अबूझमाड़ से गूंजा तिरंगा, बंदूक के साये से निकलकर विकास की राह पर बढ़ा बस्तर
नक्सलवाद की कथित राजधानी से शुरू हुई तीन दिवसीय ‘बस्तर तिरंगा यात्रा’; उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा और वन मंत्री केदार कश्यप ने थामा तिरंगा

नारायणपुर से कर्रेगुट्टा तक पहुंचेगा राष्ट्रध्वज का कारवां, नक्सल हिंसा में शहीद जवानों-ग्रामीणों को श्रद्धांजलि और शहीद परिवारों का सम्मान
नारायणपुर। कभी नक्सलवाद के गढ़ के रूप में पहचाने जाने वाले अबूझमाड़ से बुधवार को तिरंगे की शान और देशभक्ति का संदेश गूंजा। नारायणपुर के हाईस्कूल मैदान से तीन दिवसीय ‘बस्तर तिरंगा यात्रा’ का भव्य आगाज हुआ। प्रदेश के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा और वन मंत्री केदार कश्यप के नेतृत्व में शुरू हुई यात्रा में बड़ी संख्या में लोग हाथों में तिरंगा लेकर शामिल हुए।

यह यात्रा बस्तर के उन इलाकों से होकर गुजरेगी, जो वर्षों तक नक्सलवाद के साये में रहे। यात्रा का संदेश स्पष्ट है—बंदूक और बारूद के डर से निकलकर तिरंगे की छांव में विकास और शांति की ओर बढ़ता बस्तर।
अबूझमाड़ से कर्रेगुट्टा तक तिरंगे का सफर
बस्तर तिरंगा यात्रा नारायणपुर से कोंडागांव, जगदलपुर, दंतेवाड़ा और सुकमा होते हुए बीजापुर जिले के कर्रेगुट्टा तक पहुंचेगी। यात्रा का उद्देश्य महज तिरंगा लेकर सड़कों पर निकलना नहीं, बल्कि नक्सलवाद से प्रभावित गांवों तक देशभक्ति, शांति और विकास का संदेश पहुंचाना है।

यात्रा के दौरान नक्सल हिंसा में शहीद हुए जवानों और ग्रामीणों को श्रद्धांजलि दी जाएगी। वहीं शहीद परिवारों का सम्मान भी किया जाएगा। इस तरह तिरंगा यात्रा को राष्ट्रभक्ति के साथ शहीदों के प्रति कृतज्ञता और बस्तर में आए बदलाव के संदेश से जोड़ा गया है।
‘पांच दशक तक बस्तर ने झेला नक्सलवाद का दंश’
यात्रा के शुभारंभ अवसर पर उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि बस्तर ने करीब पांच दशकों तक नक्सलवाद का दंश झेला है। इस दौरान ग्रामीणों की हत्याएं हुईं, स्कूल भवनों को नुकसान पहुंचाया गया और बड़ी आबादी विकास की मुख्यधारा से दूर रही।
उन्होंने कहा कि 31 मार्च के बाद नक्सलवाद की समाप्ति के साथ बस्तर में दहशत का माहौल खत्म हुआ है। अब उन्हीं इलाकों में विकास की नई इबारत लिखी जा रही है।
उप मुख्यमंत्री ने कहा कि जहां कभी बंदूक और बारूद का डर था, वहां अब स्कूल, सड़क और विकास की योजनाएं पहुंच रही हैं। बस्तर तिरंगा यात्रा इसी बदलाव को आम लोगों के सामने लाने और युवाओं तथा ग्रामीणों में देशप्रेम की भावना को मजबूत करने का माध्यम है।
‘जिसे नक्सलवाद की राजधानी कहा, वहीं से तिरंगे की शुरुआत’
वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि बस्तर पांच दशकों तक नक्सलवाद के साये में रहा, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। उन्होंने कहा कि जिस अबूझमाड़ को कभी नक्सलवाद की राजधानी कहा जाता था, वहीं से तिरंगा यात्रा का शुरू होना अपने आप में बड़ा संदेश है।
उन्होंने कहा कि यह यात्रा उन क्षेत्रों से होकर गुजरेगी, जहां सुरक्षा बलों ने नक्सलवाद के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी और बस्तर को नक्सल मुक्त बनाने में सफलता मिली।
करेगुट्टा होगा यात्रा का अंतिम पड़ाव
बस्तर तिरंगा यात्रा का अंतिम पड़ाव बीजापुर का कर्रेगुट्टा होगा। यह क्षेत्र नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच लंबे संघर्ष का प्रमुख क्षेत्र रहा है।
अबूझमाड़ से कर्रेगुट्टा तक तिरंगे का यह सफर बस्तर के बदलते दौर का प्रतीक माना जा रहा है। एक ओर हाथों में राष्ट्रध्वज होगा, दूसरी ओर नक्सल हिंसा में शहीद हुए जवानों और ग्रामीणों की स्मृतियां होंगी और इनके बीच विकास की नई उम्मीद दिखाई देगी।
तिरंगा यात्रा का संदेश—बस्तर बदल रहा है
बस्तर तिरंगा यात्रा के जरिए यह संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि कभी नक्सल हिंसा से प्रभावित रहे इलाके अब शांति, सुरक्षा और विकास की नई राह पर आगे बढ़ रहे हैं।
यात्रा का भाव यही है—बंदूक के साये से निकलकर तिरंगे की छांव में आगे बढ़ता बस्तर। अबूझमाड़ से शुरू हुआ तिरंगे का यह सफर बस्तर के अतीत की पीड़ा को याद करते हुए नए भविष्य की उम्मीद का संदेश लेकर आगे बढ़ेगा।




