100 किमी का दुर्गम सफर तय कर कोहकापार पहुंची शिक्षा की पहली किरण
नदी-नाले, पहाड़ और जंगल पार कर बाइक से गांव पहुंचीं कलेक्टर नम्रता जैन, ‘स्कूल केइंता’ अभियान से पहली बार खुली प्राथमिक शाला; पहले ही दिन 21 बच्चों का नामांकन

(कैलाश सोनी) नारायणपुर। अबूझमाड़ के घने जंगलों के बीच बसे उस गांव में, जहां आज तक स्कूल का नामोनिशान नहीं था और बच्चों का बचपन शिक्षा से कोसों दूर गुजर रहा था, वहां शुक्रवार को इतिहास रच दिया गया। जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर दुर्गम कोहकापार गांव में पहली बार प्राथमिक शाला की शुरुआत हुई। इस ऐतिहासिक पल की साक्षी स्वयं कलेक्टर नम्रता जैन बनीं, जिन्होंने नदी-नाले, पहाड़, पथरीले रास्ते और घने जंगल पार कर बाइक से गांव पहुंचकर विद्यालय का शुभारंभ किया। यह पहल जिला प्रशासन के ‘स्कूल केइंता’ अभियान की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

विद्यालय खुलने के पहले ही दिन गांव के 21 बच्चों ने शिक्षा की नई राह पर कदम रखा। इनमें 11 छात्राएं और 10 छात्र शामिल हैं। कलेक्टर ने बच्चों का पारंपरिक मुकुट पहनाकर स्वागत किया, उन्हें स्कूल बैग और पाठ्यपुस्तकें वितरित कीं तथा स्वयं कक्षा में बैठकर बच्चों को पढ़ाया। पूरे गांव में यह दृश्य उत्साह और उम्मीद का प्रतीक बन गया।
जहां स्कूल नहीं था, वहां अब गूंजेगी बच्चों की पाठशाला
कोहकापार ऐसा गांव था जहां आज तक कोई प्राथमिक विद्यालय संचालित नहीं था। बच्चों को शिक्षा के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी, जिसके कारण अधिकांश बच्चे कभी स्कूल नहीं पहुंच सके। जिला प्रशासन ने घर-घर शैक्षणिक सर्वेक्षण कर ऐसे बच्चों की पहचान की और गांव में ही प्राथमिक शाला प्रारंभ करने का निर्णय लिया।

कलेक्टर नम्रता जैन ने ग्रामीणों से कहा कि शिक्षा ही जीवन बदलने का सबसे बड़ा माध्यम है। यदि गांव का हर बच्चा विद्यालय पहुंचेगा तो आने वाले वर्षों में पूरा गांव विकास की नई तस्वीर बनेगा।
‘स्कूल केइंता’ बना शिक्षा की नई उम्मीद
कलेक्टर ने बताया कि ‘स्कूल केइंता’ अभियान के तहत अबूझमाड़ सहित जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में ऐसे बच्चों की पहचान की जा रही है जो कभी विद्यालय नहीं गए या बीच में पढ़ाई छोड़ चुके हैं। अभियान के अंतर्गत अब तक 2,000 से अधिक बच्चों का शासकीय विद्यालयों और छात्रावासों में प्रवेश कराया जा चुका है। कोहकापार में पहली प्राथमिक शाला की शुरुआत इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है।
घोटूल में लगी कक्षा, बच्चों को खुद पढ़ाया
विद्यालय शुभारंभ के बाद कलेक्टर गांव के घोटूल पहुंचीं, जहां उन्होंने बच्चों के बीच बैठकर पढ़ाई कराई और उन्हें नियमित विद्यालय आने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि प्रशासन केवल स्कूल खोलने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रत्येक बच्चे की शिक्षा सुनिश्चित करेगा।
‘माड़ संवाद’ में सुनी गांव की आवाज
विद्यालय शुभारंभ के बाद कलेक्टर ने ‘माड़ संवाद’ कार्यक्रम में ग्रामीणों के साथ खुले मंच पर चर्चा की। उन्होंने गांव की शिक्षा, आंगनबाड़ी, गर्भवती महिलाओं, बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और शासन की योजनाओं की जमीनी स्थिति की जानकारी ली।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने बताया कि केंद्र में 19 बच्चे पंजीकृत हैं और सभी नियमित रूप से आ रहे हैं। इस पर कलेक्टर ने बच्चों के बेहतर पोषण और नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
ग्रामीणों ने रखीं मूलभूत सुविधाओं की मांग
ग्राम पंचायत के सरपंच मनु ध्रुव ने बताया कि गांव में 25 परिवार और लगभग 128 की आबादी निवास करती है। उन्होंने गांव में नल-जल योजना, बिजली, मोबाइल टावर और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग रखी। कलेक्टर ने संबंधित विभागों के अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए।

हर पात्र परिवार को मिलेगा योजनाओं का लाभ
कलेक्टर ने ग्रामीणों को आधार कार्ड, राशन कार्ड और आयुष्मान कार्ड बनवाने के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि शासन की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना जिला प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
स्कूल समन्वयक के प्रयासों की सराहना
कोहकापार के बच्चों का शैक्षणिक सर्वेक्षण स्कूल समन्वयक खेमा अंगारे द्वारा किया गया था। इसी सर्वेक्षण के आधार पर गांव में प्राथमिक शाला प्रारंभ की गई। कलेक्टर ने उनके प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि प्रशासन, शिक्षक, जनप्रतिनिधि और ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग से ही शिक्षा की यह अलख दूरस्थ गांवों तक पहुंच रही है।
इस अवसर पर जनपद पंचायत अध्यक्ष नरेश कोर्राम, गोमागाल के सरपंच मनु ध्रुव, विभिन्न विभागों के अधिकारी, जनप्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।
व्यू
अबूझमाड़ के सबसे दुर्गम गांवों में शिक्षा की दस्तक केवल एक स्कूल खुलने की घटना नहीं, बल्कि विकास की नई इबारत है। कोहकापार में खुली पहली प्राथमिक शाला यह संदेश देती है कि यदि प्रशासन का संकल्प मजबूत हो तो जंगल, पहाड़ और नदी जैसी कठिन भौगोलिक चुनौतियां भी बच्चों के भविष्य की राह नहीं रोक सकतीं।




