नक्सलवाद की छाया से निकल बस्तर में विकास की दस्तक
सरकार की योजनाएं अबूझमाड़ के घर-घर तक पहुंचीं

डिजिटल और वित्तीय सशक्तिकरण से बदल रही तस्वीर…
(कैलाश सोनी) नारायणपुर। चार दशक तक नक्सलवाद की काली छाया में कैद रहा अबूझमाड़ अब बदलते बस्तर की नई कहानी लिख रहा है। जहां कभी विकास की किरणें पहुंचना भी मुश्किल था, वहीं आज सरकार की योजनाएं सीधे ग्रामीणों के घर-घर तक पहुंच रही हैं। नक्सलवाद के कमजोर पड़ने और प्रशासन की सतत सक्रियता के चलते अब यह क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से तेजी से जुड़ता दिखाई दे रहा है।
राज्य सरकार की मंशा और जिला प्रशासन के दृढ़ संकल्प का ही परिणाम है कि अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाके में भी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन संभव हो पाया है। खासतौर पर महिलाओं और स्व-सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए चलाए जा रहे प्रयासों ने इस बदलाव को और मजबूती दी है।
हाल के दिनों में क्षेत्र में आयोजित विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से ग्रामीणों को बैंकिंग सेवाओं, डिजिटल लेन-देन और वित्तीय साक्षरता से जोड़ा जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल योजनाओं का लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाना भी है, ताकि वे आधुनिक व्यवस्था से कदमताल कर सकें।

अबूझमाड़ में बदली सोच, बढ़ा भरोसा
कभी प्रशासन और सरकार के प्रति अविश्वास का माहौल रखने वाला अबूझमाड़ अब विश्वास और सहभागिता की नई मिसाल बनता जा रहा है। ग्रामीणों, खासकर महिलाओं में योजनाओं के प्रति जागरूकता बढ़ी है और वे सक्रिय रूप से इसमें भागीदारी निभा रही हैं।
स्थानीय स्तर पर देखा जाए तो अब ग्रामीण केवल लाभार्थी नहीं रह गए हैं, बल्कि वे योजनाओं के क्रियान्वयन में भागीदार बन रहे हैं। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं आर्थिक गतिविधियों में हिस्सा ले रही हैं और डिजिटल माध्यम से लेन-देन करना सीख रही हैं।

डिजिटल सशक्तिकरण से खुल रहे नए रास्ते
बस्तर के सुदूर गांवों में अब डिजिटल क्रांति की शुरुआत हो चुकी है। मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई और कैशलेस लेन-देन जैसी सुविधाएं, जो कभी शहरों तक सीमित थीं, अब गांवों में भी सहज उपलब्ध हो रही हैं।
ग्रामीणों को सुरक्षित डिजिटल लेन-देन, मोबाइल एप के उपयोग, साइबर सुरक्षा और ऑनलाइन भुगतान की जानकारी दी जा रही है। इसका असर यह है कि अब ग्रामीण न केवल बैंकिंग सेवाओं से जुड़ रहे हैं, बल्कि ठगी जैसे साइबर अपराधों से बचने के प्रति भी सजग हो रहे हैं।
विशेष रूप से महिलाओं में इस बदलाव का असर साफ दिख रहा है। वे स्वयं अपने खातों का संचालन कर रही हैं, डिजिटल भुगतान कर रही हैं और आर्थिक निर्णयों में भागीदारी निभा रही हैं।

जिला प्रशासन की सतत पहल से बदली तस्वीर
नारायणपुर जिला प्रशासन लगातार सुदूर अंचलों में पहुंचकर योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू कर रहा है। नियद नेल्लानार जैसी योजनाओं के माध्यम से मूलभूत सुविधाओं के साथ-साथ आर्थिक और तकनीकी सशक्तिकरण पर भी जोर दिया जा रहा है।
प्रशासन की यह कोशिश है कि कोई भी गांव या परिवार योजनाओं के लाभ से वंचित न रहे। इसके लिए लगातार मैदानी स्तर पर निगरानी, प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।
महिलाएं बनीं बदलाव की धुरी
अबूझमाड़ के विकास में महिलाओं की भूमिका सबसे अहम बनकर उभरी है। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से वे न केवल आर्थिक गतिविधियों में भाग ले रही हैं, बल्कि गांवों में जागरूकता फैलाने का काम भी कर रही हैं।
डिजिटल बैंकिंग से जुड़ने के बाद महिलाओं की आत्मनिर्भरता बढ़ी है। वे अब अपने पैसे का प्रबंधन खुद कर रही हैं, बचत कर रही हैं और छोटे-छोटे व्यवसाय भी शुरू कर रही हैं।
नक्सलवाद के बाद विकास का नया अध्याय
विशेषज्ञों का मानना है कि बस्तर में नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बाद विकास कार्यों को नई गति मिली है। पहले जहां सुरक्षा कारणों से योजनाओं का क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण था, वहीं अब प्रशासन बिना किसी बाधा के गांव-गांव तक पहुंच पा रहा है।
सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और अब डिजिटल एवं वित्तीय सेवाओं का विस्तार इस बात का संकेत है कि बस्तर तेजी से मुख्यधारा में शामिल हो रहा है।
ग्रामीणों में उत्साह और उम्मीद
अबूझमाड़ के ग्रामीणों में अब सरकार और प्रशासन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण देखने को मिल रहा है। जहां पहले भय और असुरक्षा का माहौल था, वहीं अब उत्साह और उम्मीद का वातावरण है।
ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें लगता है कि वे भी देश की विकास यात्रा का हिस्सा हैं। योजनाओं का सीधा लाभ मिलने से उनके जीवन स्तर में सुधार आ रहा है और भविष्य को लेकर विश्वास भी बढ़ा है।
बस्तर के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि
अबूझमाड़ जैसे इलाके में योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन केवल प्रशासनिक सफलता नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का संकेत भी है। यह बस्तर के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, जहां दशकों की चुनौतियों के बाद अब विकास की नई कहानी लिखी जा रही है।
सरकार की स्पष्ट मंशा, स्थानीय प्रशासन की सक्रियता और ग्रामीणों की सहभागिता ने मिलकर यह संभव किया है। आने वाले समय में यह बदलाव और व्यापक रूप लेगा, जिससे बस्तर न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन सकता है।




