“सड़क नहीं तो विकास नहीं” — पहाड़ों में अटकी जिंदगी, 70 साल बाद भी तरसते गांव
नारायणपुर के ताडोनार समेत 5 गांवों की दर्दभरी दास्तान • राशन के लिए 10 किमी पैदल, बीमार को कंधों पर ढोकर पहुंचती है जिंदगी सड़क तक

(कैलाश सोनी) नारायणपुर।
एक ओर देश डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी और तेज रफ्तार विकास की बातें कर रहा है, वहीं दूसरी ओर नारायणपुर जिले के कुछ गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। करमरी ग्राम पंचायत के ताडोनार, हिक्कोनार, परलभाट, कुरुषनार और कोडोली गांव आज भी उस सच्चाई को बयां करते हैं, जहां “सड़क” सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि सपने जैसी चीज बन चुकी है।

इन गांवों की सबसे बड़ी समस्या—सड़क का अभाव—ने यहां के लोगों की जिंदगी को रोजाना की जद्दोजहद में बदल दिया है। यहां सफर करना एक सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि हर दिन लड़ी जाने वाली एक कठिन लड़ाई है। गांव तक पहुंचने के लिए न तो कोई पक्की सड़क है और न ही सुरक्षित रास्ते। कच्चे, उबड़-खाबड़ और गड्ढों से भरे रास्ते ही यहां की पहचान बन चुके हैं।
कई गांवों तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को पहाड़ी पगडंडियों से गुजरना पड़ता है। बरसात के दिनों में ये रास्ते और भी खतरनाक हो जाते हैं। कीचड़ से भरे, फिसलन भरे ये रास्ते किसी भी वक्त हादसे को न्योता देते हैं। ऐसे में गांव का हर सफर जोखिम से भरा होता है।

राशन के लिए 10 किलोमीटर का संघर्ष
यहां के लोगों की मजबूरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें राशन जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी 8 से 10 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। वापस लौटते समय सिर पर भारी बोझ लेकर इन कठिन रास्तों से गुजरना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। यह तस्वीर किसी बीते जमाने की नहीं, बल्कि आज के भारत की सच्चाई है।
बीमार पड़े तो जिंदगी दांव पर
स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति और भी भयावह है। गांव तक एंबुलेंस पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है। ऐसे में अगर कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए, तो परिजन उसे कावड़ या खाट के सहारे मुख्य सड़क तक लाते हैं। वहां पहुंचने के बाद ही 108 एंबुलेंस की मदद मिल पाती है। कई बार यह देरी मरीज की जान पर भारी पड़ जाती है।
शिक्षा भी रास्तों में उलझी
इन बदहाल रास्तों का असर बच्चों के भविष्य पर भी साफ दिखाई देता है। स्कूल जाने के लिए बच्चों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। खराब रास्तों और जोखिम भरे सफर के कारण कई बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। जिन परिवारों के पास बाइक है, वे भी इन रास्तों पर चलने से बचते हैं—क्योंकि हर सफर खतरे से भरा होता है।
“हर बार मिला सिर्फ आश्वासन”
ग्राम पंचायत के सरपंच गड़वा राम सलाम की आवाज में दर्द साफ झलकता है। वे बताते हैं कि कई बार प्रशासन को ज्ञापन सौंपे गए, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला।
“ऐसा लगता है जैसे हमारी आवाज कहीं दब जाती है,” वे कहते हैं।
एक सड़क से बदल सकती है तकदीर
इन गांवों के लोगों की मांग बहुत बड़ी नहीं है—सिर्फ एक पक्की सड़क। उनका मानना है कि सड़क बनेगी तो जिंदगी बदलेगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार—हर क्षेत्र में सुधार आएगा और उनका गांव भी विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकेगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या इन पहाड़ों के बीच दबती आवाजें प्रशासन तक पहुंचेंगी?
क्या इन गांवों को भी विकास की सड़क नसीब होगी?
या फिर ये लोग यूं ही हर दिन संघर्ष की राह पर चलते रहेंगे…?




