रावघाट माइंस से प्रभावित 22 गांवों में उबाल
वादाखिलाफी से नाराज ग्रामीणों ने बीएसपी को 30 दिन का अल्टीमेटम

तीन साल बाद भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और पानी के हाल बेहाल
जीरो पॉइंट पर काम बंद कराने की चेतावनी, कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन
(कैलाश सोनी) नारायणपुर। रावघाट माइंस परियोजना एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। नारायणपुर जिले के खोड़गांव क्षेत्र में खनन से प्रभावित 22 गांवों के ग्रामीण अब खुलकर विरोध के मूड में नजर आ रहे हैं। भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) द्वारा किए गए विकास के वादों के पूरा नहीं होने से नाराज ग्रामीणों ने 30 दिनों का अल्टीमेटम देते हुए अनिश्चितकालीन आंदोलन की चेतावनी दे दी है।
सोमवार को बड़ी संख्या में ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने एकजुट होकर जिला मुख्यालय पहुंचकर कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। इस दौरान ग्रामीणों का गुस्सा साफ झलक रहा था। उनका कहना है कि तीन साल पहले जिन वादों के भरोसे उन्होंने खनन का विरोध कम किया था, वे आज तक सिर्फ कागजों में ही सीमित हैं।

वादों के सहारे शुरू हुआ खनन, जमीनी हकीकत शून्य
ग्रामीणों का आरोप है कि बीएसपी ने माइंस शुरू करने से पहले प्रभावित गांवों को गोद लेकर विकास की गारंटी दी थी। इसमें
- बेहतर शिक्षा व्यवस्था
- स्वास्थ्य सुविधाएं
- पक्की सड़कें
- शुद्ध पेयजल
- स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार
जैसे मूलभूत मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी।
इन्हीं वादों के आधार पर ग्रामीणों ने परियोजना का विरोध कम किया और लौह अयस्क के परिवहन को अनुमति दी। लेकिन आज स्थिति यह है कि न तो गांवों की तस्वीर बदली और न ही लोगों की जिंदगी में कोई सुधार आया।
“सपने दिखाए, हकीकत नहीं दी”
प्रभावित गांवों के प्रतिनिधि माधेश्वर कनेरा, जय कुमार और लखन कुमार करलाखा कोवाची ने स्पष्ट कहा—
“बीएसपी ने हमें विकास के जो सपने दिखाए थे, वे आज भी अधूरे हैं। तीन साल बीत गए, लेकिन जमीन पर कुछ भी नहीं बदला। हम खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।”
ग्रामीणों का कहना है कि सबसे ज्यादा निराशा रोजगार को लेकर है।
- स्थानीय युवाओं को नौकरी देने का वादा अधूरा
- बाहर से श्रमिक लाकर काम कराया जा रहा
- गांवों में बेरोजगारी लगातार बढ़ रही
मूलभूत सुविधाओं का संकट बरकरार
खनन क्षेत्र के आसपास बसे गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार:
- कई गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं
- स्कूलों में शिक्षकों की कमी
- सड़कें जर्जर और धूलभरी
- पेयजल की गंभीर समस्या
खनन के कारण धूल और प्रदूषण बढ़ा है, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है।
ज्ञापन में दो टूक चेतावनी
ग्रामीणों ने कलेक्टर को सौंपे ज्ञापन में साफ कहा है कि:
- 30 दिनों के भीतर वादे पूरे किए जाएं
- अन्यथा अनिश्चितकालीन हड़ताल की जाएगी
- जीरो पॉइंट पर काम पूरी तरह बंद कराया जाएगा
यह चेतावनी सीधे तौर पर परियोजना के संचालन पर असर डाल सकती है।
जनाक्रोश की तस्वीर: सड़क से कलेक्टर कार्यालय तक प्रदर्शन
ग्रामीणों का यह विरोध केवल कागजों तक सीमित नहीं रहा। बड़ी संख्या में लोग समूह बनाकर जिला मुख्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने एकजुटता दिखाते हुए प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताई।
हाथों में ज्ञापन और चेहरे पर गुस्सा लिए ग्रामीणों का कहना था कि अब केवल आश्वासन नहीं, जमीनी कार्रवाई चाहिए।
कंपनी पर सामाजिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने का आरोप
ग्रामीणों ने बीएसपी पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि:
- कंपनी ने केवल खनन कार्य को प्राथमिकता दी
- लेकिन सामाजिक जिम्मेदारियों को नजरअंदाज किया
- गांवों के विकास के लिए कोई ठोस योजना लागू नहीं की
यह स्थिति कंपनी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रही है।
प्रशासन के सामने बढ़ी चुनौती
पूरा मामला अब प्रशासन के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है।
यदि समय रहते समाधान नहीं निकला, तो:
- आंदोलन उग्र रूप ले सकता है
- खनन कार्य बाधित हो सकता है
- कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हो सकती है
सूत्रों के मुताबिक, प्रशासन अब इस मामले में मध्यस्थता की कोशिश कर सकता है।
विकास बनाम विस्थापन का सवाल फिर गहराया
रावघाट माइंस परियोजना शुरू से ही विकास और विस्थापन के बीच संतुलन का मुद्दा रही है।
ग्रामीणों का कहना है:
- खनन से उन्हें नुकसान ज्यादा, फायदा कम मिला
- पर्यावरण और जीवनशैली पर असर पड़ा
- लेकिन बदले में सुविधाएं नहीं मिलीं
इससे अब यह सवाल फिर उठने लगा है कि
क्या विकास का मॉडल वास्तव में स्थानीय लोगों के हित में है?
अब निगाहें बीएसपी और प्रशासन पर
पूरे मामले में अब सबसे अहम सवाल यही है कि:
- क्या बीएसपी 30 दिन के भीतर अपने वादे पूरे करेगा?
- क्या प्रशासन ठोस पहल करेगा?
- या फिर यह मामला भी केवल आश्वासनों में सिमट कर रह जाएगा?
रावघाट माइंस से जुड़े 22 गांवों का यह आंदोलन केवल नाराजगी नहीं, बल्कि अपने अधिकार और सम्मान की लड़ाई बन चुका है।
तीन साल के इंतजार के बाद अब ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे रहा है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकला, तो यह विरोध एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है, जिसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा।
अब फैसला बीएसपी और प्रशासन के हाथ में है—
वादों को जमीन पर उतारें या फिर विरोध की आंच झेलने के लिए तैयार रहें।




