नारायणपुर

जिला मुख्यालय के इर्द-गिर्द ही क्यों सिमट रहे ‘पशु स्वास्थ्य शिविर’?

अबूझमाड़ में इलाज के अभाव में मरते पशु, एहनार मे अज्ञात बीमारी से तड़पकर मरी बकरी

नारायणपुर। नारायणपुर जिले में एनजीओ और कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (CSR) के तहत आयोजित होने वाले पशु स्वास्थ्य शिविर एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। कागजों और तस्वीरों में ये शिविर ग्रामीण आजीविका और पशुधन कल्याण की मिसाल बनते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा पीड़ादायक है। सवाल सीधा है—जिन इलाकों में पशु इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं, वहां शिविर क्यों नहीं? और जिला मुख्यालय के आसपास ही ऐसे आयोजन कर मीडिया में वाहवाही क्यों?

तस्वीरें जो हकीकत बयां करती हैं

सोनपुर के पास एक गांव में सड़क किनारे तड़प-तड़प कर मरी बकरी की तस्वीर जिले के पशु स्वास्थ्य तंत्र पर करारा तमाचा है। ग्रामीणों के मुताबिक इलाके में बीते कुछ समय से बकरियों की अचानक मौत हो रही है। बीमारी क्या है, इसकी जानकारी किसी को नहीं। इलाज के लिए न डॉक्टर पहुंच रहा है, न दवा। ग्रामीण मजबूरी में मीलों पैदल चलकर जिला मुख्यालय तक पशु लाने की सोचते हैं, लेकिन कई बार रास्ते में ही पशु दम तोड़ देते हैं।

दूसरी ओर, बम्हानी गांव में आयोजित पशु स्वास्थ्य शिविर की तस्वीरें हैं—जहां मंच, बैनर, दवाइयों के पैकेट और लाभार्थियों के साथ फोटो खिंचवाकर प्रेस विज्ञप्ति जारी की जाती है। सवाल यह नहीं कि शिविर गलत हैं, सवाल यह है कि जरूरतमंद इलाकों से दूरी क्यों?

बम्हानी में शिविर, लेकिन जरूरत अबूझमाड़ में

नारायणपुर जिला के बम्हानी गांव में एचडीएफसी बैंक लिमिटेड के सहयोग से तथा बाइफ (BAIF) एनजीओ के साथ मिलकर एक पशु स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में पशुओं का निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण, टीकाकरण, पोषण संबंधी दवाइयों का वितरण और सामान्य रोगों का उपचार किया गया। पशुपालकों को संतुलित आहार, स्वच्छता और रोग रोकथाम की जानकारी भी दी गई।

इसमें कोई दो राय नहीं कि यह एक अच्छी पहल है। लेकिन बम्हानी गांव जिला मुख्यालय के आसपास है, जहां पहले से पशु चिकित्सालय, सड़क और आवागमन की सुविधा मौजूद है। ऐसे में सवाल उठता है कि अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाकों में, जहां न सड़क है न अस्पताल, वहां ऐसे शिविर क्यों नहीं लगाए जाते?

अबूझमाड़: जहां इलाज तक पहुंचना संघर्ष

नारायणपुर जिले का अबूझमाड़ क्षेत्र आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। कई गांवों तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं है। स्वास्थ्य सुविधाएं नगण्य हैं—चाहे वह इंसानों की हों या पशुओं की। पशुधन यहां ग्रामीणों की आजीविका का मुख्य साधन है। बकरी, गाय, भैंस ही उनका बैंक है।

ग्रामीण बताते हैं कि जब पशु बीमार पड़ता है, तो इलाज के लिए जिला मुख्यालय तक लाना लगभग असंभव हो जाता है। कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। नतीजा यह कि बीमारी गंभीर हो जाती है और पशु रास्ते में ही दम तोड़ देता है।

सोनपुर के पास एहनार गांव की पीड़ा

मंगलवार को सोनपुर के पास स्थित ग्राम एहनार पहुंचे लोगों ने वहां की स्थिति देखी। ग्रामीणों ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में कई बकरियां अचानक मर चुकी हैं। किसी को बीमारी का नाम तक नहीं पता। न कोई जांच हुई, न सैंपल लिया गया, न कोई पशु चिकित्सक गांव तक पहुंचा।

ग्रामीणों का दर्द साफ शब्दों में झलकता है—
शहर के पास कैंप लगाना आसान है, फोटो भी अच्छे आते हैं। लेकिन हमारे गांव में आइए, जहां बकरियां तड़पकर मर रही हैं।

फोटो-ऑप बनाम वास्तविक जरूरत

बम्हानी के शिविर में लाभार्थियों को दवाइयां दी गईं, तस्वीरें खींची गईं और मीडिया को प्रेस विज्ञप्ति भेजी गई। वहीं अबूझमाड़ के गांवों में न दवा पहुंची, न डॉक्टर। यह विरोधाभास प्रशासन, एनजीओ और CSR गतिविधियों की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है।

ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही शिविर दो महीने में एक बार होते हैं, तो उन्हें ऐसे इलाकों में आयोजित किया जाए जहां वास्तव में जरूरत है। जिला मुख्यालय के आसपास तो पहले से ही सरकारी पशु अस्पताल मौजूद हैं।

एनजीओ और विभाग की दलील

इस मामले में बताया गया कि ये शिविर BAIF एनजीओ और HDFC बैंक के सहयोग से किए जाते हैं, जिनमें पशु विभाग के कर्मचारी भी शामिल होते हैं। आयोजकों के अनुसार, हर दो महीने में किसी न किसी गांव में शिविर लगाया जाता है।

लेकिन सवाल यह है कि गांव चयन का आधार क्या है?
क्या वह दूरी, दुर्गमता और जरूरत के आधार पर तय होता है, या फिर सुविधा और पहुंच के हिसाब से?

नीति में बदलाव की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि पशु स्वास्थ्य शिविरों की योजना बनाते समय प्राथमिकता उन क्षेत्रों को दी जानी चाहिए—

  • जहां पशु मृत्यु दर अधिक है
  • जहां पशु चिकित्सालय नहीं हैं
  • जहां सड़क और परिवहन की सुविधा नहीं है

अबूझमाड़ जैसे क्षेत्रों में मोबाइल वेटरनरी यूनिट, विशेष शिविर और नियमित निगरानी की सख्त जरूरत है।

सवाल जो अनुत्तरित हैं

  • सोनपुर और एहनार जैसे गांवों में अज्ञात बीमारी की जांच क्यों नहीं हुई?
  • मरी हुई बकरी का पोस्टमार्टम और सैंपलिंग क्यों नहीं की गई?
  • CSR फंड और एनजीओ की गतिविधियां जरूरतमंद इलाकों तक क्यों नहीं पहुंच रहीं?

शिविर वहीं, जहां सबसे ज्यादा जरूरत

पशु स्वास्थ्य शिविर अगर वास्तव में ग्रामीण आजीविका सुदृढ़ीकरण के लिए हैं, तो उनका स्थान भी वही होना चाहिए जहां पशु और पशुपालक सबसे ज्यादा संकट में हैं। जिला मुख्यालय के इर्द-गिर्द शिविर लगाकर प्रेस विज्ञप्ति जारी करना आसान है, लेकिन अबूझमाड़ के दुर्गम गांवों तक पहुंचना ही असली परीक्षा है।

जब तक नीतियां फोटो और फाइलों से निकलकर जंगल-पहाड़ों तक नहीं पहुंचेंगी, तब तक बकरियां यूं ही तड़पकर मरती रहेंगी—और सवाल उठते रहेंगे।

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