुरू हुआ आयोजन
विश्व आदिवासी दिवस के कार्यक्रम की शुरुआत हाईस्कूल मैदान में सामाजिक ध्वज के ध्वजारोहण के साथ हुई। इसके बाद शहर में विशाल बाइक रैली निकाली गई। रैली में बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए। कई युवा पारंपरिक वेशभूषा में बाइक पर सवार होकर निकले।
रैली के दौरान समाज की एकता, अपनी संस्कृति के संरक्षण और जल-जंगल-जमीन की रक्षा का संदेश दिया गया। शहर की सड़कों पर निकली रैली में पारंपरिक वेशभूषा और सामाजिक झंडों ने आयोजन को अलग पहचान दी।
पदयात्रा में दिखी सामाजिक एकजुटता
बाइक रैली के बाद शहर में पदयात्रा निकाली गई। इसमें बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के महिला-पुरुष, युवा और बुजुर्ग शामिल हुए। पारंपरिक गीत-संगीत और नारों के बीच निकली पदयात्रा ने सामाजिक एकता का संदेश दिया।
पदयात्रा में शामिल लोगों के पारंपरिक परिधान और आभूषण लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे। शहर में जगह-जगह आदिवासी संस्कृति की रंगीन तस्वीर नजर आई।
पटेल-गायता का तिलक और पगड़ी पहनाकर सम्मान
हाईस्कूल मैदान में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में समाज के पटेल और गायता का तिलक लगाकर तथा पगड़ी पहनाकर सम्मान किया गया। पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में उनकी भूमिका और योगदान को सम्मान देते हुए समाज के लोगों ने उनका अभिनंदन किया।
कार्यक्रम में युवाओं ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति, परंपरा और पहचान को बचाने का संकल्प लेने का दिन भी है।
युवाओं ने कहा कि आदिवासी समाज जल, जंगल और जमीन की रक्षा के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए भी प्रतिबद्ध है।
अबूझमाड़ की बदलती तस्वीर
नारायणपुर में इस बार विश्व आदिवासी दिवस का आयोजन केवल एक सामाजिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा। अबूझमाड़ के सुदूर इलाकों से बड़ी संख्या में ग्रामीणों की मौजूदगी ने इसे जिले में बदलते सामाजिक माहौल का प्रतीक बना दिया।
एक ओर पारंपरिक वेशभूषा में सजे ग्रामीण अपनी संस्कृति का प्रदर्शन कर रहे थे, तो दूसरी ओर कभी नक्सलवाद के साथ रहे आत्मसमर्पित लोग उसी समाज के बीच खड़े होकर अपनी पहचान और परंपरा के साथ पर्व मना रहे थे।
बंदूक की जगह हाथों में सामाजिक झंडे, जंगल की बंदिशों की जगह शहर की सड़कों पर पदयात्रा और भय के माहौल की जगह गीत-संगीत—नारायणपुर में विश्व आदिवासी दिवस की तस्वीर अबूझमाड़ में आए सामाजिक बदलाव की कहानी कहती नजर आई।




