नक्सलवाद से मुक्त हुआ अबूझमाड़, पर शिक्षा व्यवस्था अब भी बेड़ियों में
कोड़नार की प्राथमिक शाला में लापरवाही, बच्चों के भविष्य पर गहराता संकट

नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र अंतर्गत कोड़नार गांव की प्राथमिक शाला इसका ज्वलंत उदाहरण बनकर सामने आई है, जहां शिक्षक ही बच्चों के भविष्य के सबसे बड़े दुश्मन बनते नजर आ रहे हैं।
भवन नहीं, व्यवस्था भी नहीं
कोड़नार गांव में संचालित प्राथमिक शाला वर्षों से बदहाल स्थिति में है। इस स्कूल का न तो अपना भवन है और न ही स्थायी व्यवस्था। पहले यह स्कूल गांव के घोटुल में संचालित होता था और अब आंगनबाड़ी भवन में जैसे-तैसे चलाया जा रहा है। आंगनबाड़ी के नन्हे बच्चों के साथ प्राथमिक कक्षाएं लगाना मजबूरी बन चुकी है, लेकिन इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि शिक्षक ही नियमित रूप से स्कूल नहीं आते।
ग्रामीणों का आरोप है कि पदस्थ शिक्षक महीने में महज दो से तीन दिन ही स्कूल पहुंचते हैं। शेष दिनों में स्कूल पर ताला लटका रहता है। परिणामस्वरूप बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो चुकी है।

ग्रामीणों का आरोप: महीने भर में गिने-चुने दिन ही खुलता है स्कूल
ग्रामीणों का कहना है कि जब स्कूल घोटुल में संचालित होता था, तब भी यही स्थिति थी। शिक्षक तब भी नियमित नहीं आते थे। अब आंगनबाड़ी भवन में स्कूल शिफ्ट कर दिया गया, लेकिन शिक्षकों के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया।
ग्रामीणों के अनुसार, कई बार बच्चे सुबह स्कूल पहुंचते हैं, लेकिन शिक्षक नहीं आते। घंटों इंतजार के बाद बच्चे घर लौट जाते हैं। इससे बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि खत्म होती जा रही है।
ग्रामीण:
“हमारे बच्चे रोज स्कूल जाते हैं, लेकिन स्कूल बंद रहता है। शिक्षक महीने में दो-चार दिन आते हैं। बच्चे पढ़ाई से पीछे हो रहे हैं। अबूझमाड़ से नक्सलवाद तो चला गया, लेकिन बच्चों का भविष्य अब भी सुरक्षित नहीं है।”

बच्चों का भविष्य अंधकार में
अबूझमाड़ जैसे क्षेत्र में शिक्षा ही वह सबसे मजबूत हथियार है, जो आने वाली पीढ़ी को हिंसा, गरीबी और पिछड़ेपन से बाहर निकाल सकता है। लेकिन कोड़नार की प्राथमिक शाला में जो हालात हैं, वे इस उम्मीद को तोड़ते नजर आ रहे हैं।
बुनियादी शिक्षा से वंचित बच्चे न तो ठीक से पढ़ना-लिखना सीख पा रहे हैं और न ही आगे की कक्षाओं के लिए तैयार हो पा रहे हैं। इसका सीधा असर उनके भविष्य पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्राथमिक स्तर पर शिक्षा की नींव कमजोर रह गई, तो आगे चलकर इन बच्चों का मुख्यधारा से जुड़ना बेहद कठिन हो जाएगा।
सवालों के घेरे में शिक्षा विभाग
इस पूरे मामले ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शिक्षक नियमित रूप से स्कूल जाते ही नहीं हैं, तो उन्हें पूरा वेतन कैसे मिल रहा है?
क्या उपस्थिति की सही निगरानी हो रही है?
क्या निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित है?
यह मामला केवल कोड़नार गांव तक सीमित नहीं बताया जा रहा है। ग्रामीणों और स्थानीय लोगों का कहना है कि अबूझमाड़ क्षेत्र के कई अन्य स्कूलों में भी इसी तरह की स्थिति है, जहां शिक्षक नियमित रूप से अनुपस्थित रहते हैं।
डीईओ का बयान: जांच के बाद होगी कार्रवाई
मामले के सामने आने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी अशोक कुमार पटेल ने कहा है कि शिकायत की जांच कराई जाएगी।
उन्होंने कहा—
“कोड़नार प्राथमिक शाला से संबंधित शिकायत मिली है। पूरे मामले की जांच कराई जाएगी। यदि शिक्षक दोषी पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”
हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि जांच और कार्रवाई की बातें पहले भी कई बार कही जा चुकी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव नजर नहीं आया।

नक्सलवाद हटा, अब प्रशासन की जिम्मेदारी
अबूझमाड़ में नक्सलवाद का प्रभाव कम होना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। सुरक्षा बलों ने अपनी जान जोखिम में डालकर इलाके को सुरक्षित बनाया। सरकार ने विकास के दरवाजे खोले।
लेकिन अब सवाल यह है कि जब रास्ता साफ हो चुका है, तो प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों से क्यों पीछे हटता नजर आ रहा है?
यदि शिक्षक ही स्कूल नहीं जाएंगे, तो सड़क, भवन और योजनाओं का क्या अर्थ रह जाएगा? शिक्षा के बिना विकास अधूरा है—और अबूझमाड़ में यह सच्चाई एक बार फिर सामने आ रही है।
शिक्षा का अधिकार कागजों में सिमटा
संविधान बच्चों को शिक्षा का अधिकार देता है, लेकिन कोड़नार के बच्चों के लिए यह अधिकार अब भी कागजों तक सीमित नजर आता है।
ग्रामीणों का कहना है कि वे चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें, लेकिन जब स्कूल ही नियमित नहीं खुलता, तो वे क्या करें?
अब नजरें प्रशासन की कार्रवाई पर
अब इस मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि जांच के बाद प्रशासन क्या ठोस कदम उठाता है।
क्या लापरवाह शिक्षकों पर सख्त कार्रवाई होगी?
क्या कोड़नार गांव को एक नियमित और व्यवस्थित स्कूल मिलेगा?
और सबसे बड़ा सवाल—कब तक अबूझमाड़ के बच्चों को उनका शिक्षा का अधिकार सही मायने में मिल पाएगा?
अबूझमाड़ ने बंदूक का दौर देखा है, डर और सन्नाटे के साल झेले हैं। अब जब शांति लौट रही है, तो शिक्षा व्यवस्था की लापरवाही इस नई शुरुआत पर सबसे बड़ा खतरा बनकर खड़ी है।
यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह लापरवाही आने वाली पीढ़ियों को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकती है।




