नक्सल मोर्चे के जांबाज अब बन रहे ‘डिजिटल प्रहरी’
अबूझमाड़ में आतंक की जड़ों को उखाड़ने वाले डीआरजी जवानों को आधुनिक कानून और तकनीक का प्रशिक्षण

नारायणपुर पुलिस का विशेष दक्षता कार्यक्रम—कानून, विवेचना और कम्युनिटी पुलिसिंग पर फोकस
(कैलाश सोनी) नारायणपुर, 11 अप्रैल 2026। बस्तर के घने जंगलों में वर्षों तक नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने वाले डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) के जांबाज जवान अब एक नई भूमिका में नजर आने वाले हैं। जो जवान कभी गोरिल्ला युद्ध रणनीतियों को मात देकर अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाकों में नक्सलवाद की जड़ों को हिला चुके हैं, वही अब आधुनिक और डिजिटल पुलिसिंग के लिए तैयार किए जा रहे हैं।
नारायणपुर पुलिस ने बदलते समय और नए आपराधिक कानूनों के अनुरूप अपने बल को और अधिक सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए “विशेष दक्षता प्रशिक्षण कार्यक्रम” की शुरुआत की है। यह प्रशिक्षण 6 अप्रैल 2026 से ओपन एरिना डीआरजी कैंपस में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें जवानों को कानून, तकनीक और जनसंवाद की नई बारीकियां सिखाई जा रही हैं।

जंगल से कानून की किताब तक: बदलती भूमिका, बढ़ती जिम्मेदारी
एक समय था जब इन जवानों की पहचान केवल नक्सल विरोधी अभियानों तक सीमित थी। दुर्गम पहाड़ियों, घने जंगलों और जानलेवा परिस्थितियों में ऑपरेशन चलाना ही उनकी दिनचर्या थी। लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं।
नक्सलवाद के कमजोर पड़ने और प्रशासनिक पहुंच बढ़ने के साथ ही इन जवानों की भूमिका भी विस्तारित हो रही है। अब उन्हें केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि कानूनी रूप से दक्ष, तकनीकी रूप से सक्षम और सामाजिक रूप से संवेदनशील पुलिसकर्मी बनाना समय की मांग है।
इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए यह प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया है, जो बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पुलिसिंग के नए मॉडल की नींव रख रहा है।
नए कानूनों की गहराई से समझ, विवेचना पर खास जोर
प्रशिक्षण कार्यक्रम में जवानों को भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 के प्रावधानों की विस्तृत जानकारी दी जा रही है।
इसके साथ ही अपराध विवेचना की प्रक्रिया, केस डायरी लेखन, साक्ष्य संग्रहण, ई-साक्ष्य के उपयोग और कानूनी प्रक्रिया की बारीकियों पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
प्रशिक्षण में यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि जवान केवल कानून पढ़ें ही नहीं, बल्कि उसे व्यवहार में भी प्रभावी तरीके से लागू कर सकें।
अनुभवी अधिकारियों की टीम दे रही व्यावहारिक प्रशिक्षण
इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का संचालन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक संजय महादेवा के मार्गदर्शन में किया जा रहा है।
विभिन्न अनुभवी अधिकारियों द्वारा जवानों को—
- केस डायरी लेखन की तकनीक
- अपराध विवेचना की प्रक्रिया
- महिला एवं बाल अपराधों की संवेदनशील जांच
- साक्ष्य अधिनियम के प्रावधान
- यातायात नियमों का पालन
जैसे विषयों पर विस्तार से और व्यावहारिक तरीके से प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
यह प्रशिक्षण केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि जमीनी अनुभवों पर आधारित है, जिससे जवान वास्तविक परिस्थितियों में बेहतर निर्णय ले सकें।
कम्युनिटी पुलिसिंग: विश्वास जीतने की नई रणनीति
नारायणपुर पुलिस ने इस प्रशिक्षण में कम्युनिटी पुलिसिंग को विशेष महत्व दिया है।
अबूझमाड़ और बस्तर जैसे क्षेत्रों में लंबे समय तक भय और अविश्वास का माहौल रहा है। ऐसे में पुलिस और जनता के बीच विश्वास का सेतु बनाना बेहद जरूरी है।
प्रशिक्षण के तहत जवानों को सिखाया जा रहा है कि वे—
- ग्रामीणों से बेहतर संवाद स्थापित करें
- उनकी समस्याओं को समझें और समाधान करें
- विश्वास और सहयोग का वातावरण तैयार करें
इस पहल से पुलिस-जनता के बीच संबंध मजबूत होंगे और क्षेत्र में सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलेगा।
तकनीक से लैस हो रही पुलिसिंग
डिजिटल युग में अपराध के स्वरूप भी बदल रहे हैं। ऐसे में पुलिस बल को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना अनिवार्य हो गया है।
प्रशिक्षण में जवानों को ई-साक्ष्य, डिजिटल डाटा, ऑनलाइन दस्तावेजीकरण और कार्यालयीन कार्यों की भी जानकारी दी जा रही है।
इसके अलावा टाइपिंग और रिकॉर्ड प्रबंधन जैसी बुनियादी दक्षताओं को भी मजबूत किया जा रहा है, ताकि कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और गति लाई जा सके।
एसपी का संदेश: प्रशिक्षण को जमीन पर उतारें
पुलिस अधीक्षक रोबिनसन गुड़िया (भा.पु.से.) ने जवानों से अपील की है कि वे इस प्रशिक्षण को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया न मानें, बल्कि इसे अपने दैनिक कार्यों में प्रभावी रूप से लागू करें।
उन्होंने कहा कि—
“प्रशिक्षण का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब इसका लाभ आम नागरिकों तक पहुंचे और उन्हें त्वरित, पारदर्शी एवं गुणवत्तापूर्ण न्याय मिल सके।”
नक्सल मोर्चे से सामाजिक सुरक्षा तक: नई पहचान गढ़ते जवान
डीआरजी के ये वही जवान हैं, जिन्होंने नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक भूमिका निभाई है। जंगलों में गोरिल्ला युद्ध की रणनीतियों को समझते हुए उन्होंने कई सफल ऑपरेशन किए और क्षेत्र में शांति बहाल करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
अब यही जवान नई भूमिका में समाज के रक्षक के रूप में उभर रहे हैं—जहां उनकी पहचान केवल एक योद्धा की नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, प्रशिक्षित और आधुनिक पुलिसकर्मी की होगी।
बदलते बस्तर की झलक
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल एक पहल नहीं, बल्कि बस्तर के बदलते स्वरूप का प्रतीक है।
जहां कभी नक्सलवाद की छाया थी, वहां अब कानून का राज स्थापित हो रहा है।
जहां पहले भय था, वहां अब विश्वास का माहौल बन रहा है।
नारायणपुर पुलिस की यह पहल दिखाती है कि विकास और सुरक्षा साथ-साथ चल सकते हैं—और जब दोनों का संतुलन बनता है, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होता है।
आगे की दिशा: आधुनिक पुलिसिंग का मजबूत आधार
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम भविष्य में पुलिसिंग के स्तर को और ऊंचा उठाएंगे।
- कानून की बेहतर समझ
- तकनीकी दक्षता
- जनसंपर्क कौशल
इन तीनों का संयोजन पुलिस बल को अधिक प्रभावी बनाएगा।
नारायणपुर में शुरू हुई यह पहल आने वाले समय में पूरे प्रदेश के लिए एक मॉडल बन सकती है।
नई सोच, नई ताकत
नक्सलवाद के खिलाफ संघर्ष में अपनी क्षमता साबित कर चुके डीआरजी जवान अब नई चुनौतियों के लिए तैयार हो रहे हैं।
यह बदलाव केवल प्रशिक्षण का नहीं, बल्कि सोच का है—जहां पुलिस बल खुद को समय के अनुसार ढाल रहा है और समाज की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
नारायणपुर की यह पहल बताती है कि जब इच्छाशक्ति, रणनीति और संवेदनशीलता एक साथ आती है, तो बदलाव अवश्य होता है—और यही बदलाव अब बस्तर की नई पहचान बनता जा रहा है।




