सीमांत गांवों में प्रशासन की दस्तक: सरहद पर बसे बच्चों की पाठशाला से अस्पताल तक कलेक्टर की सीधी पड़ताल

कैलाश सोनी- नारायणपुर। नारायणपुर जिले के सरहदी इलाके- जहां से आगे कोंडागांव, दंतेवाड़ा, जगदलपुर और बीजापुर की सीमाएं लगती हैं- वहां शासन-प्रशासन की मौजूदगी महज़ औपचारिकता नहीं, बल्कि भरोसे की बुनियाद बनती है। वर्षों तक नक्सल प्रभावित रहे अबूझमाड़ अंचल के भीतर बसे सुलेंगा, मड़ागड़ा और कन्हारगांव जैसे दुर्गम गांवों में कलेक्टर नम्रता जैन का सघन दौरा इसी भरोसे को जमीन पर उतारने की एक ठोस कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सीमांत क्षेत्र में आश्रम-छात्रावास, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति का प्रत्यक्ष निरीक्षण कर कलेक्टर ने व्यवस्थाओं की नब्ज टटोली और जहां कमी दिखी, वहां तत्काल सुधार के निर्देश दिए।

दौरे की शुरुआत सुलेंगा बालक आश्रम-छात्रावास से हुई। बच्चों के आवासीय कक्षों, शौचालय, पेयजल और रसोई व्यवस्था की पड़ताल के दौरान सामने आया कि भवन की मरम्मत, बिस्तर-गद्दों और सहायक स्टाफ जैसी बुनियादी जरूरतें अभी अधूरी हैं। अधीक्षक की मांग पर जनपद पंचायत सीईओ को प्राक्कलन तैयार कर शीघ्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए। निर्माणाधीन शौचालय को तय समय-सीमा में पूर्ण कराने पर विशेष जोर दिया गया। सरहदी अंचल में पढ़ाई के लिए घर छोड़कर रहने वाले बच्चों के लिए सुरक्षित और स्वच्छ आवास व्यवस्था सरकार की प्राथमिकता बने—यह संदेश प्रशासन ने मौके पर ही स्पष्ट किया।

इसके बाद हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर, सुलेंगा का निरीक्षण हुआ। गर्भवती महिलाओं से सीधा संवाद कर कलेक्टर ने मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत जानी। दवाइयों की उपलब्धता, सामान्य बीमारियों का उपचार और स्टाफ की तैनाती की समीक्षा के दौरान भवन की जर्जर स्थिति सामने आई। मरम्मत कार्य शीघ्र शुरू कराने के निर्देश दिए गए। सीमांत गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं अक्सर दूरी और संसाधनों की कमी के कारण कमजोर पड़ जाती हैं—ऐसे में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना यहां के निवासियों के लिए जीवन रेखा जैसा है।

शिक्षा व्यवस्था की पड़ताल करते हुए कलेक्टर ने सुलेंगा के प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों का अवलोकन किया। छात्रों की उपस्थिति, शिक्षकों की नियमितता, पेयजल और शौचालय जैसी सुविधाओं की स्थिति की समीक्षा की गई। निर्माणाधीन शौचालय भवन को शीघ्र पूर्ण कराने के निर्देश दिए गए। विद्यार्थियों से बातचीत में पढ़ाई से जुड़ी कठिनाइयों और संसाधनों की कमी सामने आई। इसी दौरान दो बालिकाओं द्वारा गोंडी भाषा में प्रस्तुत मधुर गीत ने माहौल को मानवीय स्पर्श दिया—कलेक्टर ने बच्चों की सराहना करते हुए उन्हें प्रोत्साहन स्वरूप चॉकलेट वितरित की। प्रशासन की सख्ती के बीच संवेदनशीलता का यह क्षण सीमांत अंचल में भरोसे की नई लकीर खींच गया।
मड़ागड़ा और कन्हारगांव के स्कूलों का निरीक्षण करते हुए भी भवनों की स्थिति, पेयजल, शौचालय और कक्षाओं की व्यवस्था की समीक्षा की गई। जहां कमियां मिलीं, वहां संबंधित अधिकारियों को सुधारात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए गए। जनपद पंचायत, ग्राम पंचायत प्रतिनिधि और विभागीय अमले की मौजूदगी में स्पष्ट किया गया कि सीमांत क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की अनदेखी अब बर्दाश्त नहीं होगी।


सरहदी इलाकों का यह दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यही वे क्षेत्र हैं जहां एक ओर प्रशासनिक पहुंच चुनौतीपूर्ण रही है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं की निरंतरता ही सामाजिक बदलाव की असली कुंजी है। नक्सलवाद की छाया से बाहर निकलते अबूझमाड़ में स्कूलों की नियमितता, छात्रावासों की स्थिति और स्वास्थ्य केंद्रों की कार्यशीलता सरकार की प्रतिबद्धता की कसौटी हैं। कलेक्टर का प्रत्यक्ष निरीक्षण यह संकेत देता है कि अब फैसले फाइलों से निकलकर मैदान में उतर रहे हैं।
प्रशासनिक हलकों में उम्मीद है कि निरीक्षण के बाद दिए गए निर्देश केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेंगे। यदि भवन मरम्मत, संसाधन उपलब्धता और स्टाफ की मांग समय पर पूरी होती है, तो सीमांत गांवों में बच्चों की पढ़ाई और ग्रामीणों की सेहत दोनों को नई मजबूती मिलेगी। सरहद पर बसे इन गांवों के लिए यह दौरा सिर्फ एक निरीक्षण नहीं, बल्कि भरोसे का संदेश है—कि शासन अब दूर नहीं, उनके बीच खड़ा है।




