छत्तीसगढ़

बारूद के ढेर में फूटा साहित्य का अंकुर

अबूझमाड़ के युवा साहित्यकार डॉ. भागेश्वर पात्र की शोधपरक कृति का राजधानी में लोकार्पण, वन मंत्री केदार कश्यप ने किया सम्मानित

हल्बा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और परंपराओं का दस्तावेज बनी पुस्तक; विशेषज्ञों ने बताया जनजातीय अध्ययन के लिए मील का पत्थर

नारायणपुर/रायपुर। कभी नक्सलवाद और बारूद की गूंज के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहने वाले अबूझमाड़ से अब साहित्य, शोध और सांस्कृतिक चेतना की नई आवाजें निकल रही हैं। इसी परिवर्तन का सशक्त उदाहरण उस समय देखने को मिला, जब नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र स्थित ग्राम बेचा निवासी युवा साहित्यकार एवं शोधकर्ता डॉ. भागेश्वर पात्र की शोधपरक कृति ‘हल्बा जनजाति : संस्कृति एवं परंपराएं’ का राजधानी रायपुर में भव्य लोकार्पण हुआ। यह आयोजन केवल एक पुस्तक विमोचन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अबूझमाड़ की धरती पर उभर रही नई बौद्धिक और साहित्यिक चेतना का प्रतीक बनकर सामने आया।

छत्तीसगढ़ शासन के वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने गुरुवार को नया रायपुर स्थित अपने निवास में आयोजित समारोह में पुस्तक का विमोचन किया। कार्यक्रम में प्रदेश के साहित्य, प्रशासन और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े कई प्रतिष्ठित व्यक्तित्व उपस्थित रहे। समारोह के दौरान मंत्री कश्यप ने डॉ. भागेश्वर पात्र को सामाजिक एवं साहित्यिक क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए राजकीय गमछा एवं स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित भी किया।

राजधानी में जुटे साहित्य और समाज के प्रमुख चेहरे

पुस्तक लोकार्पण समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार रूद्रनारायण पाणीग्राही, आईएएस अधिकारी डॉ. संजय अलंग, डॉ. गितेश कुमार अमरोहित, पुस्तक के प्रकाशक आकाश माहेश्वरी (सरस्वती बुक्स, भिलाई), सामाजिक कार्यकर्ता नंदकुमार प्रधान तथा शर्मा शांडिल्य सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

समारोह में वक्ताओं ने कहा कि जनजातीय समाज की संस्कृति और परंपराओं को शोध के माध्यम से दस्तावेजीकृत करना आज के समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। डॉ. पात्र की यह कृति न केवल हल्बा समाज के लिए गौरव का विषय है, बल्कि बस्तर और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

अबूझमाड़ की मिट्टी से निकली नई पहचान

पुस्तक के लोकार्पण ने यह साबित किया कि भौगोलिक रूप से दुर्गम और लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से दूर रहे अबूझमाड़ क्षेत्र में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। जिस क्षेत्र को वर्षों तक नक्सल प्रभावित और पिछड़े इलाके के रूप में देखा जाता रहा, वहीं से अब शोध, साहित्य और ज्ञान की नई धारा प्रवाहित हो रही है।

स्थानीय साहित्यकारों का कहना है कि यह उपलब्धि केवल डॉ. भागेश्वर पात्र की व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि पूरे अबूझमाड़ और बस्तर अंचल की साहित्यिक क्षमता का प्रमाण है। जिस धरती पर कभी बारूद की चिंगारियां सुर्खियां बनती थीं, वहीं अब साहित्यिक सृजन के बीज अंकुरित हो रहे हैं और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहे हैं।

हल्बा जनजाति के गौरवशाली इतिहास का दस्तावेज

वरिष्ठ साहित्यकार शिवकुमार पांडेय, बिक्रम सोनी, नरेंद्र पाढ़ी तथा अन्य साहित्यकारों ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि डॉ. पात्र द्वारा रचित एवं सरस्वती बुक्स द्वारा प्रकाशित यह कृति जनजातीय अध्ययन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान साबित होगी।

उनके अनुसार पुस्तक में हल्बा जनजाति के गौरवशाली अतीत, सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक मूल्यों और पारंपरिक जीवन पद्धति का विस्तृत एवं शोधपरक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक केवल सांस्कृतिक परिचय नहीं देती, बल्कि समाज के ऐतिहासिक विकास, सामाजिक ताने-बाने और सामुदायिक जीवन को भी गहराई से समझाती है।

लोकजीवन, परंपराएं और लोकसाहित्य का समृद्ध संकलन

विशेषज्ञों के अनुसार पुस्तक में हल्बा समुदाय के सामाजिक रीति-रिवाजों, पारंपरिक मान्यताओं, लोककथाओं, लोकगीतों, धार्मिक आस्थाओं, उत्सवों, सांस्कृतिक आयोजनों और जीवनशैली का व्यापक विश्लेषण किया गया है।

पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह माना जा रहा है कि इसमें जनजातीय समाज की मौखिक परंपराओं को भी व्यवस्थित रूप से दर्ज किया गया है। बदलते समय में जब कई पारंपरिक सांस्कृतिक स्वरूप विलुप्ति के कगार पर हैं, तब यह कृति उन्हें संरक्षित करने का महत्वपूर्ण प्रयास साबित हो सकती है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह पुस्तक भारतीय मानव विज्ञान, नृवंशविज्ञान और जनजातीय अध्ययन से जुड़े विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों के लिए उपयोगी संदर्भ ग्रंथ के रूप में स्थापित होगी। साथ ही भारतीय जनजातीय संस्कृति पर अध्ययन करने वाले पाठकों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण संसाधन सिद्ध होगी।

पहली पुस्तक ने दिलाई व्यापक पहचान

डॉ. भागेश्वर पात्र की यह पहली प्रकाशित कृति है, लेकिन इसकी विषयवस्तु और शोध की गहराई ने इसे प्रकाशन के साथ ही चर्चा के केंद्र में ला दिया है। साहित्य और जनजातीय अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह पुस्तक आने वाले समय में हल्बा जनजाति पर अध्ययन करने वालों के लिए आधारभूत संदर्भ सामग्री के रूप में उपयोग की जाएगी।

पुस्तक के माध्यम से न केवल हल्बा समाज की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है, बल्कि समाज की ऐतिहासिक पहचान को भी संरक्षित करने की दिशा में सार्थक पहल हुई है।

शुभचिंतकों ने दी बधाई

डॉ. भागेश्वर पात्र की प्रथम कृति के विमोचन पर अखिल भारतीय हल्बा आदिवासी समाज के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष लतेल राम नाईक, राष्ट्रीय पदाधिकारी शिवकुमार पात्र, डॉ. कृष्णपाल राणा, दामेसाय बघेल, ललित नरेटी, कन्हैया उइके, धनश्री गावलकर, अरुण बघेल, महेश्वर मुरला, भानुप्रताप चुरेन्द्र, संतुराम नुरेटी, सुंदर लाल नाग, संगीता ध्रुव, हरेश ठाकुर, मेहतूराम कुमेटी, चुम्मन सुधाकर, अभिलाल शोरी सहित अनेक सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए शुभकामनाएं दी हैं।

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